कथित सभ्य समाज और सभ्यता को आईना दिखाती एक अकेली लड़की

कथित सभ्य समाज और सभ्यता को आईना दिखाती एक अकेली लड़की

आज एक ऐसी महिला की कथा आपको बताउंगा, जिसका असली नाम कोई नहीं जानता लेकिन कैथोलिक ईसाइयों ने उसे मरने से पहले उसका एक नाम जरूर दे दिया। वह महिला 18 वर्षों तक अकेले एक निर्जन द्वीप पर निवास किया और उसने प्रकृति से लड़ाई नहीं की प्रकृति के साथ जीना सीख लिया। समुद्र मानों उसे अपने आगोश में स्थान दे रखा हो और प्रकृति मानों अपनी बेटी की तरह पाल रही हो। उस महिला ने अपने तरीके से अपनी संस्कृति गढ़ी और सभ्यता के साथ जीवन वसर किया। अपने जातीय मूल्यों के साथ कभी समझौता नहीं किया, जो उसे विरासत में उसके पुरखों ने उसे प्रदान किया था। तो आइए हम उस महिला के बारे में जानते हैं।

ईसाई मिशनरियों ने मरने से पहले उसे बपतिस्मा दिलवाया यानी ईसाई धर्म में दीक्षित किया और उसका उसका नाम खोआना मारिया रख दिया। वैसे उसका असली नाम कोई नहीं जानता है। उसके समूह के आदिवासी या तो सब मारे गए या फिर उसकी भाषा समाप्त हो गयी। उस आदिवासी समूह का वजूद ही मानों समाप्त कर दिया गया हो। इसलिए उसकी भाषा कोई समझ नहीं सकता था। इस महिला को इतिहास में ‘सैन निकोलस द्वीप की अकेली महिला’ के रूप में जाना जाता है। यह महिला वास्तविक रूप से एक अमेरिकी मूल-निवासी थीं, जिन्होंने कैलिफोर्निया के तट पर स्थित सैन निकोलस द्वीप पर 18 साल (1835-1853) तक अकेले जीवन व्यतीत किया।

वह निकोलेनो जनजाति की सदस्य थीं, जो कैलिफोर्निया के चौनल द्वीपों में से एक, सैन निकोलस द्वीप पर रहती थी। अकेलेपन की शुरुआत (1835) में यानी 1830 के दशक में हुई। दरअसल, उसके द्वीप पर रसियन आक्रांता लगातार हमला करने लगे। इसके कारण उस द्वीप की स्थिति बदलने लगी और निकोलेनो जनजाति का अस्तित्व समाप्त होने लगा। लगातार हो रहे हमलों से बचाने के लिए अमेरिकी सरकार ने जब उनकी जनजाति को मुख्य भूमि पर स्थानांतरित कर रही थी, तब खोआना मारिया गलती से या अपने बच्चे को ढूंढने के कारण पीछे छूट गई थीं। निकोलेनो जनजाति सभी को मुख्य भूमि पर ले आया गया। उसका क्या हुआ कोई नहीं जानता है। उसकी भाषा और संस्कृति बदल दी गयी। कुछ जानकार बताते हैं कि उसमें से बहुत आदिवासियों को या तो मार दिया गया या फिर उसका कायांतरण, यानी धर्म, भाषा और संस्कृति बदल दी गयी।

खोआना मारिया अगले 18 वर्षों तक, उस निर्जन द्वीप पर पूरी तरह अकेले रहीं। उन्होंने व्हेल की हड्डियों और टहनियों से घर बनाया, पक्षियों के पंखों से कपड़े बनाए और मछली तथा शेलफिश खाकर जीवन यापन किया। उसे आग जलाने की तकनीक उसे पूर्ववजों ने बताया था। उस ज्ञान से वह आग जलाती थी और कुछ खाद्य पदार्थों को भून कर खा लेती थी।

वर्ष 1853 में, कप्तान जॉर्ज निडेवर और उनकी टीम को पता चला कि निर्जन द्वीप पर मानवीय गतिविधि हो रही है। उसने अपना अभियान प्रारंभ किया और सैन निकोलस द्वीप के निकट पहुंच गया। कप्तान ने वहां आग और धुंआ देखा। उसे पक्का यकीन हो गया कि यहां कोई न कोई मानव निवास करता है। जब कप्तान और उसकी टीम के लोग द्वीप पर पहुंचे तो उसे वहां एक महिला मिली। महिला पहले डरी फिर वह कप्तान के साथ मुख्य भूमि चली आयी। जब उन्हें मुख्य भूमि (सांता बारबरा) लाया गया, तो वह बहुत कमजोर थीं और उनकी भाषा कोई नहीं समझता था।

सबसे पहले उस महिला को कैथोलिक ईसाई धर्म में दीक्षित किया गया। कैथोलिक ईसाई पद्धति से उसका नामकरण किया गया। फिर उसे सुरक्षित स्थान प्रदान किया गया। मुख्य भूमि पर आने के केवल 7 सप्ताह बाद, खोआना मारिया नामक महिला की हालत खराब होने लगी। कथित तौर पर उसे पेचिश हो गया। इस बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गई। याद रहे खोआना मारिया नाम उन्हें कैथोलिक मिशनरियों द्वारा बपतिस्मा के बाद दिया गया था, उनका असली नाम अज्ञात है।

स्कॉट ओश्डेल का 1960 का उपन्यास ‘आइलैंड ऑफ द ब्लू डॉल्फिन्स’ में मुख्य पात्र ‘कराना’ खोआना मारिया के जीवन पर आधारित है, जो लचीलेपन और उत्तरजीविता का प्रतीक है। आज सैन निकोलस द्वीप अमेरिकी नौसेना के पास है और आम जनता के लिए बंद है, लेकिन यह स्थान ऐतिहासिक महत्व रखता है।

नोट : इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी का संपादित अंश। 

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