सुभाष शिरढोनकर
अभिनेत्री तापसी पन्नू की नेटफ्लिक्स पर रिलीज फिल्म ‘गांधारी’ उम्मीद के मुताबिक प्रभाव नहीं छोड़ सकी, लेकिन फिल्म में तापसी का अभिनय जरूर ध्यान खींचता है। कमजोरियों के बावजूद उन्होंने अपने किरदार को पूरी गंभीरता और भावनात्मक ताकत के साथ निभाया है।
‘गांधारी’ से पहले तापसी की ‘हसीन दिलरुबा’ (2021) और उसका सीक्वल ‘फिर आई हसीन दिलरुबा’ (2024) भी नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो चुके हैं। दोनों फिल्मों में उनके अभिनय को दर्शकों ने पसंद किया। ‘गांधारी’ में हालांकि तापसी का अंदाज पहले से काफी अलग और अधिक आक्रामक नजर आता है।
फिल्म में वह इश्वाक सिंह के किरदार गोकुल की पत्नी और एक बच्ची की मां की भूमिका में हैं। कहानी तब गंभीर मोड़ लेती है, जब ट्रेन में सफर के दौरान उनकी बेटी मिष्टी का अपहरण हो जाता है। बच्ची के गायब होने के बाद एक मां की बेचैनी, असहायता और टूटते हुए धैर्य को तापसी ने चेहरे के भावों और अभिनय के जरिए प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।
वह पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के साथ खुद भी बेटी की तलाश में जुट जाती हैं। जब तमाम कोशिशों के बावजूद कोई सकारात्मक परिणाम नहीं मिलता तो उनकी बेबसी धीरे-धीरे गुस्से में बदलती जाती है। यही बदलाव फिल्म को एक सामान्य अपहरण की कहानी से आगे ले जाकर बदले की कहानी बना देता है।
‘गांधारी’ में तापसी का किरदार भावनात्मक होने के साथ-साथ हिंसक भी है। बेटी को खो चुकी मां के भीतर पैदा होने वाला आक्रोश उनके अभिनय में साफ दिखाई देता है। कई दृश्यों में उनका चेहरा संवाद से ज्यादा बोलता है। यही फिल्म में उनके अभिनय की सबसे बड़ी ताकत है।
फिल्म की कहानी और पटकथा कनिका ढिल्लों ने लिखी है और वह इसकी निर्माता भी हैं। निर्देशन देवाशीष मखीजा ने किया है। तापसी के साथ इश्वाक सिंह के अभिनय को भी सराहना मिली है। हालांकि फिल्म की कहानी और प्रस्तुति को लेकर दर्शकों की राय एक जैसी नहीं रही।
तापसी की इस साल की एक और फिल्म ‘अस्सी’ (2026) रही, जिसमें उन्होंने अधिवक्ता रावी की भूमिका निभाई। दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध को केंद्र में रखकर बनाई गई इस फिल्म ने सामाजिक बहस का विषय जरूर बनाया, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर इसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद तापसी के अभिनय को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली।
तापसी पन्नू के करियर की एक खास बात यह है कि उन्होंने शुरुआत से ही पारंपरिक नायिका वाली भूमिकाओं के बजाय ऐसे किरदार चुनने की कोशिश की, जिनमें अभिनेत्री के लिए अभिनय की पर्याप्त गुंजाइश हो। वह ऐसे किरदारों से भी नहीं बचतीं, जिनमें उन्हें नायक के बराबर या उससे अधिक प्रभावशाली भूमिका निभानी पड़े।
उनके खाते में रोमांटिक फिल्मों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। इसके बावजूद उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदारों के जरिए अपनी पहचान बनाई है। ‘पिंक’, ‘नाम शबाना’, ‘मुल्क’, ‘मनमर्जियां’, ‘थप्पड़’, ‘रश्मि रॉकेट’ और ‘दोबारा’ जैसी फिल्मों में उनके किरदारों की प्रकृति एक-दूसरे से काफी अलग रही है। यही विविधता उनके अभिनय करियर की महत्वपूर्ण विशेषता है।
तापसी की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि किसी फिल्म की व्यावसायिक सफलता या असफलता उनके अभिनय की पहचान को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करती। फिल्म सफल हो या न हो, वह अक्सर अपने किरदार के स्तर पर दर्शकों का ध्यान खींचने में सफल रहती हैं।
आने वाली फिल्मों में ‘वो लड़की है कहां?’ उनके लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसमें वह एसीपी कोमल शर्मा की भूमिका निभा रही हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि तापसी इस बार पुलिस अधिकारी के किरदार को किस अंदाज में प्रस्तुत करती हैं।
तापसी पन्नू की लोकप्रियता का आधार केवल उनकी फिल्मों की सफलता नहीं है। उनका वास्तविक आकर्षण उन भूमिकाओं में दिखाई देता है, जिनमें उन्हें कुछ नया करने का अवसर मिलता है। यही कारण है कि फिल्म कमजोर होने के बावजूद ‘गांधारी’ में उनका अभिनय चर्चा में है। आने वाले समय में भी यदि वह इसी तरह चुनौतीपूर्ण और विविध भूमिकाएं चुनती रहीं तो उनका करियर अभिनय की दृष्टि से और अधिक दिलचस्प बना रह सकता है।
लेखक स्वतंत्र फिल्म टिप्पणीकार हैं। आलेख में व्यक्त विचार और तथ्य लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
