नकल रोकने वाला शिक्षक अपराधी कैसे बन गया?

नकल रोकने वाला शिक्षक अपराधी कैसे बन गया?

IIT बॉम्बे जैसे देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान से सामने आई साहिल वाकोड़े की मौत की घटना ने शिक्षा व्यवस्था के सामने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। एक युवा छात्र की मृत्यु परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है। साथ ही यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या किसी छात्र की मृत्यु के बाद बिना पूरी जांच के किसी शिक्षक को दोषी मान लिया जाना चाहिए? इसके विपरीत क्या किसी प्रतिष्ठित संस्थान का शिक्षक केवल शिक्षक होने के कारण हर आरोप से मुक्त मान लिया जाए? दोनों सवालों का उत्तर भावनाओं से नहीं, बल्कि प्रमाण, निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया से मिलना चाहिए।

यह मामला केवल एक छात्र और प्रोफेसर के बीच विवाद का नहीं है। इसके भीतर परीक्षा में नकल, छात्र का मानसिक दबाव, जातिगत भेदभाव के आरोप, शिक्षक की जिम्मेदारी, संस्थागत जवाबदेही और सोशल मीडिया की भूमिका जैसे कई प्रश्न जुड़े हैं।

IIT बॉम्बे के प्रारंभिक बयान के अनुसार साहिल वाकोड़े परीक्षा के दौरान मोबाइल का इस्तेमाल करते हुए पकड़े गए थे और कथित तौर पर प्रश्नपत्र को ChatGPT पर डालकर उत्तर लेने का प्रयास किया गया था। संस्थान के अनुसार उनके खिलाफ उस समय औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं हुई थी और उन्हें काउंसलिंग दी गई थी। यदि यह तथ्य जांच में सही साबित होता है तो परीक्षा में नकल रोकना शिक्षक और संस्थान की जिम्मेदारी है। मगर शिक्षक की कार्रवाई भी संस्थान के नियमों के भीतर होनी चाहिए तथा छात्र की गरिमा और मानसिक स्थिति का ध्यान रखा जाना चाहिए।

इस मामले का सबसे संवेदनशील पहलू जातिगत उत्पीड़न के आरोप हैं। साहिल के परिवार की ओर से प्रोफेसर सूर्यनारायण दूल्ला और संस्थान से जुड़े लोगों पर जातिगत उत्पीड़न तथा मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए गए हैं। पुलिस ने इन आरोपों के आधार पर मामला दर्ज किया है। इन आरोपों की जांच जारी है। इसलिए इन्हें अभी न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। FIR जांच की शुरुआत है, अंतिम फैसला नहीं।

सामाजिक भेदभाव से सुरक्षा देने वाले कानूनों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि किसी विद्यार्थी के साथ उसकी जाति के कारण अपराध होता है तो उसे कानून का संरक्षण मिलना चाहिए। साथ ही किसी आरोपी को केवल आरोप के आधार पर अपराधी मान लेना भी न्यायसंगत नहीं है। शिकायतकर्ता की बात सुनी जानी चाहिए और आरोपी को निष्पक्ष जांच का अधिकार मिलना चाहिए।

प्रोफेसर सूर्यनारायण दूल्ला की शैक्षणिक पृष्ठभूमि को लेकर भी सोशल मीडिया पर कई दावे किए जा रहे हैं। IIT बॉम्बे की आधिकारिक जानकारी के अनुसार वे Energy Science & Engineering विभाग में प्रोफेसर हैं और JEE Advanced से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। उनका अकादमिक रिकॉर्ड चाहे जितना मजबूत हो, वह किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं बनाता। उसी तरह किसी व्यक्ति पर आरोप लग जाना भी उसे अपराधी नहीं बना देता।

इस घटना का एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या भविष्य में शिक्षक परीक्षा में नकल करते हुए किसी विद्यार्थी को पकड़ने से डरेंगे? यदि नियमों के अनुसार कार्रवाई करने के बाद शिक्षक स्वयं गंभीर आरोपों से घिरने लगें तो परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर विद्यार्थियों को भी यह भरोसा होना चाहिए कि उनके साथ अपमान, भेदभाव या अन्याय नहीं होगा।

इसलिए IIT जैसे संस्थानों में स्पष्ट SOP यानी Standard Operating Procedure जरूरी है। परीक्षा में नकल पकड़े जाने पर क्या प्रक्रिया होगी, काउंसलर को कब बुलाया जाएगा, विद्यार्थी की मानसिक स्थिति का आकलन कैसे होगा, CCTV और डिजिटल साक्ष्य कैसे सुरक्षित रखे जाएंगे तथा गंभीर परिस्थिति में परिवार को कब सूचना दी जाएगी—इन सभी बातों की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए।

छात्र मानसिक स्वास्थ्य का प्रश्न भी इससे अलग नहीं किया जा सकता। IIT में प्रवेश पाने वाला विद्यार्थी कठिन प्रतिस्पर्धा और पारिवारिक अपेक्षाओं के बीच पहुंचता है। परीक्षा में गलती होने पर नियमों के अनुसार जवाबदेही तय होनी चाहिए, मगर एक परीक्षा या एक गलती को किसी विद्यार्थी के पूरे जीवन की पहचान नहीं बना देना चाहिए। परिवार, शिक्षक और संस्थान को यह संदेश देना होगा कि असफलता जीवन का अंत नहीं है।

सोशल मीडिया ने इस मामले को और जटिल बनाया है। एक पक्ष शिक्षक को पूरी तरह दोषी बता रहा है तो दूसरा पक्ष उन्हें पूरी तरह निर्दोष। जब जांच एजेंसी CCTV, डिजिटल साक्ष्य, मोबाइल फोन और गवाहों के बयान जैसे प्रमाणों की जांच करेगी तभी घटनाक्रम की पूरी तस्वीर सामने आएगी। सोशल मीडिया की अदालत न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकती।

इस मामले से एक और बात स्पष्ट होती है कि शिक्षक और विद्यार्थी को एक-दूसरे के सामने खड़ा करने के बजाय दोनों के अधिकारों की रक्षा करने वाली व्यवस्था चाहिए। शिक्षक को नियमों के अनुसार काम करने का संस्थागत संरक्षण मिले और विद्यार्थी को शिकायत करने का स्वतंत्र तथा सुरक्षित मंच।

आरक्षण और सामाजिक न्याय पर बहस भी तथ्यों और संविधान के दायरे में होनी चाहिए। ऐतिहासिक भेदभाव के कारण बनाए गए संवैधानिक प्रावधानों पर बहस और सुधार के सुझाव दिए जा सकते हैं। मगर किसी समुदाय के खिलाफ घृणा पैदा करके सामाजिक न्याय का समाधान नहीं निकलेगा। उसी तरह सामाजिक न्याय के नाम पर किसी निर्दोष व्यक्ति के साथ अन्याय भी स्वीकार्य नहीं हो सकता।

साहिल वाकोड़े की मौत दुखद है। यदि जांच में जातिगत भेदभाव या मानसिक प्रताड़ना के आरोप प्रमाणित होते हैं तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो जिन लोगों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, उनके अधिकार और प्रतिष्ठा भी सुरक्षित रहनी चाहिए। यदि परीक्षा में नकल हुई है तो उस पर संस्थान के नियमों के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। शिक्षक या कोई अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसके पद के कारण उसे बचाया नहीं जाना चाहिए।

अंततः सवाल किसी एक पक्ष की जीत का नहीं है। सवाल यह है कि क्या जांच निष्पक्ष होगी, क्या दोषी को दंड और निर्दोष को संरक्षण मिलेगा, क्या विद्यार्थी और शिक्षक दोनों की गरिमा सुरक्षित रहेगी और क्या जातिगत भेदभाव के खिलाफ संघर्ष तथा कानून के संभावित दुरुपयोग की चिंता—दोनों को साथ लेकर चला जा सकेगा।

किसी एक पक्ष की जीत न्याय नहीं होती। सत्य की जीत ही न्याय है।

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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