लोकतंत्र की असली शक्ति शासन की विश्वसनीयता है, प्रशासन की वर्दी पर उठने लगे सवाल

लोकतंत्र की असली शक्ति शासन की विश्वसनीयता है, प्रशासन की वर्दी पर उठने लगे सवाल

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत केवल संविधान या चुनाव नहीं होते। उसकी वास्तविक शक्ति नागरिकों का वह विश्वास होता है कि राज्य की प्रत्येक कार्रवाई कानून के दायरे में, जवाबदेही के साथ और सार्वजनिक निगरानी के योग्य है। यही कारण है कि जब भी किसी विरोध-प्रदर्शन, धरना या जनआंदोलन के दौरान बल-प्रयोग होता है, तो चर्चा केवल लाठीचार्ज या गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहती; उससे जुड़े अनेक प्रश्न भी जन्म लेते हैं।

हाल के घटनाक्रमों के बाद भी कुछ ऐसे ही प्रश्न सामने आए हैं। सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर प्रसारित कुछ वीडियो तथा तस्वीरों के आधार पर यह सवाल उठाया गया कि क्या कुछ वर्दीधारी कर्मियों की पहचान स्पष्ट थी? यदि किसी की नेमप्लेट या पहचान-चिह्न दिखाई नहीं दे रहे थे, तो उसका कारण क्या था? क्या यह केवल दृश्य का भ्रम था, कोई परिचालन संबंधी कारण था, या वर्दी संबंधी नियमों का पालन नहीं हुआ? इन प्रश्नों का उत्तर अनुमान से नहीं, बल्कि तथ्यों और आधिकारिक स्पष्टीकरण से मिलना चाहिए।

निसंदेह रूप से उठ रहे सवाल का जवाब सत्ता प्रतिष्ठान को देना चाहिए। जहाँ सार्वजनिक हित जुड़ा हो, वहाँ सत्ता के विभिन्न प्रतिष्ठानों से जवाब माँगना स्वाभाविक है। यदि नागरिकों के मन में किसी कार्रवाई को लेकर संदेह उत्पन्न हुआ है, तो उस संदेह को केवल ष्षड्यंत्रष् या ष्दुष्प्रचारष् कहकर खारिज कर देना लोकतांत्रिक दृष्टि से पर्याप्त उत्तर नहीं है। विश्वास तभी बनता है, जब प्रश्नों का उत्तर पारदर्शिता से दिया जाता है।

भारत में पिछले एक दशक में निजी सुरक्षा उद्योग का विस्तार उल्लेखनीय रहा है। देश भर में लाखों निजी सुरक्षा कर्मी औद्योगिक परिसरों, हवाई अड्डों, बंदरगाहों, डेटा सेंटरों, आवासीय परिसरों और कॉर्पाेरेट प्रतिष्ठानों की सुरक्षा में लगे हैं। यह आधुनिक अर्थव्यवस्था की स्वाभाविक आवश्यकता भी है। लेकिन इसी कारण एक सिद्धांत और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है-राज्य की वैध शक्ति और निजी सुरक्षा की भूमिका के बीच कुछ न कुछ तो दूरी होनी चाहिए।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में भीड़ नियंत्रण, गिरफ्तारी, लाठीचार्ज और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार केवल विधिसम्मत राज्य संस्थाओं के पास है। इसलिए यदि कभी किसी कार्रवाई के दौरान पहचान, अधिकार या प्रक्रिया को लेकर प्रश्न उठते हैं, तो उनका स्पष्ट उत्तर देना सरकार और संबंधित एजेंसियों दोनों के हित में होता है। इससे न केवल नागरिकों का विश्वास बढ़ता है, बल्कि पुलिस और सुरक्षा बलों की संस्थागत विश्वसनीयता भी मजबूत होती है।

इतिहास हमें एक और सावधानी भी सिखाता है। जब राज्य, व्यापार और शक्ति के संबंधों पर प्रश्न उठते हैं, तो समाज स्वाभाविक रूप से संवेदनशील हो जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर कॉर्पाेरेट संस्था राजनीति में हस्तक्षेप कर रही है और न ही यह कि हर जनआंदोलन के पीछे कोई विदेशी या आंतरिक षड्यंत्र होता है। दोनों प्रकार के निष्कर्ष प्रमाण के बिना समान रूप से खतरनाक हैं। लोकतंत्र में किसी भी पक्ष के बारे में अंतिम निर्णय साक्ष्यों के आधार पर ही होना चाहिए लेकिन सवाल का जवाब भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

यही कारण है कि सार्वजनिक विमर्श में संतुलन आवश्यक है। यदि कोई बिना प्रमाण किसी आंदोलन को विदेशी साज़िश बता देता है, तो वह लोकतांत्रिक विवेक के विरुद्ध है। उसी प्रकार बिना ठोस साक्ष्य किसी संगठन, कंपनी या समूह पर आरोप लगा देना भी उतना ही अनुचित है लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि नागरिक प्रश्न पूछना बंद कर दें। प्रश्न पूछना लोकतंत्र का अधिकार है; उत्तर देना लोकतंत्र की जिम्मेदारी।

वास्तव में किसी भी संवेदनशील घटना के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होता कि किसने क्या कहा। सबसे बड़ा प्रश्न यह होता है कि क्या संस्थाएँ स्वयं आगे बढ़कर तथ्यों को सार्वजनिक करेंगी? क्या बल-प्रयोग की प्रक्रिया, आदेश-श्रृंखला, पहचान और जवाबदेही की समीक्षा होगी? क्या भविष्य में ऐसी स्थितियों के लिए और अधिक पारदर्शी मानक विकसित किए जाएँगे?

लोकतंत्र में शक्ति का नैतिक आधार केवल कानून नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास है और विश्वास की नींव पारदर्शिता पर टिकी होती है। इसलिए यदि किसी कार्रवाई के बाद नागरिकों के मन में प्रश्न उठते हैं, तो उनका सबसे अच्छा उत्तर आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, स्पष्ट संवाद और संस्थागत जवाबदेही है।

लोकतंत्र की रक्षा केवल पुलिस की लाठियों से नहीं होती; वह उन नामपट्टों, पहचान-चिह्नों, नियमों और प्रक्रियाओं से भी होती है जो नागरिकों को यह भरोसा दिलाते हैं कि राज्य की शक्ति कानून से संचालित है, किसी अदृश्य शक्ति से नहीं। या कोई डीप स्टेट या फिर फेक शक्तियां राष्ट्र को नियंत्रित कर रही है। यही भरोसा किसी भी लोकतांत्रिक गणराज्य की सबसे बड़ी पूँजी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »