बाब अल-मंडेब पर हूतियों के पहरे से संकट में वैश्विक व्यापार

बाब अल-मंडेब पर हूतियों के पहरे से संकट में वैश्विक व्यापार

यमन के हूती विद्रोहियों ने सोमवार, 20 जुलाई को एक चौंकाने वाली घोषणा की। उन्होंने सऊदी अरब पर तत्काल प्रभाव से नौसैनिक नाकाबंदी लगा दी है। हूती ईरान समर्थित एक सशस्त्र समूह है। साल 2014 से राजधानी सना और उत्तरी यमन पर इनका कब्जा है। उन्होंने इस नाकाबंदी को आंख के बदले आंख की कार्रवाई बताया है। उनका आरोप है कि सऊदी अरब ने 2015 में यमन के गृहयुद्ध में दखल दिया था। तब से यमन की घेराबंदी की गई। हूतियों ने इसे अन्यायपूर्ण और दमनकारी बताया। हूती इस नाकाबंदी को कैसे लागू करेंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन इनके 2023 और 2024 के बीच लाल सागर में जहाजरानी पर किये गए हमले से सीख लेने की जरुरत है।

इस पूरे संकट का केंद्र बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य है। अरबी भाषा में इसका अर्थ आंसुओं का द्वार होता है। यह एक संकीर्ण जलमार्ग है। यह लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है। इसके एक तरफ यमन है। दूसरी तरफ अफ्रीका के हॉर्न में स्थित जिबूती और इरिट्रिया हैं। अपने सबसे संकीर्ण बिंदु पर यह केवल 29 किलोमीटर चौड़ा है। यह यूरोप के प्रवेश द्वार स्वेज नहर की ओर ले जाता है।

नाकाबंदी की यह घोषणा ऐसे समय आई है जब सऊदी अरब का दूसरा मुख्य समुद्री मार्ग भी बंद है। होर्मुज जलडमरूमध्य उत्तर में ईरान और दक्षिण में ओमान तथा संयुक्त अरब अमीरात के बीच स्थित है। फरवरी के अंत में अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच तनाव बढ़ा था। युद्ध जैसी स्थिति के बाद से यह मार्ग प्रभावी रूप से बंद है। तब से सऊदी अरब अपना तेल एशिया और अन्य स्थानों तक पहुँचाने के लिए ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का उपयोग कर रहा था। इसके जरिए तेल लाल सागर तक आता है और बाब अल-मंडेब से गुजरता है। अब इस मार्ग पर भी नाकाबंदी का खतरा मंडरा रहा है।

इस खतरे की जड़ें हाल के इतिहास में मौजूद हैं। अक्टूबर 2023 में गाजा युद्ध शुरू हुआ था। तब हूतियों ने फिलिस्तीनियों के साथ एकजुटता दिखाई। उन्होंने नवंबर 2023 से मार्च 2024 तक लाल सागर में कम से कम 40 जहाजों पर हमला किया। उनका दावा था कि जहाज इज़राइल से जुड़े थे। इसके जवाब में अमेरिका ने सहयोगियों के साथ कदम उठाया। उसने सिंगापुर और श्रीलंका के साथ मिलकर श्ऑपरेशन प्रोस्पेरिटी गार्जियनश् शुरू किया। यह दिसंबर 2023 में शुरू हुआ था। इसका उद्देश्य लाल सागर में नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना था। नवंबर 2023 और मार्च 2024 के बीच कम से कम 2,000 जहाजों ने स्वेज नहर का मार्ग छोड़ दिया। उन्होंने श्केप ऑफ गुड होपश् का लंबा चक्कर लगाकर यात्रा की। वैश्विक शिपिंग मार्ग प्रभावी रूप से 170 साल पीछे चले गए। मिस्र ने स्वेज नहर का एक-चौथाई राजस्व खो दिया। जुलाई 2024 तक इज़राइल के लाल सागर स्थित इलात बंदरगाह को खुद को दिवालिया घोषित करना पड़ा।

भारत पर इसका सीधा असर पड़ा था। जहाजों के लंबा रास्ता तय करने से महत्वपूर्ण आयातों में देरी हुई। आयात बिल महंगा हो गया। आज स्थिति अधिक अप्रत्याशित है। क्षेत्र में अमेरिकी बलों का पूरा ध्यान ईरान पर केंद्रित है। यह स्पष्ट नहीं है कि वे लाल सागर को पहले की तरह सुरक्षित करेंगे या नहीं। अमेरिका की यह व्यस्तता खतरे को बढ़ाती है। इस मार्ग पर हजारों भारतीय नाविक काम करते हैं। इस प्रकार की कोई भी नाकाबंदी उनकी सुरक्षा और कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी।

ऐसे में भारत मूकदर्शक नहीं बना रह सकता। 2024 में फ्रांस ने लेबनान में हिजबुल्लाह और इज़राइल के बीच मध्यस्थता के कारण अमेरिकी ऑपरेशन से दूरी बनाई थी। वे परिस्थितियां अब मौजूद नहीं हैं। फ्रांस और जापान को एशिया और यूरोप के साथ कनेक्टिविटी के लिए लाल सागर की आवश्यकता है। इन दोनों देशों ने लाल सागर के मुहाने पर जिबूती में सैन्य अड्डे बना रखे हैं। फ्रांस और जापान की नौसेनाओं ने भारतीय नौसेना के साथ संयुक्त अभ्यास किए हैं। यह तालमेल भारत के लिए 2024 जैसी घटनाओं को रोकने का अवसर है। भारत को अब सक्रिय रूप से एक श्व्यापार सुरक्षा कार्यबलश् (ज्तंकम च्तवजमबजपवद ज्ंेा थ्वतबम) बनाना चाहिए। यह कार्यबल फ्रांस और जापान के सहयोग से बनेगा।

इस प्रयास में मिस्र और सऊदी अरब को भी साथ जोड़ना चाहिए। 2024 में गाजा पर अपने रुख के कारण उन्होंने हूतियों के खिलाफ गठबंधन से दूरी बनाई थी। इस बार उनकी अपनी अर्थव्यवस्थाएं दांव पर हैं। इसलिए वे चुप नहीं रहेंगे। इस कार्यबल में सबकी भूमिका स्पष्ट होगी। भारत द्वारा संचालित श्इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर – इंडियन ओशन रीजनश् एक अहम भूमिका निभाएगा। यह केंद्र आवश्यक समुद्री क्षेत्र जागरूकता प्रदान करेगा। फ्रांस और जापान जिबूती से जमीनी और तार्किक सहायता देंगे। गठबंधन में शामिल नौसेनाएं एक नियम पर काम करेंगी। वे श्जॉइंट रूल्स ऑफ एंगेजमेंटश् (जुड़ाव के संयुक्त नियमों) पर सहमत होंगी। वे जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक और नागरिक जहाजों को सुरक्षा कवर देंगी। विशेष रूप से यूरोप, भारत या जापान जाने वाले जहाजों को एस्कॉर्ट किया जाएगा। यह कदम समुद्री नियमों और मानदंडों के सम्मान को सुनिश्चित करेगा। इस बार भारत के पास क्षमता और कूटनीतिक अवसर दोनों हैं। भारत इस रणनीति से बाब अल-मंडेब को सचमुच आंसुओं का द्वार बनने से रोक सकता है।( युवराज फीचर्स )

लेखक शैक्षिक संवाद मंच के संयोजक हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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