“सन्नी को लेकर आरएसएस विचार परिवार के कई संगठनों में असहजता“
“चर्चा में झारखंड प्रांत प्रचार के नाराजगी की खबर“
गौतम चौधरी की खास रपट
बाहर-बाहर से झारखंड प्रदेश भारतीय जनता पार्टी फिलहाल तो सहज और व्यवस्थित दिख रहा है लेकिन अंदर भयंकर भूचार के संकेत दिख रहे हैं। झारखंड भाजपा ने हाल में सन्नी टोप्पो को प्रदेश अनुसूचित जनजाति मोर्चा का अध्यक्ष नियुक्त किया है। यह नियुक्ति केवल संगठन में एक पद भरने की सामान्य प्रक्रिया नहीं है। झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य में भाजपा के जनजातीय नेतृत्व की सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक दिशा को समझने के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
सन्नी टोप्पो की नियुक्ति इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वे भाजपा की पारंपरिक संगठनात्मक पृष्ठभूमि से आने वाले नेता नहीं माने जाते। वे पहले कांग्रेस में रहे हैं और 2019 में मांडर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ चुके हैं। बाद में भाजपा में शामिल हुए और 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर मांडर से चुनाव लड़े। चुनावी हलफनामे में उनकी शैक्षणिक योग्यता इतिहास में स्नातक और पेशा व्यवसाय दर्ज है।
संघ परिवार की परंपरागत भूमिका से अलग नियुक्ति?
झारखंड भाजपा के आदिवासी नेतृत्व का इतिहास देखें तो पार्टी के विस्तार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े सामाजिक संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, विकास भारती जैसे संगठनों ने आदिवासी इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा, सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से लंबे समय तक काम किया है।
भाजपा के आदिवासी नेतृत्व में बाबूलाल मरांडी इसके प्रमुख उदाहरण हैं। राजनीतिक जीवन में आने से पहले वे संघ से जुड़े और विश्व हिंदू परिषद के पूर्णकालिक कार्यकर्ता रहे। 1990 में भाजपा में सक्रिय राजनीति में आने से पहले वे संताल परगना में संगठनात्मक काम कर चुके थे।
समीर उरांव भी लंबे समय तक भाजपा के जनजातीय संगठन से जुड़े रहे और राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जनजाति मोर्चे का नेतृत्व कर चुके हैं। समीर का व्यक्तित्व निर्माण, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विकास भारती, बिशुनपुर के द्वारा किया गया। समीर विकास भारती से लंबे समय तक जुड़े रहे। फिलहाल झारखंड भाजपा में जितने भी जनजातीय पृष्टभूमि के नेता हैं उसमें से लगभग 95 प्रतिशत संघ या फिर विचार परिवार के द्वारा विकसित किए गए हैं।
इस पृष्ठभूमि में सन्नी टोप्पो का राजनीतिक रास्ता अलग दिखाई देता है। उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में उन्हें विकास भारती, वनवासी कल्याण आश्रम या सेवा भारती की संगठनात्मक पृष्ठभूमि से जोड़ने वाला प्रमाण सामने नहीं आया है। हालांकि इसे “झारखंड भाजपा के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ” कहना अभी प्रमाणित ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं होगा। इसके लिए भाजपा के गठन से लेकर अब तक सभी प्रमुख आदिवासी नेताओं की संगठनात्मक पृष्ठभूमि का व्यवस्थित दस्तावेजी अध्ययन आवश्यक है।
असली विवाद संघ की रायसुमारी का है
भाजपा के अंदरूनी संगठनात्मक निर्णयों में संघ और भाजपा के बीच समन्वय की चर्चा झारखंड की राजनीति में नई नहीं है लेकिन सन्नी टोप्पो की नियुक्ति के मामले में यह दावा कि “संघ विचार परिवार की रायसुमारी नहीं हुई”, अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध प्रमाणों से सिद्ध नहीं है। वैसे संघ विचार परिवार के कुछ सांगठनिक नेताओं ने बताया कि इस विषय पर प्रांत प्रचार गोपाल शर्मा से भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री कर्मवीय सिंह की बात हुई होगी।
जुलाई 2026 में भाजपा की नई प्रदेश कमेटी और मोर्चों के गठन को लेकर प्रकाशित रिपोर्ट में जरूर बताया गया था कि नामों की सूची केंद्रीय नेतृत्व को भेजी गई थी और जातीय तथा क्षेत्रीय संतुलन को लेकर विचार चल रहा था।
इसलिए फिलहाल दो बातों को अलग रखना चाहिए-एक, नियुक्ति भाजपा के वर्तमान संगठनात्मक नेतृत्व का निर्णय है। दूसरा, संघ परिवार से राय ली गई या नहीं, यह आंतरिक संगठनात्मक प्रक्रिया का विषय है, जिसकी स्वतंत्र सार्वजनिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। यही इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण अनुत्तरित प्रश्न है।
सन्नी की नियुक्त के विषय में चर्चा
सन्नी टोप्पो के बारे में बताया जाता है कि वे रियलस्टेट के बड़े कारोबारी हैं। उनके बारे में यह भी बातया जाता है कि उनकी नियुक्ति के विषय में इस बार प्रदेश भाजपा एक प्रयोग कर रही है और गैर संघ पृष्टभूमि जनजातीय नेता को पार्टी नेतृत्व सौंप रही है। इस मामले में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बातया कि सन्नी की नियुक्ति को लेकरं प्रदेश अध्यक्ष आदित्य शाहू और प्रतिपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी असहमत थे लेकिन प्रदेश महामंत्री संगठन कर्मवीर सिंह का कहना था कि पिछले दो विधानसभा चुनाव से संघ पृष्ठभूमि के नेतृत्व से भाजपा को जनजातीय क्षेत्र में कोई फायदा नहीं हुआ है। इसलिए बाहर के नेता पर एक बार पार्टी को विश्वास करना चाहिए। सन्नी के बारे में यह भी बताया जाता है कि वे भाजपा से जुड़े एक बड़े रियलस्टेट कारोबारी के नजदीकी हैं। इस बात को लेकर भी संघ विचार परिवार में नाराजगी की बात बतायी जा रही है।
ईसाई धर्म को बढ़ावा देने का आरोप कितना सही?
सन्नी टोप्पो के विरुद्ध सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में यह आरोप लगाया जा रहा है कि वे ईसाई धर्म को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों से जुड़े रहे हैं लेकिन इस आरोप को प्रमाणित करने वाला कोई विश्वसनीय दस्तावेज या उनका ऐसा सार्वजनिक बयान अभी सामने नहीं आया है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके। बल्कि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य आरोप के विपरीत दिशा में जाता है।
30 अगस्त 2026 को रांची के मोरहाबादी मैदान में प्रस्तावित आदिवासी एकता महाजुटान को लेकर केंद्रीय सरना समिति और जनजाति सुरक्षा मंच सहित कई संगठनों ने विरोध किया था। इन संगठनों ने आरोप लगाया था कि रैली में चर्च की भूमिका है और आर्चबिशप हाउस की ओर से ईसाई विश्वासियों को इसमें शामिल होने का आह्वान किया गया है। जनजाति सुरक्षा मंच के संदीप उरांव ने इस संबंध में पत्र जारी होने का दावा किया था।
इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उस विरोध से जुड़े संयुक्त बयान में सन्नी टोप्पो का नाम भी शामिल था। 30 अगस्त की एक रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय सरना समिति, जनजाति सुरक्षा मंच और अन्य संगठनों के साथ सन्नी टोप्पो भी उस संयुक्त बयान में शामिल थे, जिसमें आदिवासी समाज के नाम पर चर्च के नेतृत्व वाले आंदोलन पर आपत्ति जताई गई थी। इस तथ्य के रहते सन्नी टोप्पो को सीधे “ईसाई धर्म को बढ़ावा देने वाला नेता” कहना उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर उचित नहीं होगा।
फिर आपत्ति क्यों?
केंद्रीय सरना समिति और जनजाति सुरक्षा मंच की आपत्ति का मूल प्रश्न केवल धर्म नहीं है। इसके पीछे आदिवासी धार्मिक पहचान, सरना संस्कृति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का बड़ा सवाल है। 28 अगस्त को इन संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा था कि सरना समाज की अपनी अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है तथा उसके सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों का नेतृत्व आदिवासी संगठनों के हाथ में होना चाहिए। जनजाति सुरक्षा मंच की मेघा उरांव ने भी ईसाई समुदाय से अपनी धार्मिक पहचान स्पष्ट रखने की बात कही थी।
30 अगस्त के संयुक्त बयान में इन संगठनों ने आरोप लगाया कि जिस कार्यक्रम को “आदिवासी एकता महाजुटान” के रूप में प्रचारित किया गया, उसमें बाद में कांग्रेस गठबंधन की राजनीतिक भूमिका प्रमुख हो गई। इन आरोपों का उल्लेख रिपोर्टों में हुआ है, लेकिन इन्हें संबंधित राजनीतिक पक्षों के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
सन्नी टोप्पो की भूमिका यहां दिलचस्प है
यहीं से सन्नी टोप्पो की नियुक्ति का राजनीतिक अर्थ और अधिक जटिल हो जाता है। एक तरफ वे कांग्रेस की पृष्ठभूमि से भाजपा में आए नेता हैं। दूसरी तरफ वे भाजपा के अनुसूचित जनजाति मोर्चा के अध्यक्ष बनाए गए हैं। तीसरी तरफ, नियुक्ति से कुछ ही दिन पहले वे उन आदिवासी संगठनों के साथ खड़े दिखाई दिए, जो चर्च की राजनीतिक-सामाजिक भूमिका को लेकर सवाल उठा रहे थे।
16 सितंबर को पदभार ग्रहण करते समय भी कार्यक्रम की शुरुआत बिरसा मुंडा, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय के चित्रों पर माल्यार्पण से हुई। इसके बाद पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाज से उन्हें कार्यालय में प्रवेश कराया गया। मुख्य पाहन जगलाल पाहन ने उन्हें आशीर्वाद दिया। इससे कम-से-कम इतना संकेत मिलता है कि भाजपा ने उन्हें अपनी पारंपरिक वैचारिक और आदिवासी सांस्कृतिक प्रतीकों से जोड़कर प्रस्तुत करने की कोशिश की है।
भाजपा के लिए इसका क्या अर्थ?
सन्नी टोप्पो की नियुक्ति को तीन स्तरों पर पढ़ा जा सकता है।
पहला, राजनीतिक विस्तार।
भाजपा संभवतः आदिवासी समाज में अपना आधार बढ़ाने के लिए केवल पुराने संगठनात्मक कैडर पर निर्भर रहने के बजाय अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि से आए नेताओं को भी जिम्मेदारी देने की दिशा में बढ़ रही है।
दूसरा, सामाजिक संतुलन।
2026 में भाजपा की नई संगठनात्मक संरचना बनाते समय जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को लेकर पार्टी के भीतर चर्चा होने की खबरें सामने आई थीं।
तीसरा, आदिवासी राजनीति का नया विमर्श।
झारखंड में अब आदिवासी राजनीति केवल जल, जंगल और जमीन तक सीमित नहीं है। सरना धर्म, धर्मांतरण, डीलिस्टिंग, पांचवीं अनुसूची, आदिवासी आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी इसके प्रमुख प्रश्न बन चुके हैं।
इसी कारण सन्नी टोप्पो की नियुक्ति आने वाले समय में भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रयोग साबित हो सकती है।
पूरे मामले पर तटस्थ दृष्टिकोण
सन्नी टोप्पो का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें झारखंड भाजपा के आदिवासी नेतृत्व की बदलती प्रकृति दिखाई देती है। एक ओर भाजपा का पुराना आदिवासी संगठनात्मक मॉडल संघ परिवार के सामाजिक कार्य, सांस्कृतिक संगठन और दीर्घकालीन कैडर निर्माण पर आधारित रहा है। दूसरी ओर सन्नी टोप्पो जैसे नेता सीधे चुनावी राजनीति और दूसरे दल से भाजपा में आने के रास्ते से शीर्ष संगठनात्मक दायित्व तक पहुंचे हैं।
इस नियुक्ति को लेकर सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि सन्नी टोप्पो ईसाई धर्म को बढ़ावा देते हैं या नहीं। उपलब्ध प्रमाण फिलहाल इस आरोप की पुष्टि नहीं करते। बल्कि उपलब्ध घटनाक्रम में वे स्वयं उस आदिवासी मंच के साथ दिखाई देते हैं जिसने चर्च की राजनीतिक भूमिका पर सवाल उठाया था।
वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या झारखंड भाजपा अब अपने आदिवासी संगठन का विस्तार संघ परिवार की पारंपरिक सामाजिक-संगठनात्मक धारा से आगे ले जाकर व्यापक राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मॉडल की ओर कर रही है?
यदि ऐसा है तो सन्नी टोप्पो की नियुक्ति केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति नहीं, बल्कि झारखंड भाजपा की आदिवासी राजनीति में बदलती रणनीति का संकेत हो सकती है।
