गौतम चौधरी
कूटनीति का इतिहास बताता है कि बड़े परिवर्तन प्रायः घोषणाओं से नहीं, संकेतों से आरंभ होते हैं। राष्ट्रों के बीच संबंधों में सार्वजनिक बयान, अनौपचारिक मुलाकातें, अकादमिक सम्मेलन और रणनीतिक विमर्श-ये सब मिलकर कई बार उस दिशा का संकेत देते हैं, जिसकी औपचारिक घोषणा बहुत बाद में होती है। इसलिए जब कुछ घटनाएँ एक क्रम में सामने आती हैं, तो उन्हें केवल संयोग मान लेना, कूटनीतिक दृष्टि से उतनी ही बड़ी भूल हो सकती है, जितनी उन्हें बिना पर्याप्त प्रमाण नीति-परिवर्तन का संकेत मान लेना।
पिछले कुछ समय में भारत-पाक संबंधों को लेकर ऐसी ही कुछ घटनाएँ सामने आई हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेतृत्व की ओर से बार-बार संकेत दिया जा रहा है कि पाकिस्तान के साथ संवाद के द्वार पूरी तरह बंद नहीं होने चाहिए। इसके बाद श्रीलंका के कोलंबो में आयोजित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ (IISS) के सम्मेलन में भारतीय और पाकिस्तानी रणनीतिक विशेषज्ञों की उपस्थिति को लेकर विभिन्न प्रकार की व्याख्याएँ सामने आईं। कुछ ने इसे संभावित ‘ट्रैक-2’ संवाद का प्रारंभिक संकेत माना, जबकि प्रतिभागियों और भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक बहुपक्षीय रणनीतिक सम्मेलन था, न कि कोई औपचारिक भारत-पाक वार्ता।
यहीं से प्रश्न प्रारंभ होते हैं। क्या ये घटनाएँ वास्तव में परस्पर असंबद्ध हैं, या बदलते वैश्विक परिदृश्य में किसी व्यापक रणनीतिक सोच की झलक देती हैं?
आज विश्व राजनीति का केंद्र तेजी से बदल रहा है। अमेरिका की प्राथमिकता अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र और चीन की बढ़ती शक्ति है। वह भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है और स्वाभाविक रूप से चाहता है कि दक्षिण एशिया अपेक्षाकृत स्थिर रहे। चीन, जो पाकिस्तान का सबसे निकट सहयोगी है, वह भी भारत-पाक के बीच किसी व्यापक सैन्य गतिरोध से बचना चाहेगा, क्योंकि ऐसी स्थिति चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) सहित उसके दीर्घकालिक हितों को प्रभावित कर सकती है। यूरोप और ब्रिटेन भी लंबे समय से इस क्षेत्र में तनाव-नियंत्रण और संवाद-आधारित कूटनीति के पक्षधर रहे हैं।
इन वैश्विक परिस्थितियों के बीच भारत की रणनीतिक चुनौतियाँ भी बदल चुकी हैं। पाकिस्तान के साथ आतंकवाद और सीमा सुरक्षा का प्रश्न आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है, किंतु वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के साथ बढ़ा तनाव भारत की दीर्घकालिक सामरिक प्राथमिकताओं को नई दिशा दे रहा है। ऐसे में यह विचार स्वाभाविक रूप से उभरता है कि यदि पश्चिमी सीमा अपेक्षाकृत शांत हो, तो भारत अपनी सामरिक, आर्थिक और सैन्य ऊर्जा को उत्तरी सीमा पर अधिक प्रभावी ढंग से केंद्रित कर सकता है।
रणनीतिक दृष्टि से यह विचार आकर्षक अवश्य है, पर इसकी सबसे बड़ी शर्त है-विश्वसनीय सुरक्षा वातावरण। भारत का अनुभव आशावाद से अधिक सतर्कता का रहा है। लाहौर बस यात्रा के बाद कारगिल, शांति प्रक्रिया के बाद संसद पर हमला, फिर मुंबई, उरी और पुलवामा जैसी घटनाओं ने यह स्पष्ट किया कि केवल संवाद विश्वास का आधार नहीं बन सकता। जब तक सीमा पार आतंकवाद पर ठोस, सत्यापित और स्थायी परिवर्तन दिखाई न दे, तब तक किसी भी नई पहल के प्रति स्वाभाविक संदेह बना रहेगा।
इसी संदर्भ में कोलंबो सम्मेलन को लेकर उठी चर्चा का महत्व भी समझा जाना चाहिए। उपलब्ध सार्वजनिक तथ्यों के अनुसार यह किसी औपचारिक द्विपक्षीय वार्ता का मंच नहीं था। न कोई संयुक्त घोषणा हुई, न कोई सरकारी प्रक्रिया आरंभ हुई। इसलिए इसे भारत-पाक संबंधों में किसी निर्णायक परिवर्तन का प्रमाण कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। किंतु इसे पूरी तरह महत्वहीन मान लेना भी जल्दबाजी होगी, क्योंकि इतिहास बताता है कि अनेक बार भविष्य की कूटनीतिक प्रक्रियाओं की वैचारिक भूमिका ऐसे ही अनौपचारिक मंचों पर तैयार होती है।
वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद होना चाहिए या नहीं। प्रश्न यह है कि संवाद किस उद्देश्य से हो, किन शर्तों पर हो और उसका अंतिम परिणाम भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा तथा दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के अनुकूल हो या नहीं।
भारतीय विदेश नीति की मूल कसौटी यही रही है कि शांति का स्वागत किया जाए, किंतु सुरक्षा की कीमत पर नहीं। यदि भविष्य में भारतदृपाक संबंधों में कोई नया अध्याय खुलता है, तो उसकी सफलता केवल सद्भावनापूर्ण वक्तव्यों से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर सत्यापित आचरण से तय होगी।
फिलहाल उपलब्ध घटनाक्रम किसी अंतिम निष्कर्ष की ओर नहीं ले जाते। वे केवल इतना संकेत अवश्य देते हैं कि दक्षिण एशिया की कूटनीति एक नए दौर की दहलीज़ पर खड़ी हो सकती है। यह परिवर्तन वास्तविक है या केवल परिस्थितिजन्य व्याख्या-इसका उत्तर आने वाला समय देगा।
तब तक भारत के लिए सबसे विवेकपूर्ण नीति वही होगी जिसने अब तक उसकी विदेश नीति को दिशा दी है-संवाद के प्रति खुलेपन के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति अडिग सतर्कता। क्योंकि कूटनीति में संकेतों का महत्व होता है, परंतु राष्ट्रों का भविष्य अंततः संकेतों से नहीं, विश्वास के प्रमाणों से तय होता है। फिलहाल भारत-पाक के बीच जो भी हो रहा है, इसी संदर्भ में देखा जाना उचित रहेगा।
