कचरा नहीं, नागरिकों की जिम्मेदारी का है सवाल

कचरा नहीं, नागरिकों की जिम्मेदारी का है सवाल

अक्षपाद् गौतम

भारत में कचरा प्रबंधन पर लंबे समय से सरकार, नगर निकाय और उत्पादक कंपनियों की जिम्मेदारी की चर्चा होती रही है। यह स्वाभाविक भी है। आखिरकार जिस व्यवस्था से कचरा पैदा होता है, उसकी सफाई और पुनर्चक्रण की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। इसी सोच के आधार पर एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी यानी ईपीआर को महत्व मिला है।

अब बहस इससे एक कदम आगे बढ़ रही है। सवाल यह है कि क्या केवल उत्पादक की जिम्मेदारी तय कर देने से भारत कचरे की समस्या का समाधान कर सकता है? शायद नहीं। क्योंकि किसी कंपनी ने प्लास्टिक की बोतल बनाई और बाजार में बेच दी, यह कहानी का पहला हिस्सा है। असली कहानी तब शुरू होती है जब उपभोक्ता बोतल खाली करके उसे फेंक देता है। वह बोतल कहां गई, किसने उठाई, किस कीमत पर उठाई, उसका पुनर्चक्रण हुआ या वह नदी, नाले और समुद्र तक पहुंच गई, इसका हिसाब कौन रखेगा?

यहीं डिपॉजिट रिटर्न सिस्टम यानी डीआरएस महत्वपूर्ण हो जाता है। डीआरएस का विचार सरल है। उपभोक्ता जब कोई निर्धारित पैकेजिंग खरीदता है तो उसके मूल्य के साथ एक छोटी जमा राशि भी देता है। उपयोग के बाद पैकेजिंग को निर्धारित संग्रह केंद्र पर वापस करने पर वह राशि उपभोक्ता को लौटा दी जाती है। यानी खाली बोतल या पैकेजिंग कचरा नहीं रह जाती, उसकी वापसी का एक आर्थिक प्रोत्साहन पैदा हो जाता है।

इस व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष पैसा नहीं, नागरिक की भूमिका है। भारत में कचरा प्रबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि नागरिक को अक्सर केवल कचरा पैदा करने वाला व्यक्ति समझा जाता है। उसे यह जिम्मेदारी कम ही महसूस होती है कि उसके हाथ से निकलने वाली वस्तु आखिर जाती कहां है। डीआरएस इस संबंध को बदल सकता है। नागरिक केवल उपभोक्ता नहीं रहता, वह संग्रह और पुनर्चक्रण की प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बन जाता है।

इसका एक बड़ा लाभ यह भी हो सकता है कि पैकेजिंग कचरे की वास्तविक मात्रा और उसकी आवाजाही का अधिक विश्वसनीय रिकॉर्ड तैयार हो। आज किसी शहर में कितनी प्लास्टिक पैकेजिंग बाजार में पहुंची और उसमें से कितनी वास्तव में पुनर्चक्रण के लिए वापस आई, इसका सटीक हिसाब रखना कठिन है। डिजिटल तकनीक के साथ डीआरएस इस पूरी श्रृंखला को अधिक पारदर्शी बना सकता है।

फिर भी यह मान लेना भूल होगी कि डीआरएस लागू होते ही समस्या समाप्त हो जाएगी। भारत की परिस्थितियां यूरोप या किसी दूसरे देश से अलग हैं। यहां करोड़ों लोग अनौपचारिक कचरा अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं। कचरा बीनने वाले, कबाड़ी और छोटे संग्रहकर्ता पहले से ही पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को अर्थव्यवस्था में वापस लाने का महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। किसी नए डीआरएस में यदि इन्हें बाहर कर दिया गया तो व्यवस्था कागज पर आधुनिक दिखाई दे सकती है, जमीन पर नहीं।

इसलिए डीआरएस को केवल तकनीकी व्यवस्था नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के रूप में विकसित करना होगा। एक और सवाल है। जमा राशि इतनी हो कि नागरिक के लिए पैकेजिंग वापस करना आकर्षक बने, मगर इतनी अधिक भी न हो कि गरीब उपभोक्ता पर अनावश्यक बोझ पड़े। संग्रह केंद्र वास्तव में उपलब्ध हों, वापसी की प्रक्रिया सरल हो और पैसा समय पर मिले। उत्पादक, स्थानीय निकाय, पुनर्चक्रण उद्योग और नागरिक के बीच जिम्मेदारी स्पष्ट हो। तभी डीआरएस प्रभावी हो सकेगा।

दरअसल ईपीआर और डीआरएस को एक-दूसरे का विकल्प मानने की जरूरत नहीं है। ईपीआर उत्पादक को उसके उत्पाद के जीवनचक्र की जिम्मेदारी देता है, जबकि डीआरएस नागरिक को वापसी की प्रक्रिया में जोड़ सकता है। दोनों को मिलाकर ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें उत्पादन से लेकर उपभोग और पुनर्चक्रण तक हर स्तर पर जिम्मेदारी दिखाई दे।

गांधीनगर में विश्व सर्कुलर इकोनॉमी फोरम 2026 के अवसर पर “बियॉन्ड ईपीआर रू द रोल ऑफ डीआरएस इन सिटिजन-लेड सर्कुलैरिटी” विषय पर होने वाली चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण है। यह केवल प्लास्टिक या बोतल लौटाने की तकनीक पर बातचीत नहीं है। इसके भीतर एक बड़ा प्रश्न छिपा हैकृक्या भारत अपने नागरिकों को पर्यावरणीय जिम्मेदारी का सक्रिय भागीदार बना सकता है?

सर्कुलर इकोनॉमी का अर्थ केवल पुराने पदार्थ को फिर से इस्तेमाल कर लेना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ उस मानसिकता को बदलना है जिसमें वस्तु खरीदने के बाद उसकी जिम्मेदारी समाप्त मान ली जाती है।

उत्पादक की जिम्मेदारी जरूरी है। सरकार की जिम्मेदारी भी जरूरी है। मगर नागरिक की जिम्मेदारी के बिना कोई भी कचरा प्रबंधन व्यवस्था अधूरी रहेगी। इसलिए आने वाले समय में भारत की पर्यावरण नीति का लक्ष्य केवल “कम कचरा पैदा करना” नहीं होना चाहिए। लक्ष्य यह भी होना चाहिए कि जो कचरा पैदा हो चुका है, वह व्यवस्था से बाहर न जाए।

डीआरएस इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग हो सकता है। क्योंकि अंततः सवाल कचरे का नहीं है। सवाल यह है कि हम अपने उपभोग के बाद पैदा हुई वस्तु के प्रति कितने जिम्मेदार नागरिक हैं।

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