सरमद : अधूरे कलमे का फकीर, जिसके सामने सत्ता भी कठघरे में खड़ी थी

सरमद : अधूरे कलमे का फकीर, जिसके सामने सत्ता भी कठघरे में खड़ी थी

इतिहास में कुछ मौतें केवल मौतें नहीं होतीं। वे अपने समय की सत्ता, समाज और धर्म के सामने ऐसे प्रश्न खड़े कर जाती हैं, जिनका उत्तर सदियां बीत जाने के बाद भी आसान नहीं होता। सत्रहवीं शताब्दी का दिल्ली दरबार ऐसी ही एक कहानी का साक्षी रहा – सरमद काशानी की कहानी।

सरमद कोई सामान्य फकीर नहीं थे। वे धार्मिक पहचान की तय सीमाओं से बाहर खड़े दिखाई देते थे। नग्न रहते थे, सत्ता की परवाह नहीं करते थे और धर्म को केवल कर्मकांड या शब्दों में स्वीकार करने के बजाय उसके भीतर छिपे सत्य को अपनी अनुभूति से तलाशते थे। उनका संबंध दारा शिकोह की आध्यात्मिक दुनिया से भी जुड़ा हुआ था।

दारा शिकोह और सरमद के रास्ते अलग थे, लेकिन तलाश में एक समानता थी। दोनों धर्म की बाहरी दीवारों से आगे जाकर उसके भीतर छिपे आध्यात्मिक सत्य तक पहुंचना चाहते थे। फिर इतिहास ने करवट ली।

दारा शिकोह पराजित हुए। औरंगज़ेब सत्ता में आए। दारा की हत्या हुई और मुगल साम्राज्य की राजनीतिक दिशा बदल गई। इसी बदलते वातावरण में सरमद और सत्ता के बीच टकराव भी निर्णायक रूप लेने लगा।

सरमद के मुकदमे और उनकी मृत्यु से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा उनके द्वारा कलिमा अधूरा पढ़े जाने की है।

कहा जाता है कि उनसे कहा गया –
“ला इलाहा इल्लल्लाह, मुहम्मदुर रसूलुल्लाह।”
सरमद ने केवल इतना कहा –
“ला इलाहा इल्लल्लाह।”
उन्होंने आगे के शब्द नहीं दोहराए।

यहीं से कहानी केवल धार्मिक आस्था की कहानी नहीं रह जाती। यह सत्ता, धर्म और व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव के संबंध का प्रश्न बन जाती है। उनके विरोधियों की दृष्टि में इसका अर्थ स्पष्ट थाकृसरमद पैगंबर मुहम्मद को अल्लाह का रसूल स्वीकार नहीं कर रहे थे। यह इस्लामी आस्था की मूल मान्यता के विरुद्ध माना गया और उन पर धार्मिक अपराध के आरोप लगे। अंततः 1661 में दिल्ली में उनका सिर कलम कर दिया गया।

मगर इतिहास का सबसे असुविधाजनक प्रश्न यहीं पैदा होता है: ’’क्या सरमद वास्तव में पैगंबर का इनकार कर रहे थे?’’ या उनके शब्दों का अर्थ कुछ और था?

इस प्रश्न का कोई निर्विवाद ऐतिहासिक उत्तर हमारे पास नहीं है। सरमद के जीवन और मुकदमे से जुड़े स्रोतों में इतिहास और किंवदंती एक-दूसरे में घुले हुए हैं। उनके मुकदमे का पूरा दस्तावेजी विवरण भी उपलब्ध नहीं है। इसलिए उनके अधूरे कलमे की किसी एक आध्यात्मिक व्याख्या को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा।

फिर भी सूफी परंपरा में सरमद की जो छवि बनी, उसमें उनका अधूरा कलिमा आध्यात्मिक अनुभव और धार्मिक शब्दावली के बीच तनाव का प्रतीक बन गया।

मानो वे पूछ रहे हों: ’’क्या ईश्वर का नाम लेना ही ईश्वर को जान लेना है?’’

असली टकराव शायद यहीं था
सरमद की समस्या केवल उनका नग्न रहना नहीं थी। समस्या यह भी थी कि वे प्रश्न पूछते थे।
वे धार्मिक सत्ता से यह पूछने का साहस रखते थे कि क्या धर्म केवल उन शब्दों का नाम है जिन्हें बिना अनुभूति के दोहरा दिया जाए?

यही प्रश्न किसी भी रूढ़ व्यवस्था के लिए असहज होता है। सत्ता को अनुशासित शरीर चाहिए। उसे निश्चित भाषा चाहिए। उसे स्वीकृत विश्वास चाहिए। व्यवस्था चाहती है कि मनुष्य निर्धारित सीमाओं के भीतर रहे। सरमद इन सीमाओं के बाहर खड़े दिखाई देते हैं।

उनका शरीर नग्न था, मगर उनका प्रश्न उससे भी अधिक नग्न था: ’’सत्य क्या है? वह जो सत्ता कहती है, वह जो धर्माधिकारी बताते हैं या वह जिसे मनुष्य अपनी आत्मा में अनुभव करता है?’’ यहीं सरमद की कहानी औरंगज़ेब की कहानी से बड़ी हो जाती है।

दारा और सरमद रू दो रास्ते, एक तलाश
दारा शिकोह ने उपनिषदों का अध्ययन किया। उन्होंने सूफीवाद और भारतीय दर्शन के बीच समानताओं को खोजा। उनकी प्रसिद्ध कृति ’’‘मज्मा-उल-बहरैन’’’ दो आध्यात्मिक परंपराओं के बीच संवाद और समानता की खोज का महत्वपूर्ण प्रयास थी।

सरमद की भाषा अलग थी। उनका रास्ता अधिक विद्रोही था। दारा ने संवाद का रास्ता चुना। सरमद ने प्रश्न का। दारा ने धर्मों के बीच पुल खोजने की कोशिश की। सरमद ने धार्मिक सत्ता की दीवार पर ही प्रश्न लिख दिया।

दोनों का अंत मुगल सत्ता के हाथों हुआ। हालांकि दोनों की राजनीतिक और ऐतिहासिक परिस्थितियां अलग थीं, फिर भी उनकी कहानियां उस दौर के भीतर आध्यात्मिक स्वतंत्रता और राजनीतिक सत्ता के तनाव को समझने का एक महत्वपूर्ण रास्ता देती हैं।

औरंगज़ेब को सरमद से डर क्यों लगा?
यह प्रश्न इतिहास में अक्सर पूछा जाता है। इसका निश्चित उत्तर देना कठिन है। यह कहना भी उचित नहीं होगा कि सरमद की हत्या केवल उनके आध्यात्मिक विचारों के कारण हुई। उनके विरुद्ध धार्मिक आरोप, सामाजिक व्यवहार, राजनीतिक परिस्थितियां और उस समय की सत्ता-संरचनाकृइन सबको साथ रखकर ही घटना को समझा जा सकता है।

फिर भी सरमद की कहानी में सत्ता और स्वतंत्र आध्यात्मिक चेतना के बीच संघर्ष का एक गहरा प्रतीक दिखाई देता है। एक तलवारबंद विद्रोही से सत्ता लड़ सकती है। उसके पास सेना होती है, किला होता है, भूगोल होता है।

एक फकीर अधिक असुविधाजनक हो सकता है। क्योंकि उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता।
सरमद के पास न सेना थी, न किला, न राज्य। उनके पास उनका शरीर और उनकी आवाज थी।
फिर भी उनकी आवाज सत्ता और धार्मिक प्रतिष्ठान के लिए इतनी असहज बनी कि अंततः उनकी जान चली गई। यहीं सरमद इतिहास के एक बड़े प्रतीक में बदल जाते हैं।

सिर तो कट गया, पर सवाल नहीं
सरमद को केवल ‘शहीद सूफी’ कह देना इतिहास को सरल बना देना होगा। उन्हें केवल ‘धर्मद्रोही’ कह देना भी उतना ही अधूरा होगा। इतिहास दोनों निष्कर्षों से अधिक जटिल है।

संभव है कि उस समय के धार्मिक कानून और राजनीतिक वातावरण में उनके शब्दों को गंभीर अपराध माना गया हो। यह भी संभव है कि बाद की सूफी परंपरा ने उनके शब्दों को अपने आध्यात्मिक अनुभव के अनुरूप नए अर्थ दिए हों।

मगर सरमद की कहानी का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने वास्तव में क्या कहा था। महत्व इस बात में भी है कि सदियों बाद उनके अधूरे कलमे को लोग किस प्रश्न के रूप में पढ़ते रहे हैं।

’’क्या आस्था केवल उच्चारित शब्द है या भीतर की अनुभूति भी?’’
’’क्या धर्म प्रश्न पूछने की अनुमति देता है?’’
’’क्या ईश्वर तक पहुंचने के रास्ते पर सत्ता का पहरा होना चाहिए?’’

और सबसे कठिन प्रश्न: ’’क्या किसी मनुष्य को उसके आध्यात्मिक प्रश्न के लिए मृत्यु दंड दिया जा सकता है?’’ चार सौ वर्ष के करीब समय बीत चुका है। सरमद का सिर दिल्ली की मिट्टी में दफन है, मगर उनका सवाल अब भी इतिहास की स्मृति में जीवित है।

शायद किसी फकीर की सबसे बड़ी शक्ति यही होती है। सत्ता शरीर को समाप्त कर सकती है। आवाज को दबा सकती है। किसी व्यक्ति को इतिहास से मिटाने की कोशिश कर सकती है। मगर ’’प्रश्न की गर्दन नहीं काट सकती।’’ सरमद मर गए। उनका अधूरा कलिमा इतिहास में रह गया।

और उसके साथ वह सवाल भी : ’’ईश्वर की तलाश में अंतिम अधिकार किसका है-सत्ता का, धर्माधिकारी का या मनुष्य की अपनी अंतरात्मा का?’’

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