गौतम चौधरी
बच्चों की परवरिश केवल परिवार की निजी जिम्मेदारी नहीं है। किसी भी समाज का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपनी नई पीढ़ी को किस तरह तैयार करता है। इस्लामी परंपरा में बच्चों की परवरिश को एक बड़ी अमानत और जिम्मेदारी माना गया है। माता-पिता का दायित्व केवल बच्चों की भौतिक जरूरतें पूरी करना नहीं, बल्कि उनके चरित्र, नैतिकता, आचरण और सामाजिक जिम्मेदारी का विकास करना भी है।
इसी संदर्भ में मुस्लिम समाज में प्रचलित “7-7-7 पैरेंटिंग फ्रेमवर्क” एक दिलचस्प अवधारणा है। इसके अनुसार बच्चे के विकास को लगभग तीन सात-सात वर्षीय चरणों में समझा जाता है। पहले सात वर्ष प्रेम, ममता और खेल के हैं। अगले सात वर्ष शिक्षा, अनुशासन और जिम्मेदारी के हैं। अंतिम सात वर्ष दोस्ताना संवाद, विश्वास, सलाह और जीवन के लिए तैयार करने के हैं।
यहां एक तथ्यात्मक सावधानी जरूरी है। 7-7-7 मॉडल को पैगंबर मुहम्मद ﷺ की प्रमाणित हदीस के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। यह एक प्रचलित इस्लामी चंतमदजपदह तिंउमूवता है, जिसे आम तौर पर हज़रत अली से जोड़ा जाता है, लेकिन इसकी प्रामाणिकता को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए। इसे इसलिए एक उपयोगी व्याख्यात्मक मॉडल के रूप में देखा जा सकता है, न कि इस्लाम का कोई अनिवार्य धार्मिक नियम।
बच्चे के जीवन के शुरुआती वर्ष उसके व्यक्तित्व के निर्माण की बुनियाद रखते हैं। इस उम्र में बच्चे को केवल आदेश और अनुशासन की जरूरत नहीं होती, बल्कि प्रेम, सुरक्षा, ध्यान और भावनात्मक जुड़ाव की आवश्यकता होती है। इस्लामी परंपरा में बच्चों के प्रति स्नेह को विशेष महत्व दिया गया है। सहीह बुखारी में वर्णित है कि पैगंबर मुहम्मद ﷺ ने हज़रत हसन को चूमा और बच्चों के प्रति दया और ममता को महत्व दिया। एक अन्य प्रसंग में उन्होंने बच्चों को चूमने पर आपत्ति करने वाले व्यक्ति को दया के महत्व की याद दिलाई।
इससे यह स्पष्ट होता है कि इस्लामी परवरिश में प्रेम और अनुशासन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बच्चे को पहले यह अनुभव होना चाहिए कि उसका घर उसके लिए सुरक्षा और स्नेह का स्थान है। यही भावनात्मक आधार आगे चलकर आत्मविश्वास, संवेदनशीलता और सामाजिक व्यवहार के विकास में मदद कर सकता है।
लगभग सात वर्ष की उम्र के बाद बच्चे को धीरे-धीरे जिम्मेदारियों से परिचित कराने की आवश्यकता बढ़ती है। इस्लामी परंपरा में नमाज़ के संदर्भ में सात वर्ष की उम्र का विशेष उल्लेख मिलता है। सुनन अबू दाऊद की हदीस में बच्चों को सात वर्ष की उम्र से नमाज़ का आदेश देने की बात कही गई है।
इससे 7-7-7 मॉडल के दूसरे चरण को एक धार्मिक संदर्भ मिलता है, हालांकि दोनों को बिल्कुल समान मान लेना उचित नहीं होगा। इस उम्र में बच्चे को केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि सत्य बोलना, अमानतदारी, दूसरों के अधिकारों का सम्मान, धैर्य, संयम, परिश्रम और जिम्मेदारी जैसे मूल्यों से परिचित कराया जा सकता है।
अनुशासन का अर्थ केवल दंड नहीं है। स्वस्थ अनुशासन का अर्थ है बच्चे को यह समझाना कि स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी आती है। उसे अपने काम स्वयं करने, समय का सम्मान करने और अपने व्यवहार के परिणामों को समझने की आदत डालना भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।
लगभग चौदह वर्ष के बाद बच्चा किशोरावस्था में प्रवेश करता है। इस उम्र में उसके भीतर स्वतंत्र व्यक्तित्व और अपनी राय बनाने की क्षमता तेजी से विकसित होती है। इसलिए माता-पिता की भूमिका भी बदलनी चाहिए।
अब केवल आदेश देने के बजाय संवाद अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। बच्चे की बात सुनना, उसके प्रश्नों को गंभीरता से लेना और उसे निर्णय लेने की प्रक्रिया में धीरे-धीरे शामिल करना उसके भीतर जिम्मेदारी की भावना विकसित कर सकता है।
यही 7-7-7 मॉडल का तीसरा पक्ष हैकृमाता-पिता का केवल नियंत्रक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और विश्वसनीय साथी बनना। इसका अर्थ यह नहीं कि किशोर को पूरी तरह बिना दिशा के छोड़ दिया जाए। स्वतंत्रता के साथ विवेकपूर्ण मार्गदर्शन आवश्यक है। माता-पिता को सीमा, जिम्मेदारी और विश्वास के बीच संतुलन बनाना होता है।
बच्चे की परवरिश का प्रभाव परिवार की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता। परिवार समाज की पहली पाठशाला है। जो बच्चा घर में सत्य, न्याय, अनुशासन, करुणा और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना सीखता है, उसके सार्वजनिक जीवन में भी इन मूल्यों के प्रभाव की संभावना बढ़ती है।
यहीं से 7-7-7 मॉडल को राष्ट्र निर्माण से जोड़ा जा सकता है। राष्ट्र निर्माण केवल बड़े-बड़े संस्थानों, कानूनों और आर्थिक योजनाओं से नहीं होता। इसके पीछे ऐसे नागरिक भी होते हैं जो अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को समझते हैं। ईमानदार कर्मचारी, जिम्मेदार व्यापारी, संवेदनशील शिक्षक, कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी, सामाजिक रूप से जागरूक युवा और कानून का सम्मान करने वाले नागरिककृइन सबकी बुनियाद कहीं न कहीं पारिवारिक संस्कारों में तैयार होती है।
इस दृष्टि से बच्चों को देश के प्रति जिम्मेदारी, सार्वजनिक संपत्ति के सम्मान, कानून के पालन, सामाजिक सद्भाव और दूसरे समुदायों के अधिकारों के सम्मान की शिक्षा देना महत्वपूर्ण है।
हालांकि यहां भी एक अंतर समझना जरूरी है। राष्ट्र निर्माण का विचार आधुनिक नागरिक जीवन का व्यापक सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ है। इसे सीधे किसी एक धार्मिक चंतमदजपदह सूत्र का मूल उद्देश्य बताना ऐतिहासिक रूप से सावधानी की मांग करता है। लेकिन इस्लामी नैतिक मूल्योंकृन्याय, अमानतदारी, जिम्मेदारी, दया और पड़ोसी के अधिकारोंकृको आधुनिक नागरिकता के मूल्यों से जोड़ा जा सकता है।
आज बच्चों की परवरिश पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो गई है। सोशल मीडिया, इंटरनेट, उपभोक्तावाद, प्रतिस्पर्धा और बदलती पारिवारिक संरचना ने माता-पिता के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। ऐसे समय में मॉडल की सबसे उपयोगी बात शायद इसकी संख्या नहीं, बल्कि इसका क्रमिक दृष्टिकोण है।
छोटे बच्चे को प्रेम चाहिए। बड़े होते बच्चे को दिशा और अनुशासन चाहिए। किशोर को संवाद, सम्मान और विश्वास चाहिए। इसका अर्थ यह भी नहीं कि सातवें, चौदहवें या इक्कीसवें जन्मदिन पर माता-पिता की भूमिका अचानक बदल जानी चाहिए। हर बच्चा अलग गति से विकसित होता है। इसलिए सात-सात वर्ष को कठोर नियम के बजाय एक व्यापक मार्गदर्शक ढांचे के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
आखिरकार किसी भी समाज की शक्ति केवल उसकी आर्थिक समृद्धि या सैन्य क्षमता में नहीं होती। उसकी वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों के चरित्र में भी दिखाई देती है। इस्लामी परवरिश का मूल उद्देश्य केवल धार्मिक पहचान बनाए रखना नहीं, बल्कि नैतिक और जिम्मेदार इंसान तैयार करना भी है। प्रेम से भावनात्मक सुरक्षा, शिक्षा से चरित्र और अनुशासन, तथा विश्वास और संवाद से जिम्मेदारी विकसित करने की कोशिश की जाए तो परिवार समाज के लिए बेहतर नागरिक तैयार कर सकता है।
7-7-7 मॉडल को इसी व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो यह आधुनिक चंतमदजपदह पर एक उपयोगी विमर्श प्रस्तुत करता है। इसकी सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि बच्चे की उम्र बढ़ने के साथ माता-पिता और बच्चे के रिश्ते का स्वरूप भी बदलना चाहिए।
एक सुरक्षित बचपन, संस्कारित किशोरावस्था और जिम्मेदार युवावस्था मिलकर ऐसे नागरिक तैयार कर सकती है जो अपने परिवार, समाज और देश के प्रति अपने दायित्व को समझें। क्योंकि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता। राष्ट्र अपने नागरिकों के चरित्र से बनता है। और नागरिक के चरित्र की पहली पाठशाला उसका परिवार होता है।
