गौतम चौधरी
‘‘बचपन में नेनुआ-फरकिया, खगड़िया आदि की कहानियां सुनने को मिलती थी। वो कहानियां बेहद रोचक और रोमांचकारी होती थी। कहानियां का कोई लिखित साहित्य नहीं था लेकिन वह लोकस्मृतियों में जीवित थी और पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तानांतरित भी होती रही है। वह कहानियां मेरे जैसे बच्चों के लिए केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, अपितु मन-मस्तिष्क का निर्भता भी था। आज उन्हीं कहानियों में से एक आपके लिए लेकर आया हूं। तसल्ली से पढ़िए और आनंद उठाइए।’’
कहते हैं, फरकिया की धरती पर नदियाँ केवल बहती नहीं थीं, वे रास्ते भी बदलती थीं। जहाँ आज जल का अथाह विस्तार दिखाई देता है, वहाँ कभी खेत लहलहाते थे, बैलों की घंटियाँ बजती थीं, बच्चों की किलकारियाँ गूँजती थीं और शाम ढलते ही मंदिर की घंटियाँ पूरे गाँव में सुनाई देती थीं।
ऐसे ही एक गाँव के बीचों-बीच एक विशाल पीपल का वृक्ष था। इतना पुराना कि किसी को याद नहीं था उसे किसने लगाया था। यहां एक बात और बता दें कि गांव का पीपल, बड़गद, आम, महुआ, जामुन आदि का वृक्ष केवल वृक्ष नहीं होता वह गांव की संस्कृति का अंग होता है। हमारे तिरहुत में हो आम-महुआ के पूजन के बिना कोई मांगलिक कार्य ही संपन्न नहीं होता है। कथा को जारी रखते हैं-गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे, ‘जब तक पीपल खड़ा है, गाँव जीवित है।’ उसके नीचे पंचायत बैठती, वहीं यात्रियों को छाया मिलती और हर शुभ कार्य की शुरुआत उसी की परिक्रमा से होती।
उस वर्ष सावन कुछ अलग था। हिमालय से उतरती नदी का रंग बदल गया। पानी मटमैला था, धारा असामान्य रूप से तेज़ थी और रातों-रात खेतों में पानी भरने लगा। पहले लोगों ने सोचा, हर साल की तरह इस बार भी बाढ़ उतर जाएगी लेकिन इस बार नदी मानो अपना पुराना रास्ता छोड़कर नयी धारा तलाश रही हो।
कुछ ही दिनों में गाँव खाली होने लगा। लोग अपने बच्चों, मवेशियों और जितना बचा सकते थे, उतना सामान लेकर नावों पर सवार हो गए। हर किसी की आँखों में अपने घर का आखिरी दृश्य बस गया। गांव तो खाली हो गया लेकिन एक बूढ़ा व्यक्ति अब भी उस विशाल पीपल के नीचे बैठा था।
लोगों ने पुकारा,
‘बाबा! चलिए, देर हो जाएगी।’
बूढ़े ने मुस्कुराकर पीपल के तने पर हाथ फेरा और धीमे स्वर में कहा-‘घर छोड़ देना आसान है, बेटा.पर क्या कोई अपनी स्मृतियों को भी नाव पर लादकर ले जा सकता है? गाँव छोड़ दूँगा तो शरीर बच जाएगा, लेकिन मेरा मन कहाँ रहेगा?’
कहते हैं, उस रात नदी पूरे गाँव को अपने साथ बहा ले गई। घर, आँगन, मंदिर, कुएँ-सब रेत और पानी के नीचे समा गए। समय बीतता गया। लोगों ने दूसरी जगह नए गाँव बसा लिए। नई पीढ़ियाँ बड़ी हुईं। पुराना गाँव धीरे-धीरे कहानी बन गया।
फिर कई वर्षों बाद एक भीषण गर्मी आई। नदी की धारा फिर बदली। पानी पीछे हटा तो दूर रेत के बीच एक विशाल पीपल का सिरा दिखाई दिया। उसके पास कुछ पुरानी पकी ईंटें थीं, जैसे किसी भूले हुए आँगन की देहरी अब भी धरती को थामे खड़ी हो।
गाँव के सबसे बुज़ुर्ग ने उसे देखकर कहा-‘देखो, गाँव कभी पूरी तरह डूबते नहीं। वे पहले लोगों की यादों में बसते हैं, फिर कभी-कभी नदी भी उन्हें याद कर लेती है।’
यह कहानी इतिहास नहीं है लेकिन इतिहास का एक गहरा रूपक अवश्य है। कोसी और फरकिया की धरती पर नदियाँ केवल भूगोल नहीं बदलतीं; वे स्मृतियों का भी भूगोल रचती हैं। वे घरों को बहा ले जाती हैं, पर लोकस्मृति को नहीं। इसलिए इस अंचल के लोग कहते हैं-‘नदी रास्ता बदलती है, गाँव नहीं; गाँव तो वहाँ बसता है जहाँ उसकी कहानी सुनाने वाला कोई जीवित हो।’
