गौतम चौधरी
हाल ही में चंडीगढ़ में International Sikh Confederation की ओर से आयोजित “The Way Forward: SGPC Elections” सम्मेलन में पंजाब सरकार से SGPC, सिख विधि विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों से परामर्श करके नया Punjab Sikh Gurdwaras Bill तैयार करने की मांग की गई। सम्मेलन में इस संबंध में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित होने की खबर है।
इस मांग की पृष्ठभूमि में सबसे बड़ा प्रश्न शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति यानी SGPC के चुनावों में लंबे समय से हो रहा विलंब है। SGPC का अंतिम आम चुनाव 2011 में हुआ था। कानून के अनुसार निर्वाचित सदन का सामान्य कार्यकाल पांच वर्ष का है, लेकिन नए सदन के गठन तक पुराने सदन के जारी रहने का प्रावधान होने के कारण 2011 में निर्वाचित सदन अब तक काम कर रहा है।
यह स्थिति लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से निश्चित रूप से गंभीर प्रश्न खड़े करती है। धार्मिक संस्था हो या कोई सार्वजनिक संस्था, उसके निर्वाचित निकाय के चुनाव समय पर होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता है। हालांकि SGPC चुनावों में देरी को केवल प्रशासनिक लापरवाही कह देना भी उचित नहीं होगा। इसके पीछे मतदाता पात्रता और न्यायिक विवादों का लंबा इतिहास रहा है।
2011 के चुनावों के आसपास सहजधारी सिखों के मतदान अधिकार को लेकर विवाद हुआ। 2016 में संसद के माध्यम से 1925 के कानून में संशोधन कर मतदान संबंधी स्थिति स्पष्ट की गई। इसके बाद 2011 में निर्वाचित सदन का कार्यकाल औपचारिक रूप से आगे बढ़ा, लेकिन नए चुनाव नहीं हो सके।
इस बीच चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कोशिशें भी हुई हैं। पंजाब सरकार की आधिकारिक वेबसाइटों पर 2024-25 में SGPC चुनाव के लिए मतदाता सूचियां तैयार करने और दावे-आपत्तियां लेने की प्रक्रिया के कार्यक्रम प्रकाशित किए गए थे।
इसलिए अब मूल प्रश्न यह है कि क्या पुराने कानून में संशोधन पर्याप्त है या वास्तव में नए कानून की जरूरत है?
1925 का Sikh Gurdwaras Act अपने समय की ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज था। लगभग एक शताब्दी में पंजाब का सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक स्वरूप काफी बदल चुका है। विभाजन के बाद गुरुद्वारा प्रबंधन का भूगोल भी बदला। हरियाणा में अलग गुरुद्वारा प्रबंधन समिति अस्तित्व में आ चुकी है। देश के दूसरे हिस्सों में भी प्रमुख सिख धार्मिक संस्थाओं के लिए अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएं हैं।
इस बदलती परिस्थिति में कानून की व्यापक समीक्षा अस्वाभाविक नहीं है। नए कानून में चुनावों की समयबद्धता, मतदाता सूची की पारदर्शिता, रिक्त पदों पर उपचुनाव, वित्तीय जवाबदेही, संपत्तियों के संरक्षण और प्रबंधन में पारदर्शिता जैसे विषयों को अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। मगर सुधार की इस आवश्यकता के साथ दूसरी चिंता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है—धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता।
हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि गुरुद्वारा संबंधी कानून में सरकार की भूमिका का प्रश्न केवल पंजाब तक सीमित नहीं है। 2026 में महाराष्ट्र में तख्त श्री हजूर साहिब से संबंधित कानून में बदलाव को लेकर भी सिख संगठनों ने सरकार की भूमिका और धार्मिक स्वायत्तता पर प्रश्न उठाए हैं।
इसलिए नए कानून का उद्देश्य केवल प्रशासन को सरकार के अधिक नियंत्रण में लाना नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर धार्मिक स्वायत्तता का अर्थ यह भी नहीं हो सकता कि किसी वैधानिक संस्था में चुनाव, वित्तीय जवाबदेही और लोकतांत्रिक नियंत्रण के प्रश्न गौण हो जाएं।
राज्य को धार्मिक आस्था का संचालक नहीं, बल्कि कानून का निष्पक्ष संरक्षक होना चाहिए। SGPC जैसी संस्था को अपनी धार्मिक और संस्थागत स्वायत्तता मिलनी चाहिए, लेकिन उसके निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही भी सुनिश्चित होनी चाहिए। चुनाव नियमित हों, मतदाता सूची पारदर्शी हो और चुनावी विवादों के समाधान के लिए स्वतंत्र एवं प्रभावी व्यवस्था हो—ये मांगें धार्मिक स्वायत्तता के विरुद्ध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थागत मजबूती के पक्ष में हैं।
नए कानून की प्रक्रिया भी इसी भावना से आगे बढ़नी चाहिए। केवल सरकार द्वारा विधेयक तैयार करने के बजाय SGPC, विभिन्न सिख संस्थाओं, विधि विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और व्यापक सिख समाज के प्रतिनिधियों के साथ सार्वजनिक विमर्श आवश्यक होगा। ऐसा कानून जितना अधिक सहमति, पारदर्शिता और संस्थागत स्वायत्तता पर आधारित होगा, उतना ही उसके प्रति विश्वास पैदा होने की संभावना होगी।
SGPC के चुनावों में डेढ़ दशक से अधिक का अंतराल अपने आप में एक चेतावनी है। इसका समाधान केवल नया कानून बनाना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें भविष्य में किसी भी कारण से चुनाव अनिश्चितकाल तक टल न सकें।
धार्मिक संस्थाओं को लोकतांत्रिक बनाने और राज्य के हस्तक्षेप से बचाने के बीच कोई अनिवार्य विरोध नहीं है। सही कानून वह होगा जो दोनों के बीच स्पष्ट संवैधानिक और प्रशासनिक सीमा निर्धारित करे।
अंततः प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि नया कानून सरकार बनाए या धार्मिक संस्था। असली प्रश्न यह होना चाहिए कि कानून किस तरह बने जिससे गुरुद्वारों की धार्मिक गरिमा, समुदाय की स्वायत्तता, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक जवाबदेही—चारों सुरक्षित रह सकें। यही किसी भी नए सिख गुरुद्वारा कानून की सबसे बड़ी कसौटी होगी।
