गौतम चौधरी
सोन नदी के पानी को लेकर बिहार और झारखंड के बीच करीब ढाई दशक से चला आ रहा विवाद आखिरकार समाप्त हो गया। 31 अगस्त को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत 1973 में अविभाजित बिहार को मिले सोन के 7.75 मिलियन एकड़-फुट (MAF) पानी में से बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को 2 MAF मिलेगा।
निश्चित रूप से यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक उपलब्धि है। दो राज्यों के बीच वर्षों से चला आ रहा विवाद समाप्त हुआ है। लेकिन इस समझौते को केवल ‘सहकारी संघवाद की जीत’ कहकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। **सोन के पानी का असली सवाल अब शुरू होता है।
लगभग 784 किलोमीटर लंबी सोन नदी अमरकंटक से निकलकर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार से गुजरते हुए गंगा में मिलती है। इसका जलग्रहण क्षेत्र करीब 71 हजार वर्ग किलोमीटर है। मानसून में यह नदी उफनती है और गर्मियों में इसका प्रवाह तेजी से घट जाता है। यही सोन की सबसे बड़ी विडंबना है—बाढ़ के समय पानी का अतिरेक और जरूरत के समय पानी का अभाव।
बिहार इस विडंबना का सबसे बड़ा साक्षी है। सोन बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा भी रही है। इसकी नहर प्रणाली ने दक्षिण-पश्चिमी बिहार के विशाल कृषि क्षेत्र को सिंचाई दी। रोहतास, भोजपुर, बक्सर, कैमूर, औरंगाबाद और आसपास के इलाकों की खेती सोन के पानी पर निर्भर रही है। लेकिन यही नदी मानसून में भोजपुर और पटना के निचले इलाकों के लिए बाढ़ और जलभराव का संकट भी पैदा करती है। बिहार के लिए सोन इसलिए केवल नदी नहीं—बरकत और संकट, दोनों का नाम है।

बाणसागर से इंद्रपुरी तक
सोन के जल की राजनीति को 1973 के बाणसागर समझौते से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उस समय मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और अविभाजित बिहार के बीच सोन के 14.25 MAF पानी का बंटवारा हुआ था। मध्य प्रदेश को 5.25 MAF, उत्तर प्रदेश को 1.25 MAF और बिहार को 7.75 MAF मिला।
मध्य प्रदेश में सोन पर बने बाणसागर बांध ने नदी के प्रवाह को नियंत्रित करने की क्षमता पैदा की। अब बिहार में प्रस्तावित इंद्रपुरी/कदवन जलाशय इसी जल-व्यवस्था की अगली महत्वपूर्ण कड़ी बन सकता है। यहीं बिहार के लिए समझौते का सबसे बड़ा अवसर छिपा है।
यदि मानसून में सोन के अतिरिक्त पानी को बड़े पैमाने पर संग्रहित कर लिया जाए और जरूरत के समय उसे सिंचाई के लिए छोड़ा जाए, तो एक साथ दो समस्याओं से निपटने की संभावना बन सकती है—बाढ़ और सूखा। इसके लिए केवल जलाशय बनाना पर्याप्त नहीं होगा। नहरों का आधुनिकीकरण, जल-वितरण की दक्षता, भूजल पुनर्भरण और खेत के अंतिम छोर तक पानी पहुंचाना भी जरूरी होगा।

बिहार ने पाया भी, खोया भी
समझौते का एक दूसरा पक्ष भी है। 1973 में अविभाजित बिहार के लिए निर्धारित 7.75 MAF अब बिहार के पास नहीं रहेगा। उसका लगभग 26 प्रतिशत हिस्सा झारखंड को जाएगा। इसलिए इसे बिहार की पूर्ण जीत कहना भी सही नहीं होगा। इसे बिहार की हार कहना भी उतना ही गलत होगा।
बिहार ने अपने हिस्से के पानी के उपयोग को लेकर लंबे विवाद की अनिश्चितता समाप्त की है। अब 5.75 MAF की स्पष्ट हिस्सेदारी के आधार पर वह दीर्घकालीन जल परियोजनाओं की योजना बना सकता है। झारखंड को भी अपने हिस्से की स्पष्ट मान्यता मिली है। इस अर्थ में यह समझौता किसी एक पक्ष की जीत नहीं, बल्कि लंबे विवाद से बाहर निकलने का व्यावहारिक रास्ता है।

एक असुविधाजनक सवाल बाकी है
क्या बिहार अपने 5.75 MAF का पूरा लाभ उठा पाएगा? यही असली परीक्षा है। कागज पर पानी का हिस्सा निर्धारित करना आसान है। उसे खेत तक पहुंचाना कठिन। सोन का प्राकृतिक प्रवाह अत्यधिक मौसमी है। जलवायु परिवर्तन के दौर में वर्षा की अनिश्चितता और बढ़ सकती है। कम समय में अत्यधिक बारिश और फिर लंबे समय तक सूखा—दोनों स्थितियां भविष्य की जल-व्यवस्था को चुनौती देंगी। इसलिए बिहार की जल नीति का लक्ष्य केवल अधिक पानी हासिल करना नहीं होना चाहिए। लक्ष्य होना चाहिए—उपलब्ध पानी का अधिकतम और टिकाऊ उपयोग।

सोन को सिर्फ बांधों की श्रृंखला मत बनाइए
यहां पर्यावरण का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बाणसागर से लेकर इंद्रपुरी तक यदि नदी पर जलाशयों और बांधों की श्रृंखला बढ़ती है, तो नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित होगा। मछलियों, आर्द्रभूमियों, भूजल और नदी पर निर्भर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ सकता है।
इसलिए हर जल परियोजना के साथ यह सुनिश्चित करना होगा कि सोन में न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह बना रहे। नदी का पानी बांटा जा सकता है, लेकिन नदी की पारिस्थितिकी को राज्यों की सीमा में बांटा नहीं जा सकता।

अब जरूरत सोन बेसिन की साझा नीति की है
31 अगस्त का समझौता तभी ऐतिहासिक साबित होगा, जब इसे केवल बिहार और झारखंड के बीच पानी बांटने का दस्तावेज न मानकर पूरे सोन बेसिन की समेकित जल नीति की शुरुआत बनाया जाए। मध्य प्रदेश के बाणसागर से लेकर उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार होते हुए गंगा तक सोन को एक ही जल-तंत्र के रूप में देखना होगा।
किस राज्य में कितना पानी गिरता है, कितना रोका जाता है, कितना छोड़ा जाता है, कितनी सिंचाई होती है, कितनी बाढ़ आती है और नदी में पर्यावरणीय प्रवाह कितना रहना चाहिए—इन सभी सवालों का जवाब एक साझा वैज्ञानिक व्यवस्था में तलाशना होगा।
बिहार के लिए खास चुनौती यह है कि वह नदी के निचले प्रवाह में है। उसे ऊपर के क्षेत्रों से आने वाले पानी की बाढ़ भी झेलनी है और गर्मियों में उसी पानी की कमी भी। इसलिए बिहार को केवल पानी का हिस्सा नहीं, पानी की निश्चितता चाहिए।

समझौते की असली सफलता खेतों में दिखाई देगी
सोन समझौता एक लंबी राजनीतिक खींचतान का अंत है। यह स्वागतयोग्य है। मगर इसकी सफलता हस्ताक्षर समारोह में नहीं, आने वाले वर्षों में बिहार और झारखंड के खेतों, गांवों और नदी के प्रवाह में दिखाई देगी।
यदि बिहार अपने 5.75 MAF हिस्से का प्रभावी उपयोग कर पाया, इंद्रपुरी जैसी परियोजनाओं को वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से आगे बढ़ाया, सोन की बाढ़ को नियंत्रित करने की क्षमता बढ़ाई और सिंचाई का पानी खेत के अंतिम छोर तक पहुंचाया—तो यह समझौता दक्षिण बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए ऐतिहासिक साबित हो सकता है।
और यदि झारखंड भी अपने 2 MAF हिस्से का उपयोग जल-सुरक्षा, सिंचाई और स्थानीय विकास के लिए करता है, तो यह समझौता दोनों राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग का मॉडल बन सकता है।
लेकिन इसके लिए एक बुनियादी बात नहीं भूलनी होगी—पानी का बंटवारा समस्या का समाधान नहीं है; पानी का न्यायपूर्ण, कुशल और टिकाऊ प्रबंधन ही वास्तविक समाधान है।
सोन हमें यही सिखाती है।
बाढ़ के समय वह अभिशाप है, सूखे के समय वरदान की तलाश। अब चुनौती यह है कि विज्ञान, नीति और दूरदृष्टि के जरिए उसे दोनों राज्यों के लिए स्थायी वरदान बनाया जाए। क्योंकि सवाल अंततः यह नहीं है कि बिहार को 5.75 MAF मिला और झारखंड को 2 MAF. सवाल यह है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सोन में कितना पानी बचेगा।
