रामस्वरूप रावतसरे
कांग्रेस की राजनीति आज एक ऐसे वैचारिक दोराहे पर खड़ी है, जहां दिल्ली और हिमाचल प्रदेश के सुर आपस में टकरा रहे हैं। एक तरफ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पूरे देश में जातीय जनगणना और ओबीसी कॉलम जोड़ने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बना रहे हैं तो दूसरी तरफ हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने स्कूल-कॉलेज के एडमिशन फॉर्म से जाति का कॉलम हमेशा के लिए हटाने का फैसला सुना दिया है। एक ही पार्टी के भीतर ’’जाति गिनो’’ और ’’जाति मिटाओ’’ का यह खुला अंतर्विरोध महज नीतिगत अंतर नहीं बल्कि 2027 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनावों के नफा-नुकसान से जुड़ा सियासी गणित बताया जाता हैं।
हाल ही में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने ये निर्देश दिया है कि स्कूल से लेकर कॉलेज तक के एडमिशन फॉर्म से जाति का कॉलम हमेशा के लिए हटा दिया जाए। इसके पीछे तर्क ये है कि इससे जातिवाद खत्म होने में मदद मिलेगी। इधर केन्द्र में मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ओबीसी के लिए कॉलम जोड़ने की जिद पर अड़े हैं और सीएम सुक्खू ने एडमिशन फॉर्म से जाति का कॉलम ही हटा दिया है। जानकारों के अनुसार ये विशुद्ध रूप से वैचारिक भटकाव है लेकिन ये भटकाव क्यों है? इसके पीछे सियासी वजहें क्या हैं! इसे भी जानना जरूरी है।
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने घोषणा की है कि राज्य के स्कूलों के एडमिशन फॉर्म से जाति का कॉलम हमेशा के लिए हटा दिया जाएगा। जाति का कॉलम हटाने का यह नियम न केवल स्कूलों बल्कि कॉलेजों के दाखिला फॉर्म और प्रोस्पेक्टस पर भी लागू होगा। यह नई व्यवस्था अगले शैक्षणिक सत्र से पूरी तरह लागू कर दी जाएगी। अनुसूचित जाति कल्याण बोर्ड की बैठक में सीएम सुक्खू ने कहा कि समाज से जातीय भेदभाव खत्म करने और समानता को बढ़ावा देने के लिए यह आवश्यक है। उन्होंने तर्क दिया कि बचपन में ही बच्चों की पहचान जाति से होने के कारण उनमें हीन या श्रेष्ठता की भावना आ जाती है जिससे उन्हें बचाना जरूरी है। इस फैसले से आरक्षित वर्गों अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी वर्ग के छात्रों को मिलने वाले लाभों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकारी योजनाओं, स्कॉलरशिप या आरक्षण का लाभ लेने के लिए छात्रों को स्वेच्छा से अपना जाति प्रमाण पत्र देना होगा।
हिमाचल सरकार ने जो फैसला किया है, उसे एक शब्द में कहें तो वहां की कांग्रेस सरकार शिक्षा व्यवस्था में जातिविहीन समाज की पैरवी कर रही है और इसके लिए मुख्यमंत्री ने स्कूल-कॉलेज के फॉर्म से जाति का कॉलम हटाने के निर्देश दिए हैं लेकिन कांग्रेस की केन्द्रीय लीडरशिप चाहती है कि हर कोई अपनी जाति के बारे में सरकार को बताए और सरकार उसे सार्वजनिक करे। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक संयुक्त पत्र लिखा है और उस पत्र में जातीय जनगणना के मौजूदा तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं क्योंकि सरकार ने फॉर्म में लोगों से सीधे अपनी जाति का नाम लिखने को कहा है।
राहुल गांधी के अनुसार ’’जनगणना फॉर्म में अलग-अलग जाति के बदले सरकार ’’पिछड़ा वर्ग’’ वाला कॉलम लाए ताकि ओबीसी की सही और वास्तविक संख्या का सटीक पता लग सके। अगर ऐसा नहीं होगा, तो ओबीसी का वास्तविक डेटा बिखर जाएगा क्योंकि एक ही जाति को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है।’’
अब सवाल है कि जब देश में अपनी-अपनी जाति घोषित करने की होड़ मची है और जब राहुल गांधी चाहते हैं कि सरकार जातीय जनगणना करवाए और ओबीसी के बारे में स्पष्ट रूप से पता करे, तब कांग्रेस के ही सीएम के जाति वाले कॉलम हटाने के फैसले का अर्थ क्या है? राहुल गांधी की नीति से सीएम सुक्खू अलग लाइन पर क्यों चल रहे हैं? जानकारों के अनुसार जब एक ही पार्टी से राज्य और केंद्रीय स्तर पर ’’जाति गिनो’’ और ’’जाति छुपाओ’’ के दो परस्पर विरोधी सुर निकलेंगे तो इसे अवसरवाद की पराकाष्ठा कहा जाएगा।
विश्लेषकों के अनुसार राजनीति में हर फैसला नफा-नुकसान को देखकर लिया जाता है। फर्क ये है कि राहुल गांधी अपने लाभ को देखते हुए ओबीसी वाली राजनीति कर रहे हैं और सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू अपने लाभ के लिए। असल में, राहुल गांधी अचानक ही ओबीसी पर इतने मेहरबान नहीं हुए है और ना ही वे किसी प्रयोजन के बिना जाति के आधार पर संसाधनों में हिस्सेदारी की पैरवी कर रहे हैं। मतलब, जिस वर्ग की जितनी आबादी, उस हिसाब से आरक्षण में उसका प्रतिशत हो। मंडल कमीशन के मुताबिक, देश में ओबीसी की आबादी करीब 52 प्रतिशत है।
वर्ष 2019 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को देश भर के कुल ओबीसी वोटर्स का केवल 15 प्रतिशत वोट मिला था। 2024 में राहुल गांधी ने ’’जातिगत जनगणना’’ और ’’आबादी के हिसाब से हक’’ वाला नैरेटिव दिया, तो कांग्रेस का ओबीसी वोट शेयर बढ़कर करीब 20 प्रतिशत हो गया। यही कारण है कि कांग्रेस जाति वाली राजनीति को आक्रामकता के साथ आगे बढ़ा रही है। राहुल गांधी अभी से 2029 की तैयारी कर रहे हैं लेकिन हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री को 2027 की फिक्र है क्योंकि अगले साल ही हिमाचल में विधानसभा चुनाव होना है।
हिमाचल प्रदेश में क्यों जाति खत्म करना चाहती है कांग्रेस? इसके पीछे भी हित संयोजन का कारण बताया जाता है। हिमाचल प्रदेश में सामान्य वर्ग की जनसंख्या आधे से ज्यादा है। ब्राह्मण और राजपूत मिलाकर करीब 51 प्रतिशत हैं जबकि अनुसूचित जाति करीब 25 प्रतिशत, ओबीसी साढ़े 13 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति की आबादी पौने छह प्रतिशत के आसपास बताई जाती है। ये कुल मिलाकर 44 प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा है।
हिमाचल प्रदेश की 68 में से 48 सीटों पर सामान्य वर्ग के मतदाताओं का असर रहता है। इन 48 सीटों में से गत विधान सभा चुनावों में सबसे ज्यादा 28 सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली थी जबकि भाजपा सिर्फ 17 सीटें जीत पाई थी। जानकारों के अनुसार इस फैसले के जरिए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू अपनी सरकार की छवि को एक ’’गैर-जातिवादी’’ और सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाली सरकार के रूप में पेश करना चाहते हैं ताकि सवर्ण मतदाताओं में नाराजगी कम की जा सके। विधानसभा चुनाव में सवर्णों का साथ उन्हें मिल सके।
जाहिर है कि सुक्खू और राहुल, दोनों अपने-अपने हिसाब से जाति की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं और यही कांग्रेस पार्टी का वैचारिक भटकाव बताया जा रहा है। डॉक्टर राममनोहर लोहिया के अनुसार ’’ जब राजनीति सिद्धांतों के बजाय केवल चुनावी गणित पर चलती है, तो वह अपने ही विचारों के विरोधाभास में फंसकर दम तोड़ देती है।’’ लेकिन कांग्रेस को ’’जाति गिनो’’ और ’’जाति छुपाओ’’ की नीति में अपना लाभ दिखाई देता है। इसमें ये कितने सफल होंगे, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा लेकिन एक ही समय में दो अलग-अलग भाषाएं बोलेंगे, तो जनता यह नहीं समझ पाएगी कि आपका असली गंतव्य क्या है! राजनीति में सिद्धांतों की स्पष्टता ही नेतृत्व की पहली शर्त मानी जाती है।
(युवराज फीचर्स)
आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
