गौतम चौधरी
इतिहास केवल बीते समय का दस्तावेज नहीं होता; वह भविष्य की आहट भी देता है। कई बार ऐसी घटनाएँ घटती हैं जो अपने आप में सामान्य प्रतीत होती हैं लेकिन उनके भीतर बदलती विश्व-राजनीति की गहरी ध्वनि छिपी होती है। ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया स्थित डॉल्फिन टंग्स्टन खदान (Dolphin Tungsten Mine) का लगभग तीन दशक बाद पुनः सक्रिय होना ऐसी ही एक घटना है।
पहली नज़र में यह एक खनन परियोजना का पुनरुद्धार भर लगता है लेकिन यदि इसे वैश्विक सामरिक परिदृश्य के व्यापक संदर्भ में देखा जाए, तो यह केवल एक औद्योगिक या स्थानीय आर्थिक निर्णय भर नहीं है, बल्कि बदलती भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत भी है।
जर्मन मीडिया संस्थान ’’डॉयचे वेले (DW)’’ ने अपने एक विश्लेषण में इस खदान के इतिहास और वैश्विक युद्धों के बीच एक रोचक समानता की ओर ध्यान दिलाया है। प्रथम विश्व युद्ध के दौर में इसका विकास हुआ, द्वितीय विश्व युद्ध से पहले इसकी गतिविधियाँ तेज हुईं, कोरियाई और वियतनाम युद्धों के दौरान इसकी सामरिक उपयोगिता बढ़ी, जबकि शीत युद्ध के बाद वैश्विक मांग घटने पर यह लगभग निष्क्रिय हो गई। अब, जब विश्व फिर से तीव्र सामरिक प्रतिस्पर्धा के दौर में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है, यह खदान दोबारा खुल चुकी है।
यह प्रश्न स्वाभाविक हैकृक्या यह केवल संयोग है, या बदलती विश्व व्यवस्था का कोई मौन संकेत? इसका उत्तर सरल नहीं है। यह कहना अतिरंजित होगा कि किसी खदान का खुलना तीसरे विश्वयुद्ध की घोषणा है। किंतु यह कहना भी वास्तविकता से आँखें चुराना होगा कि इसका कोई सामरिक अर्थ नहीं है। इतिहास बताता है कि जब भी महाशक्तियाँ दीर्घकालिक सैन्य प्रतिस्पर्धा की तैयारी करती हैं, तो सबसे पहले वे उन संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करती हैं जिन पर आधुनिक युद्ध की पूरी संरचना टिकी होती है।
आज उन संसाधनों में टंग्स्टन सबसे महत्वपूर्ण धातुओं में शामिल है। टंग्स्टन केवल एक औद्योगिक धातु नहीं है। इसकी असाधारण कठोरता और उच्च ताप-सहन क्षमता इसे कवच-भेदी गोला-बारूद, हाइपरसोनिक हथियारों, मिसाइलों, लड़ाकू विमानों, ड्रोन, रक्षा उपकरणों तथा अत्याधुनिक मशीन टूल्स के निर्माण के लिए अनिवार्य बनाती है। यही कारण है कि सामरिक विश्लेषक इसे अक्सर “वार मेटल” (War Metal) की संज्ञा देते हैं।
यहीं से इस पूरे घटनाक्रम का वास्तविक अर्थ सामने आता है। आज दुनिया के अधिकांश टंग्स्टन उत्पादन और उसके प्रसंस्करण पर चीन का प्रभाव है। यदि भविष्य में ताइवान, दक्षिण चीन सागर अथवा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में कोई बड़ा सैन्य संकट उत्पन्न होता है, तो पश्चिमी देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सैन्य शक्ति की नहीं होगी; उससे भी बड़ी चुनौती होगीकृटंग्स्टन, दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earths), गैलियम, जर्मेनियम और एंटिमनी जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की निर्बाध आपूर्ति।
यही कारण है कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, जापान और कनाडा पिछले कुछ वर्षों से अपनी ’’क्रिटिकल मिनरल्स रणनीति’’ और ’’सप्लाई चेन सुरक्षा’’ पर असाधारण निवेश कर रहे हैं। डॉल्फिन खदान का पुनर्जीवन इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा अधिक दिखाई देता है, न कि किसी तात्कालिक युद्ध की तैयारी का प्रत्यक्ष संकेत।
वास्तविकता यह है कि 21वीं सदी में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। सेनाएँ अब केवल सीमाओं पर नहीं खड़ी होतीं; वे आपूर्ति शृंखलाओं, समुद्री व्यापार मार्गों, सेमीकंडक्टर संयंत्रों, ऊर्जा नेटवर्कों और खनिज संसाधनों के रूप में भी मौजूद रहती हैं।
आज आर्थिक प्रतिबंध, तकनीकी नियंत्रण, साइबर हमले, आपूर्ति शृंखला का पुनर्गठन और महत्वपूर्ण खनिजों पर नियंत्रण-ये सब आधुनिक भू-राजनीतिक संघर्ष के नए हथियार बन चुके हैं। इसलिए यदि बीसवीं सदी को तेल की भू-राजनीति ने परिभाषित किया था, तो इक्कीसवीं सदी को संभवतः ’’क्रिटिकल मिनरल्स की भू-राजनीति’’ परिभाषित करेगी।
भारत के लिए यह घटनाक्रम एक गंभीर संदेश भी लेकर आता है। राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ केवल मिसाइलों, युद्धपोतों और लड़ाकू विमानों की संख्या नहीं है। वास्तविक सामरिक शक्ति उस क्षमता में निहित होती है, जिसके माध्यम से कोई देश अपने महत्वपूर्ण खनिजों की खोज, खनन, प्रसंस्करण, भंडारण और आपूर्ति को सुरक्षित रख सके। भारत ने हाल के वर्षों में ’’राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल्स मिशन’’, लिथियम तथा अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और विदेशों में खनिज परिसंपत्तियों में निवेश जैसे कदम अवश्य उठाए हैं, किंतु वैश्विक प्रतिस्पर्धा की दृष्टि से अभी लंबी दूरी तय करनी शेष है।
वैसे जिस संकेतों या आहटों की चर्चा हो रही है वह गलत साबित हो। युद्ध किसी के लिए भी बेहतर नहीं है लेकिन डॉल्फिन टंग्स्टन खदान का पुनः खुलना न तो तीसरे विश्वयुद्ध की उद्घोषणा है और न ही इसे केवल एक सामान्य व्यावसायिक परियोजना मानकर नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। यह उस बदलती विश्व व्यवस्था का प्रतीक है, जहाँ युद्ध की तैयारी सीमाओं पर सैनिक तैनात करने से पहले खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करने से आरंभ होती है।
संभव है कि आने वाले वर्षों में इतिहासकार 2020 के दशक को केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उत्कर्ष का दशक न कहें, बल्कि उसे ’’क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक राजनीति’’ का निर्णायक दशक भी मानें। यदि ऐसा हुआ, तो डॉल्फिन टंग्स्टन खदान का पुनर्जीवन इतिहास के फुटनोट में दर्ज घटना नहीं रहेगा, बल्कि उस नए भू-राजनीतिक युग की प्रस्तावना माना जाएगा, जिसमें शक्ति का वास्तविक स्रोत केवल सैन्य क्षमता नहीं, बल्कि संसाधनों पर नियंत्रण होगा।
