गौतम चौधरी
कृत्रिम मेधा यानी एआई को लेकर अब तक दुनिया की सबसे बड़ी बहस उसके रोजगार, अर्थव्यवस्था और मानवीय सुविधा पर प्रभाव को लेकर थी। मगर सितंबर 2026 में बिल गेट्स की एक टिप्पणी ने बहस को कहीं अधिक गंभीर धरातल पर ला खड़ा किया है। एनबीसी के Meet the Press में गेट्स ने कहा कि एआई इतनी शक्तिशाली हो चुकी है कि गलत हाथों में जाकर ऐसी घटनाओं को जन्म दे सकती है जिनमें एक अरब लोगों की जान जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि बुरी मंशा रखने वाले लोगों के हाथ में नवीनतम एआई उपकरणों का संयोजन अब तक के किसी भी हथियार से अधिक शक्तिशाली हो सकता है।
यह किसी एक आतंकवादी संगठन के बारे में भविष्यवाणी नहीं है। असली प्रश्न इससे बड़ा है—यदि आधुनिक एआई किसी हिंसक विचारधारा के हाथ लग जाए तो क्या होगा?
आतंकवाद का इतिहास बताता है कि हिंसक संगठन प्रौद्योगिकी को अपने उद्देश्य के अनुरूप अपनाते रहे हैं। इंटरनेट ने आतंकवादी प्रचार को वैश्विक बनाया। सोशल मीडिया ने भर्ती और कट्टरपंथीकरण को तेज किया। अब एआई भाषा, चित्र, वीडियो, साइबर गतिविधि और संगठनात्मक क्षमता को एक ही मंच पर जोड़ सकती है।
संयुक्त राष्ट्र के आतंकवाद-रोधी निदेशालय ने सितंबर 2026 में चेतावनी दी कि आतंकवादी संगठन एआई का उपयोग भर्ती, प्रचार, लक्षित संदेश, बहुभाषी प्रसार और धन जुटाने जैसी गतिविधियों में बढ़ा रहे हैं।
यहाँ इस्लामी आतंकवाद का उदाहरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ना नहीं है। दुनिया के करोड़ों मुसलमान आतंकवाद से असहमत हैं। चर्चा उन संगठनों और विचारधाराओं की है जो इस्लाम की अपनी उग्र व्याख्या के नाम पर हिंसा को वैध ठहराते हैं। हालिया सुरक्षा विश्लेषणों में इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा जैसे संगठनों तथा उनके समर्थकों द्वारा एआई के सूचनात्मक, संगठनात्मक और परिचालन उपयोग की चर्चा की गई है।
मगर खतरा केवल इसी विचारधारा तक सीमित नहीं है। जिस दिन एआई किसी भी हिंसक धार्मिक-सांप्रदायिक संगठन, नस्लवादी चरमपंथी समूह, वामपंथी सशस्त्र आंदोलन या किसी अन्य हिंसक राजनीतिक संगठन के लिए व्यापक रूप से उपलब्ध हो जाएगी, समस्या विचारधारा से अधिक तकनीकी शक्ति की हो जाएगी।
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। “पूंजीवादी आतंकवाद” कोई सर्वमान्य आतंकवाद-विज्ञान की श्रेणी नहीं है। पूंजीवादी व्यवस्था की आलोचना और आतंकवाद दो अलग बातें हैं। इसी तरह किसी राजनीतिक विचारधारा की आलोचना और उस विचारधारा से जुड़े हिंसक संगठन को आतंकवादी कहना भी एक ही बात नहीं है। इसलिए एआई के खतरे पर चर्चा करते समय शब्दों का अनुशासन जरूरी है।
फिर भी एक व्यापक सिद्धांत सामने आता है—हिंसा की विचारधारा कोई भी हो, एआई उसके हाथ में शक्ति का गुणक बन सकती है। आज एक छोटा संगठन हजारों लोगों तक संदेश पहुँचाने के लिए बड़ी प्रचार मशीन नहीं बनाता। एआई उसे अलग-अलग भाषाओं में सामग्री तैयार करने, अलग-अलग समुदायों के लिए अलग संदेश बनाने और डिजिटल प्रचार को निरंतर चलाने में मदद कर सकती है। यही बात भर्ती, दुष्प्रचार और सामाजिक विभाजन पर भी लागू होती है।
इससे भी गंभीर क्षेत्र जैव-सुरक्षा है। 2026 की International AI Safety Report में कहा गया है कि सामान्य प्रयोजन वाले एआई मॉडल जैविक और रासायनिक हथियारों से संबंधित तकनीकी जानकारी देने में सक्षम हो रहे हैं। कुछ परीक्षणों में आधुनिक मॉडलों ने जैव-विज्ञान से संबंधित जटिल समस्याओं में विशेषज्ञ स्तर की क्षमता दिखाई है। रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि वास्तविक दुनिया में हथियार बनाना अभी अनेक व्यावहारिक बाधाओं से घिरा है। इसलिए इसे तत्काल जैविक आपदा की भविष्यवाणी नहीं माना जाना चाहिए।
यहीं गेट्स की चिंता का वास्तविक अर्थ समझ में आता है। खतरा यह नहीं कि एआई स्वयं आतंकवादी बन जाएगी। खतरा यह है कि मनुष्य की विनाशकारी क्षमता और मशीन की बौद्धिक क्षमता एक-दूसरे से जुड़ सकती हैं। एक कट्टरपंथी संगठन के पास विचारधारा हो सकती है, किसी अपराधी के पास धन हो सकता है, किसी राज्य के पास सैन्य संसाधन हो सकते हैं और किसी वैज्ञानिक के पास तकनीकी ज्ञान। एआई इन अलग-अलग क्षमताओं के बीच की दूरी कम कर सकती है।
इसलिए आने वाले समय में आतंकवाद-विरोधी नीति केवल बंदूक, सीमा और खुफिया निगरानी का विषय नहीं रहेगी। उसमें एआई सुरक्षा, जैव-सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, डिजिटल पहचान, वित्तीय निगरानी और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही भी शामिल करनी होगी।
साथ ही एक और सावधानी आवश्यक है। एआई के नाम पर ऐसी व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती जिसमें हर धार्मिक व्यक्ति, हर राजनीतिक असहमति रखने वाला नागरिक या हर वैचारिक संगठन संदिग्ध मान लिया जाए। आतंकवाद से लड़ते हुए नागरिक स्वतंत्रता और कानून के शासन की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।
बिल गेट्स ने जिस “एक अरब मौतों” की संभावना की बात कही है, उसे भविष्यवाणी समझना भूल होगी। इसे जोखिम की सीमा का संकेत समझना अधिक उचित है। अंतरराष्ट्रीय एआई सुरक्षा रिपोर्ट भी जैविक दुरुपयोग, साइबर हमलों और स्वायत्त प्रणालियों से जुड़े जोखिमों को लेकर बढ़ती चिंता दर्ज करती है।
मानव सभ्यता ने परमाणु युग में एक महत्वपूर्ण सबक सीखा था—जिस शक्ति से पूरी सभ्यता को नुकसान पहुँच सकता है, उसे केवल बाजार की गति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। एआई के साथ भी शायद यही प्रश्न हमारे सामने है। प्रश्न यह नहीं है कि एआई मानवता को बचाएगी या नष्ट करेगी। प्रश्न यह है कि मानवता एआई की शक्ति को किसके हाथ में, किन नियमों के साथ और कितनी निगरानी में रखेगी।
क्योंकि भविष्य का सबसे खतरनाक आतंकवादी जरूरी नहीं कि सबसे बड़ा संगठन बनाए। संभव है कि उसके हाथ में केवल एक विचारधारा, एक कंप्यूटर और ऐसी एआई हो जिसकी शक्ति का अनुमान लगाने में दुनिया अभी पीछे चल रही हो।
