पिछले 24 घंटों की प्रमुख राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का संक्षिप्त व विश्लेषणात्मक अवलोकन

नयी दिल्ली/पटना/मुंबई/कोलकाता/रांची/1/ भारत, आर्थिक मोर्चे पर राहत, लेकिन चुनौतियां बरकरार। जून माह में भारत का ’’ळैज् संग्रह लगभग 13.9 प्रतिशत बढ़कर 1.94 लाख करोड़ रुपये’’

AI के दौर में भी MBA की चमक बरकरार, नियोक्ताओं का भरोसा कायम

नयी दिल्ली/ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बीच यह आशंका लगातार जताई जा रही है कि प्रबंधन शिक्षा, विशेषकर एमबीए जैसी

नवाचार के आयाम और औजार के रूप में विकसित हो रहा है ड्रोन तकनीक

सचिन त्रिपाठी साल 2020 के बाद भारत में जिस तकनीक ने सबसे तेजी से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है उसमें ड्रोन प्रमुख है। कभी सेना

मनोरंजन उद्योग/ टिकटॉक की भारतीय ब्रांड एंबेसडर रह चुकी हैं नगमा मिराजकर

सुभाष शिरढोनकर आज भारत के प्रमुख डिजिटल क्रिएटर्स में से एक नगमा मिराजकर, एक मॉडल, डांसर, एक्ट्रेस, फैशन ब्लॉगर यूट्यूबर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के

रुपया, चुनाव और अविश्वास की राजनीति : संदर्भों के बीच तथ्य, आशंका और वास्तविकताएँ

गौतम चौधरी भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर सार्वजनिक विमर्श में अक्सर ऐसे दावे सामने आते हैं, जो आर्थिक तथ्यों, राजनीतिक आरोपों और जनभावनाओं का मिश्रण होते

जलवायु संकट और कृषि का भविष्य : क्या BRICS देश खाद्य सुरक्षा का नया मॉडल गढ़ सकते हैं?

गौतम चौधरी इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी चुनौतियों में यदि दो विषयों को एक साथ रखा जाए तो वे हैं—जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा। दुनिया

न्यूनतम मजदूरी : मेहनतकशों की आवाज़ और सत्ता का भय

गौतम चौधरी भारतीय राजनीति में एक विचित्र विडम्बना लगातार गहराती जा रही है। एक ओर चुनावी मंचों पर “विश्वगुरु”, “पाँच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था” और “विकसित भारत”

समावेशी शासन की प्राथमिकता को हमें समझना होगा

शशांक मणि त्रिपाठी लोकतांत्रिक शासकीय प्रणाली में “अधिकतम सहभागिता“ के सिद्धांत की सरकार होती है। इस शासकीय व्यवस्था में, “सबका साथ, सबका विकास एवं सबका

भारतीय सिनेमा में ‘वैनिटी वैन कल्‍चर’

सुभाष शिरढोनकर 1980 के दशक के उत्तरार्ध में भारतीय सिनेमा में वैनिटी वैन कल्‍चर का आगमन मनोरंजन उद्योग के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित

संस्कृति और संस्कार : समाज या व्यक्ति का स्वरूप ही नहीं संसाधन व पूंजी भी है

गौतम चौधरी हमारे समय की एक बड़ी विडंबना यह है कि संस्कृति पर चर्चा तो बहुत होती है लेकिन संस्कृति को समझने का प्रयास कम

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