’’एक सतत भविष्य के लिए तकनीक से अधिक जरूरी है डिजिटल नैतिकता’’
गौतम चौधरी
दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है। मोबाइल फोन अब केवल बातचीत का माध्यम नहीं है। बैंक, बाजार, शिक्षा, स्वास्थ्य, शासन, मनोरंजन और सामाजिक संवाद तक हमारी पहुंच एक छोटी-सी स्क्रीन के भीतर सिमटती जा रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इस परिवर्तन की गति को और बढ़ा दिया है। ऐसे समय में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल से समाज अपने आप बेहतर और अधिक टिकाऊ बन जाएगा?
उत्तर इतना सरल नहीं है। उत्तर जटिल है। इसे तसल्ली से समझने की जरूरत है। तकनीक अपने आप न अच्छी होती है, न बुरी। उसका चरित्र इस बात से तय होता है कि उसका इस्तेमाल कौन, क्यों और किस जिम्मेदारी से कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र भी मानता है कि डिजिटल तकनीक सतत विकास के सभी 17 लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में मदद कर सकती है लेकिन वही तकनीक निजता, सुरक्षा, मानवाधिकार और असमानता के लिए खतरा भी बन सकती है।
यहीं से ’’उत्तरदायी डिजिटल नागरिकता’’ का प्रश्न सामने आता है। आज नागरिकता की परिभाषा केवल इस बात से तय नहीं हो सकती कि हम संविधान, कानून और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति कितने जिम्मेदार हैं। हमारी डिजिटल गतिविधियां भी सामाजिक जीवन को प्रभावित करती हैं। हम सोशल मीडिया पर क्या साझा करते हैं, किसी सूचना पर विश्वास करने से पहले उसकी पुष्टि करते हैं या नहीं, किसी दूसरे व्यक्ति की तस्वीर अथवा निजी जानकारी बिना अनुमति के प्रसारित करते हैं या नहीं, एआई से तैयार सामग्री को सत्य मान लेते हैं या उसकी जांच करते हैं-ये सब अब नागरिक आचरण के दायरे में आता है।
दुर्भाग्य यह है कि डिजिटल विस्तार की गति डिजिटल नैतिकता के विकास से कहीं आगे निकल गई है। हमारे हाथ में स्मार्टफोन है, इंटरनेट है, डिजिटल भुगतान की सुविधा है, एआई है, मगर क्या हमारे भीतर इन साधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की क्षमता भी उसी अनुपात में विकसित हुई है?
एक व्यक्ति यदि इंटरनेट चलाना जानता है, ऑनलाइन भुगतान कर सकता है और सोशल मीडिया पर हजारों लोगों से जुड़ा है, तो वह तकनीकी रूप से डिजिटल उपयोगकर्ता जरूर है, मगर यदि वह बिना सत्यापन के अफवाह फैलाता है, किसी की निजता भंग करता है, साइबर ठगी का शिकार होने के बाद भी सुरक्षा नियमों को नहीं समझता या एआई से मिली हर जानकारी को अंतिम सत्य मान लेता है, तो उसे जिम्मेदार डिजिटल नागरिक नहीं कहा जा सकता।
इसलिए हमें डिजिटल साक्षरता और डिजिटल नागरिकता में अंतर समझना होगा। ’’इंटरनेट चलाना डिजिटल साक्षरता है, लेकिन इंटरनेट का विवेकपूर्ण और नैतिक इस्तेमाल डिजिटल नागरिकता है।’’
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल दुनिया में एक गलत सूचना केवल एक व्यक्ति की भूल नहीं रहती। वह कुछ ही मिनटों में हजारों और लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। फर्जी खबर सामाजिक तनाव बढ़ा सकती है, किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती है और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा कर सकती है। इसी तरह साइबर धोखाधड़ी केवल आर्थिक नुकसान नहीं है। यह डिजिटल व्यवस्था में नागरिकों के विश्वास को भी कमजोर करती है।
इसलिए उत्तरदायी डिजिटल नागरिकता को केवल साइबर सुरक्षा अभियान तक सीमित करना भूल होगी। इसका संबंध लोकतंत्र से भी है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य-16 में शांतिपूर्ण और समावेशी समाज, न्याय तथा जवाबदेह संस्थाओं की बात की गई है। लक्ष्य-4 गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और लक्ष्य-9 नवाचार तथा मजबूत आधारभूत संरचना पर जोर देता है। लक्ष्य-17 वैश्विक साझेदारी को मजबूत करने की बात करता है। इन लक्ष्यों की सफलता केवल सरकारों की नीतियों से नहीं होगी। नागरिकों का व्यवहार भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
शिक्षा का डिजिटल विस्तार तभी उपयोगी है जब विद्यार्थी सूचना और ज्ञान के बीच अंतर समझे। नवाचार तभी समाज के लिए उपयोगी होगा जब तकनीक केवल बाजार का उत्पाद न रहकर सार्वजनिक हित का साधन बने। डिजिटल शासन तभी लोकतांत्रिक होगा जब नागरिकों की निजता और अधिकार सुरक्षित रहें। साझेदारी तभी सार्थक होगी जब डिजिटल माध्यम संवाद और सहयोग का माध्यम बनें, न कि नफरत और विभाजन का।
भारत के संदर्भ में यह चुनौती और बड़ी है। देश ने डिजिटल भुगतान, डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं और ऑनलाइन शासन के क्षेत्र में व्यापक विस्तार किया है। यूपीआई इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह तत्काल डिजिटल भुगतान की सुविधा देता है और भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है, मगर सुविधा के साथ जिम्मेदारी भी आती है।
जिस नागरिक को यूपीआई से भुगतान करना आता है, उसे यह भी पता होना चाहिए कि यूपीआई पिन किसी के साथ साझा नहीं करना है। जिस नागरिक को एआई का इस्तेमाल आता है, उसे यह भी समझना होगा कि एआई द्वारा तैयार सामग्री हमेशा सत्य नहीं होती। जिस व्यक्ति के हाथ में सोशल मीडिया है, उसे यह समझना होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और किसी दूसरे की प्रतिष्ठा तथा निजता के अधिकार के बीच संतुलन भी जरूरी है।
यहीं गांधी के ’’कर्तव्य-बोध’’ और विवेकानंद के ’’चरित्र निर्माण’’ की प्रासंगिकता दिखाई देती है। तकनीक नई है, मगर जिम्मेदारी का सिद्धांत नया नहीं है। माध्यम बदल गया है, मनुष्य की नैतिक जिम्मेदारी नहीं। डिजिटल युग की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हमने तकनीक को अत्यंत शक्तिशाली बना दिया, मगर उसके उपयोगकर्ता को उतना जिम्मेदार बनाने पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया।
इसलिए डिजिटल सशक्तिकरण का अर्थ केवल हर हाथ में मोबाइल और हर गांव में इंटरनेट पहुंचाना नहीं हो सकता। वास्तविक सशक्तिकरण में डिजिटल साक्षरता के साथ मीडिया साक्षरता, साइबर सुरक्षा, एआई की समझ, निजता के अधिकार, आलोचनात्मक चिंतन और नागरिक कर्तव्यों की शिक्षा भी शामिल होनी चाहिए। यूनेस्को भी डिजिटल युग में नागरिकता के लिए आलोचनात्मक सोच, मीडिया एवं सूचना साक्षरता, ऑनलाइन अधिकारों और जिम्मेदार व्यवहार को आवश्यक मानता है।
इसके साथ एक और प्रश्न है-क्या हर नागरिक को समान डिजिटल अवसर मिल रहे हैं?
यदि समाज का एक वर्ग तेज इंटरनेट, आधुनिक उपकरण और एआई जैसी सुविधाओं तक आसानी से पहुंच रखता है, जबकि दूसरा वर्ग महंगे डेटा, कमजोर नेटवर्क, सीमित डिजिटल शिक्षा या भाषा संबंधी बाधाओं से जूझ रहा है, तो डिजिटल क्रांति नई असमानताएं भी पैदा कर सकती है। संयुक्त राष्ट्र ने डिजिटल समावेशन और सुरक्षित, सस्ती तथा सार्थक इंटरनेट पहुंच को सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण माना है।
इसलिए सतत भविष्य का अर्थ केवल अधिक तकनीक नहीं है। उसका अर्थ है ’’अधिक मानवीय, अधिक समावेशी और अधिक जिम्मेदार तकनीक’’। आखिरकार भविष्य का निर्माण मशीनें नहीं करेंगी। मशीनों को दिशा देने वाले मनुष्य करेंगे।
हमें तय करना होगा कि इंटरनेट अफवाह का माध्यम बनेगा या ज्ञान का, एआई छल का उपकरण बनेगा या नवाचार का, सोशल मीडिया नफरत का मंच बनेगा या संवाद का और डिजिटल शासन निगरानी का माध्यम बनेगा या नागरिक सशक्तिकरण का।
सतत भविष्य की असली लड़ाई तकनीक बनाने की नहीं, ’’तकनीक के साथ मनुष्य के चरित्र को विकसित करने की लड़ाई है।’’ इसलिए आज आवश्यकता केवल डिजिटल इंडिया की नहीं है। आवश्यकता ऐसे ’’उत्तरदायी डिजिटल भारत’’ की है, जहां नागरिक तकनीक के उपभोक्ता भर न हों, बल्कि उसके विवेकपूर्ण, नैतिक और सामाजिक उपयोग के प्रहरी भी बनें। क्योंकि भविष्य डिजिटल अवश्य होगा, लेकिन वह टिकाऊ और मानवीय तभी होगा जब उसका नागरिक भी जिम्मेदार होगा।
