गौतम चौधरी
आज दिल्ली का रामलीला मैदान केवल एक राजनीतिक सभा का साक्षी नहीं होगा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ‘बदलाव जरूरी है’ रैली को यदि अपेक्षित जनसमर्थन मिलता है, तो इसे भारतीय राजनीति के उस अध्याय की वापसी का संकेत भी माना जा सकता है, जिसे पिछले कुछ दशकों में लगभग अप्रासंगिक मान लिया गया था।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी CPI कभी देश की राजनीति की केंद्रीय धुरी हुआ करती थी। आज उसकी लोकसभा में उपस्थिति सीमित है और चुनावी प्रभाव भी पहले जैसा नहीं रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव में CPI को लगभग 0.49 प्रतिशत मत और दो सीटें मिलीं। इसलिए सामान्य चुनावी गणित के आधार पर CPI को राष्ट्रीय राजनीति की बड़ी ताकत मानने का कोई आधार नहीं है लेकिन राजनीति केवल चुनावी सीटों और वोट प्रतिशत से नहीं चलती। कई बार राजनीतिक विचार चुनावी पराजय के बावजूद समाज में जीवित रहते हैं और परिस्थितियाँ बदलते ही फिर प्रासंगिक हो जाते हैं। रामलीला मैदान की आज की रैली को इसी संदर्भ में देखना चाहिए।
CPI ने इस रैली को अचानक आयोजित नहीं किया है। इसके पहले 6 से 15 अगस्त तक देश के विभिन्न हिस्सों में पदयात्राएँ और जनसंपर्क अभियान चलाए गए। महंगाई, बेरोजगारी, किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी, श्रमिक अधिकार, सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा जैसे सवालों को लेकर पार्टी ने गाँवों और कस्बों तक पहुँच बनाने की कोशिश की है। यही इस पूरे अभियान की सबसे महत्वपूर्ण बात है।
आज CPI जिस मुद्दे को उठा रही है, वे किसी एक राजनीतिक दल के मुद्दे नहीं हैं। महंगाई हर परिवार का सवाल है। रोजगार हर युवा का सवाल है। किसानों की आय और फसल का उचित मूल्य ग्रामीण भारत का सवाल है। सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था आम आदमी की आवश्यकता है। यानी CPI उन सवालों को राजनीतिक एजेंडे पर ला रही है, जिनका संबंध सीधे नागरिक के जीवन से है। यहाँ मोदी सरकार की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले वर्षों में भारत ने तेज आर्थिक विकास, बुनियादी ढाँचे के विस्तार और वैश्विक स्तर पर अपनी राजनीतिक हैसियत बढ़ाने की कोशिश जरूर की है। लेकिन विकास की इस चमक के समानांतर बेरोजगारी, आय में असमानता, ग्रामीण संकट और परिवारों की वास्तविक क्रयशक्ति जैसे सवाल भी लगातार बने हुए हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी, महंगाई और असमानता महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दों के रूप में सामने आए थे। यही वह जगह है जहाँ वामपंथ को अपनी पुरानी जमीन फिर दिखाई दे सकती है।
फिलहाल यह निष्कर्ष निकालना भूल होगी कि मोदी सरकार की कथित विफलताओं से स्वतः CPI मजबूत हो जाएगी। भारतीय राजनीति में सत्ता से असंतोष का लाभ हमेशा वामपंथ को नहीं मिलता। उसका लाभ कांग्रेस, क्षेत्रीय दलों अथवा दूसरे विपक्षी दलों को भी मिल सकता है। इसलिए CPI के सामने चुनौती केवल मोदी सरकार की आलोचना करने की नहीं है। चुनौती यह है कि वह लोगों को यह विश्वास दिलाए कि उसके पास वर्तमान आर्थिक और सामाजिक संकट का वैकल्पिक रास्ता भी है। ‘बदलाव जरूरी है’ का नारा तभी राजनीतिक अर्थ ग्रहण करेगा, जब उसके साथ यह स्पष्ट हो कि बदलाव कैसा और किसके लिए? यहीं डी. राजा के नेतृत्व की परीक्षा है।
CPI महासचिव डी. राजा ने इस अभियान को केवल दिल्ली की एक रैली तक सीमित नहीं रखा है। उनका प्रयास है कि पार्टी को फिर से जनसंघर्षों के बीच ले जाया जाए। रोजगार, महंगाई, किसान, मजदूर, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों को एक साझा राजनीतिक विमर्श में जोड़ने की कोशिश इसी रणनीति का हिस्सा है।
यदि कल रामलीला मैदान में बड़ी भीड़ जुटती है, तो उसका श्रेय केवल डी. राजा को देना भी उचित नहीं होगा। CPI के पास दशकों पुराना कैडर नेटवर्क है। मजदूर संगठनों, किसान संगठनों, छात्र-युवा संगठनों और स्थानीय पार्टी इकाइयों का नेटवर्क आज भी मौजूद है।
फिर भी इस बात को कम करके नहीं आँका जा सकता कि इतने सीमित चुनावी संसाधनों वाली पार्टी यदि देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में लोगों को दिल्ली तक लामबंद कर पाती है, तो यह उसके संगठनात्मक पुनर्जीवन का संकेत होगा।
और यदि यह लामबंदी केवल पार्टी कार्यकर्ताओं तक सीमित न रहकर आम नागरिकों को भी आकर्षित करती है, तब इसका राजनीतिक महत्व कहीं अधिक बढ़ जाएगा।
राजनीतिक रैलियों में भीड़ का अपना आकर्षण होता है। लेकिन लोकतंत्र में भीड़ ही जनसमर्थन का अंतिम प्रमाण नहीं है। एक लाख लोग रामलीला मैदान में आ जाएँ, इससे CPI अगले चुनाव में एक लाख नए वोट पा जाएगी—ऐसा कोई सीधा गणित नहीं है लेकिन यदि सीमित आर्थिक संसाधनों वाली एक पुरानी वामपंथी पार्टी अपने आह्वान पर इतनी बड़ी संख्या में लोगों को दिल्ली ला पाती है, तो एक दूसरा प्रश्न जरूर उठेगा—
लोग आए क्यों? क्या वे केवल पार्टी कार्यकर्ता हैं, क्या वे महंगाई और बेरोजगारी से परेशान नागरिक हैं, क्या किसान और मजदूर अपने पुराने राजनीतिक प्रतिनिधित्व की तलाश में हैं, क्या युवा उस आर्थिक व्यवस्था से निराश हैं, जिसमें विकास के आंकड़े तो तेजी से बढ़ते दिखाई देते हैं, लेकिन उनके लिए स्थायी और सम्मानजनक रोजगार का सवाल अनुत्तरित रहता है? यही प्रश्न इस रैली को महज राजनीतिक आयोजन से आगे ले जाएगा।
CPI के सामने एक ऐतिहासिक अवसर है लेकिन उससे भी बड़ा खतरा है। यदि पार्टी केवल मोदी विरोध को अपनी राजनीति का आधार बनाती है, तो वह विपक्ष की अनेक पार्टियों में से एक बनकर रह जाएगी। यदि वह महंगाई और बेरोजगारी को वर्गीय प्रश्नों से जोड़ते हुए यह समझाने में सफल होती है कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक क्यों नहीं पहुँच रहा, सार्वजनिक संस्थाएँ क्यों कमजोर हो रही हैं, किसानों और श्रमिकों की सौदेबाजी की शक्ति क्यों घट रही है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता क्यों जरूरी है—तो वामपंथ की राजनीति को एक नई वैचारिक जमीन मिल सकती है। यही CPI की वास्तविक संभावना है।
वस्तुतः आज देश में वामपंथ के लिए परिस्थितियाँ paradoxical हैं। चुनावी ताकत पहले जैसी नहीं है, लेकिन जिन आर्थिक और सामाजिक सवालों को वह दशकों से उठाता रहा है, वे खत्म भी नहीं हुए हैं। बल्कि अनेक मामलों में वे और जटिल हुए हैं।
CPI की ‘बदलाव जरूरी है’ रैली को न तो एक दिन में वामपंथ की वापसी घोषित करना चाहिए और न ही उसे सामान्य राजनीतिक प्रदर्शन मानकर खारिज करना चाहिए। कल की भीड़ यदि बड़ी होती है, तो यह CPI के संगठन की ताकत का संकेत होगी। यदि उस भीड़ में बड़ी संख्या आम नागरिकों की दिखाई देती है, तो यह जनमिजाज में परिवर्तन का संकेत हो सकता है।
यदि इस रैली के बाद CPI देश के गाँवों, कारखानों, खेतों, विश्वविद्यालयों और मजदूर बस्तियों में अपने आंदोलन को लगातार विस्तार देती है, तब यह कहना उचित होगा कि भारतीय वामपंथ केवल अतीत की स्मृति नहीं रह गया है। यहाँ मोदी सरकार के लिए भी एक राजनीतिक संदेश छिपा है।
किसी भी लोकतंत्र में विपक्ष की कमजोरी अंततः सत्ता के लिए भी स्वस्थ स्थिति नहीं होती। मजबूत विपक्ष सत्ता को जवाबदेह बनाता है। और यदि आर्थिक असंतोष, बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक असमानता जैसे सवालों पर मुख्यधारा के विपक्ष के साथ-साथ वामपंथ भी अपनी जमीन बनाने लगता है, तो राष्ट्रीय राजनीति का विमर्श बदल सकता है। रामलीला मैदान कल शायद केवल CPI की ताकत नहीं बताएगा।
वह यह भी बताएगा कि भारत का आम नागरिक किस तरह की राजनीति सुनना चाहता है—सिर्फ उपलब्धियों की राजनीति या अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के सवालों की राजनीति। शायद इसी अर्थ में CPI का ‘बदलाव जरूरी है’ नारा सबसे पहले स्वयं CPI के लिए भी है। उसे अपने अतीत की विरासत से बाहर निकलकर वर्तमान भारत के नए श्रमिक, नए किसान, नए युवा और नए मध्यवर्ग से संवाद करना होगा। यदि वह ऐसा कर पाती है, तो कल की रैली केवल एक भीड़ नहीं होगी। वह भारतीय राजनीति में एक भूले हुए विचार के पुनः दस्तक देने की आवाज हो सकती है।
