बाबूलाल नागा
नयी दिल्ली का जंतर-मंतर भारतीय लोकतंत्र का वह सार्वजनिक मंच है, जहां वर्षों से देश के अलग-अलग हिस्सों से आए किसान, छात्र, श्रमिक, महिलाएं, बेरोजगार युवा, सामाजिक संगठन और विभिन्न समुदाय अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाते रहे हैं। यह केवल विरोध का स्थल नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद का प्रतीक है। किसी भी लोकतंत्र की मजबूती इस बात से तय होती है कि वहां असहमति को कितनी जगह मिलती है और जन सरोकारों से जुड़े मुद्दे समाज तथा सत्ता तक किस प्रभाव से पहुंचते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह प्रश्न लगातार गहराता गया है कि क्या इन आंदोलनों की आवाज मुख्यधारा के मीडिया में उतनी जगह पा रही है, जितनी लोकतांत्रिक दृष्टि से मिलनी चाहिए? इसी सवाल ने वैकल्पिक मीडिया को एक नई पहचान और नई भूमिका प्रदान की है।
भारतीय लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है। उसकी भूमिका केवल घटनाओं की सूचना देना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना, जनमत तैयार करना और उन लोगों की आवाज़ को मंच देना भी है, जिनकी पहुंच सत्ता के गलियारों तक नहीं है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जनहित की रक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त करना रहा है। किंतु बदलते समय में मीडिया की कार्यप्रणाली, प्राथमिकताओं और बाजार आधारित प्रतिस्पर्धा ने उसकी दिशा को भी प्रभावित किया है। टीआरपी, विज्ञापन और तेज रफ्तार खबरों की होड़ में कई बार जन आंदोलनों, सामाजिक न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और हाशिए के समाज से जुड़े मुद्दे अपेक्षित स्थान नहीं पा पाते।
यही वह परिस्थिति है, जहां वैकल्पिक मीडिया ने अपनी अलग पहचान बनाई है। यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और अन्य डिजिटल मंचों पर सक्रिय स्वतंत्र पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और छोटे मीडिया प्लेटफॉर्म अब सीधे घटनास्थल से रिपोर्टिंग कर रहे हैं। हाथ में केवल एक मोबाइल फोन और इंटरनेट कनेक्शन के सहारे तैयार की गई ग्राउंड रिपोर्ट लाखों लोगों तक पहुंच रही है। यह तकनीक का लोकतंत्रीकरण है, जिसने सूचना के अधिकार को केवल बड़े मीडिया संस्थानों तक सीमित नहीं रहने दिया।
जंतर-मंतर पर आयोजित विभिन्न आंदोलनों में यह बदलाव साफ दिखाई देता है। कई बार ऐसा देखने को मिला कि मुख्यधारा के कुछ मीडिया संस्थानों की उपस्थिति सीमित रही, जबकि अनेक स्वतंत्र यूट्यूब चौनल और डिजिटल पत्रकार घंटों तक मौके पर मौजूद रहकर आंदोलनकारियों की बात देश के सामने रखते रहे। उन्होंने केवल मंच के भाषण नहीं दिखाए, बल्कि धरने पर बैठे लोगों की पीड़ा, उनके अनुभव, उनके सवाल और उनके संघर्ष को भी सामने लाया। इससे दर्शकों को घटनाओं को कई दृष्टिकोणों से समझने का अवसर मिला।
वैकल्पिक मीडिया की सबसे बड़ी ताकत उसकी तात्कालिकता और जमीनी उपस्थिति है। आज कोई भी नागरिक अपने मोबाइल फोन से वीडियो रिकॉर्ड कर सकता है, लाइव प्रसारण कर सकता है और अपनी बात हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। विशेष रूप से यूट्यूब और इंस्टाग्राम रील्स ने सूचना प्रसार का नया स्वरूप विकसित किया है। एक या दो मिनट की छोटी वीडियो भी किसी बड़े मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बना सकती है। यही कारण है कि आज कई सामाजिक और जन आंदोलनों को व्यापक पहचान डिजिटल माध्यमों से मिली है।
हालांकि इस परिवर्तन को केवल मुख्यधारा और वैकल्पिक मीडिया के बीच संघर्ष के रूप में देखना उचित नहीं होगा। मुख्यधारा का मीडिया आज भी लोकतंत्र का अत्यंत महत्वपूर्ण संस्थान है। उसके पास व्यापक संसाधन, अनुभवी पत्रकार और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने की क्षमता है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह जन सरोकारों से जुड़े मुद्दों को पर्याप्त स्थान देता रहे। दूसरी ओर, वैकल्पिक मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह केवल तेजी नहीं, बल्कि तथ्यपरकता, निष्पक्षता और जिम्मेदारी को भी अपनी पहचान बनाए। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए दोनों माध्यमों का विश्वसनीय होना आवश्यक है।
सोशल मीडिया के इस दौर में एक चुनौती भ्रामक सूचनाओं की भी है। बिना पुष्टि के वीडियो, अधूरी जानकारी और संदर्भ से काटकर प्रस्तुत सामग्री समाज में भ्रम पैदा कर सकती है। इसलिए वैकल्पिक मीडिया की विश्वसनीयता उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। यदि वह तथ्य जांच, संतुलित प्रस्तुति और नैतिक पत्रकारिता के सिद्धांतों का पालन करता है, तो उसकी स्वीकार्यता लगातार बढ़ेगी।
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। यह अधिकार केवल बोलने का नहीं, बल्कि अपनी बात समाज तक पहुंचाने का भी है। जन आंदोलन इसी लोकतांत्रिक अधिकार की अभिव्यक्ति हैं और मीडिया उस अभिव्यक्ति का सेतु है। जब किसी आंदोलन की आवाज समाज तक पहुंचती है, तभी उस पर बहस होती है, जनमत बनता है और नीतियों में बदलाव की संभावना पैदा होती है। यदि किसी आवाज को मंच ही न मिले, तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर पड़ने लगता है।
आज यह स्पष्ट दिखाई देता है कि वैकल्पिक मीडिया केवल सूचना का माध्यम नहीं रह गया है। वह लोकतांत्रिक भागीदारी का एक महत्वपूर्ण उपकरण बन चुका है। गांवों से लेकर महानगरों तक, छोटे आंदोलनों से लेकर राष्ट्रीय अभियानों तक, उसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है। यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और लोकतांत्रिक परिवर्तन का भी संकेत है। जनता अब केवल समाचारों की उपभोक्ता नहीं रही, बल्कि सूचना निर्माण और प्रसार की सक्रिय भागीदार बन चुकी है।
समय की मांग है कि पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्य की ओर लौटेकृजनता के प्रति जवाबदेही, सत्ता से सवाल और समाज के कमजोर वर्गों की आवाज को सम्मान। मीडिया का दायित्व केवल सत्ता की गतिविधियों का प्रसारण करना नहीं, बल्कि उन लोगों की बात भी सामने लाना है जिनकी आवाज अक्सर भीड़ और शोर में दब जाती है।
जंतर-मंतर की धरती से उठने वाली आवाजें हमें यही संदेश देती हैं कि लोकतंत्र केवल संसद में नहीं, बल्कि सड़कों, चौपालों और सार्वजनिक स्थलों पर भी जीवित रहता है। उन आवाजों को समाज तक पहुंचाने में यदि वैकल्पिक मीडिया ईमानदारी, तथ्यपरकता और जनहित के मूल्यों के साथ अपनी भूमिका निभाता है, तो वह केवल समाचार नहीं देगा, बल्कि लोकतंत्र को और अधिक जीवंत, सहभागी और जवाबदेह बनाने में ऐतिहासिक योगदान देगा। आने वाले वर्षों में संभव है कि इतिहास इस दौर को उस समय के रूप में याद करे, जब बड़े कैमरों से अधिक प्रभाव एक साधारण मोबाइल फोन ने पैदा किया और जब वैकल्पिक मीडिया ने जन आंदोलनों को नई शक्ति, नई पहचान और नई दिशा दी।
लेखक भारत अपडेट के संपादक हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
