अक्षपाद् गौतम
विगत लंबे समय से एक शांत प्रदेश जातीय हिंसा से जूझ रहा है। एक बार फिर स्थानीय सरकार ने प्रदेश के सभी शैक्षणिक संस्थाओं को बंद करने की घोषणा की है। मणिपुर में 20 से 22 अगस्त तक सभी शिक्षण संस्थानों को बंद रखने का सरकार का फैसला महज तीन दिनों की छुट्टी का प्रशासनिक आदेश नहीं है। यह उस गहरे संकट की एक और तस्वीर है जिसमें कानून-व्यवस्था की अस्थिरता का सीधा असर बच्चों, युवाओं और राज्य के भविष्य पर पड़ रहा है।
राज्य सरकार ने मौजूदा कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को बंद रखने का निर्णय लिया है। आदेश सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी संस्थानों के साथ-साथ विभिन्न बोर्डों से संबद्ध शिक्षण संस्थानों पर भी लागू है। सरकार के लिए यह कदम शायद तत्काल तनाव को नियंत्रित करने की आवश्यकता हो, लेकिन व्यापक प्रश्न यह है कि आखिर मणिपुर में ऐसी स्थिति बार-बार क्यों पैदा होती है, जिसमें सबसे पहले सामान्य जीवन और शिक्षा को रोकना पड़ता है?
शिक्षा किसी भी संकटग्रस्त समाज में सामान्य स्थिति की सबसे महत्वपूर्ण निशानी होती है। जब स्कूल खुले रहते हैं, परीक्षाएं समय पर होती हैं और बच्चे नियमित रूप से कक्षाओं में जाते हैं, तब समाज को यह संदेश मिलता है कि कठिनाइयों के बावजूद जीवन आगे बढ़ रहा है। इसके विपरीत, जब सुरक्षा कारणों से स्कूल बंद होने लगते हैं तो इसका अर्थ केवल पढ़ाई के कुछ दिन का नुकसान नहीं होता। यह सामाजिक विश्वास के कमजोर होने का संकेत भी है।
मणिपुर की समस्या इसलिए और गंभीर है क्योंकि राज्य लंबे समय से जातीय हिंसा और सामाजिक विभाजन के दुष्चक्र से जूझ रहा है। हिंसा का असर केवल उन इलाकों तक सीमित नहीं रहता जहां सीधे संघर्ष होता है। उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। बच्चों के भीतर भय, परिवारों में असुरक्षा और युवाओं में भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा होती है।
तीन दिन के लिए स्कूल बंद करना अपने आप में कोई असाधारण घटना नहीं है। संकट की स्थिति में प्रशासन के पास ऐसा निर्णय लेने के पर्याप्त कारण हो सकते हैं। भीड़ की गतिविधियों, संभावित हिंसा, विरोध-प्रदर्शन या सुरक्षा संबंधी खतरों के बीच बच्चों को विद्यालय भेजना जोखिमपूर्ण हो सकता है। इसलिए सरकार के निर्णय को केवल आलोचना की दृष्टि से देखना उचित नहीं है। यहां असली चिंता यह है कि अब अस्थायी उपाय स्थायी व्यवस्था का हिस्सा बनने लगे हैं।
मणिपुर में बार-बार स्कूल बंद करने की नौबत आती है तो सरकार को केवल यह नहीं बताना चाहिए कि स्कूल क्यों बंद किए गए। उसे यह भी बताना होगा कि उनके पास सामान्य शैक्षणिक गतिविधियों को सुरक्षित और निरंतर बनाए रखने की दीर्घकालिक योजना क्या है।
सबसे अधिक नुकसान उन विद्यार्थियों को होता है जिनके पास निजी संसाधन नहीं हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे ऑनलाइन शिक्षा, निजी ट्यूशन या वैकल्पिक शिक्षण व्यवस्था का लाभ उतनी आसानी से नहीं उठा सकते। बार-बार स्कूल बंद होने से उनकी पढ़ाई में जो व्यवधान पैदा होता है, वह धीरे-धीरे शैक्षणिक असमानता में बदल सकता है।
परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों की स्थिति और कठिन होती है। एक-दो दिन की पढ़ाई छूटना शायद बड़ी समस्या न लगे, लेकिन यदि इसके साथ इंटरनेट बंदी, परिवहन बाधित होना, कर्फ्यू या अन्य सुरक्षा प्रतिबंध भी जुड़ जाएं तो विद्यार्थियों की तैयारी और मानसिक स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं।
इसलिए सरकार को स्कूल बंद करने के साथ-साथ ’’लर्निंग कॉन्टिन्युटी प्लान’’ भी तैयार करना चाहिए। जहां संभव हो, डिजिटल माध्यम, सामुदायिक शिक्षण केंद्र, रिकॉर्डेड कक्षाएं और परीक्षा की वैकल्पिक समय-सारिणी जैसे उपायों का इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि इंटरनेट और डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता हर विद्यार्थी के लिए समान नहीं है।
इस पूरे संकट में शिक्षकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाले कर्मचारी नहीं हैं, वे संकटग्रस्त समाज में बच्चों को स्थिरता और भरोसा देने वाले महत्वपूर्ण सामाजिक स्तंभ बन सकते हैं। सरकार को शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण और मानसिक-सामाजिक सहायता की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि वे हिंसा और विस्थापन से प्रभावित विद्यार्थियों के साथ संवेदनशील ढंग से काम कर सकें।
यहां एक बात और महत्वपूर्ण है, शिक्षा व्यवस्था को बचाने के लिए केवल शिक्षा विभाग पर्याप्त नहीं है। मणिपुर की समस्या मूलतः राजनीतिक और सामाजिक है। जब तक हिंसा, अविश्वास और समुदायों के बीच गहरी होती दूरी का समाधान नहीं होगा, तब तक स्कूलों को बार-बार बंद करने के फैसले आते रहेंगे।
इसलिए सुरक्षा कार्रवाई के साथ संवाद की प्रक्रिया भी उतनी ही जरूरी है। राज्य सरकार, केंद्र सरकार, विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों, नागरिक संगठनों और युवाओं को बातचीत की ऐसी प्रक्रिया में शामिल करना होगा जिसमें केवल तत्काल शांति नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामाजिक समझौते की दिशा खोजी जा सके।
मणिपुर के बच्चों को संघर्ष की विरासत नहीं, सामान्य जीवन का अधिकार चाहिए। उन्हें यह भरोसा चाहिए कि उनका स्कूल अगले दिन खुलेगा, उनकी परीक्षा समय पर होगी और उनका भविष्य बंदूक, बंद और भय से तय नहीं होगा।
तीन दिन स्कूल बंद रखना शायद तत्काल सुरक्षा की आवश्यकता हो। लेकिन किसी भी सरकार की वास्तविक सफलता इस बात में होगी कि वह ऐसी परिस्थितियां कितनी जल्दी पैदा करती है जिसमें अगली बार स्कूल बंद करने की जरूरत ही न पड़े।
जब किसी राज्य में बार-बार स्कूल बंद होते हैं, तो केवल कक्षाएं नहीं रुकतीं, भविष्य की गति भी धीमी पड़ती है। मणिपुर के बच्चों को सबसे अधिक जरूरत इसी भविष्य को फिर से खोलने की है।
आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
