लाशें जिनसे वर्षों बाद भी सुगंध आती रही

लाशें जिनसे वर्षों बाद भी सुगंध आती रही

विपिन कुमार

आमतौर पर प्राणी की मृत्यु के तुरंत बाद उसकी लाश तेजी से सड़ने लगती है पर ठीक इसके विपरीत हम यहां कुछ ऐसे विचित्रा व्यक्तियों के बारे में जानकारी दे रहे हैं जिनकी लाश वर्षों बाद भी बिल्कुल ही तरोताजा थी। लेबनान के संत मेरोन मठ (गिरजाघर) के पादरी चार्बेल कोकोफकी की 1898 ई. में मृत्यु हो गई। उनकी लाश को पास के ही कब्रगाह में दफना दिया गया पर लोग देखते कि उनकी कब्र से एक विशेष प्रकाश निकलता रहता हे। कुछ दिन बाद एक बार मूसलाधार वर्षा हुई और चार्बेल की लाश कब्र से बाहर आ गई। आश्चर्य की बात यह थी कि उस लाश पर कहीं सड़ने गलने के चिह्न नहीं थे। यही नहीं, उस लाश से दुर्गंध निकलने की बजाय दिव्य सुगंध आ रही थी।

प्रसिद्ध ईसाई साध्वी मारिया अन्ना की मृत्यु 1624 ई. में हुई थी। 107 वर्ष बाद 1731 ई. जब उसकी कब्र की खुदाई की गई तो लोग आश्चर्यचकित रह गए। इतने वर्ष बाद भी मारिया की लाश ज्यों की त्यों पड़ी थी। ब्रिटेन के ग्यारह मूर्द्धन्य चिकित्सा विज्ञानियों ने गहन परीक्षण के बाद लाश को बिल्कुल तरोताजा बताया। शरीर के सड़ने गलने की निशानी की बात तो दूर उससे एक विचित्रा खुशबू आ रही थी। महा आश्चर्य तो यह कि परीक्षण करने वाले चिकित्सकों के हाथों से हफ्तों यह दिव्य खुशबू निकलती रही।

पोलैण्ड के गेसूइट संत ‘एण्ड्रयू बोबेला की 1657 ई. में रूस के एक आतंकवादी ‘कोकेक्स’ ने हत्या कर दी। अपने को पुलिस की गिरफ्त से बचाने के लिए उसने क्षत विक्षत लाश को चर्च के पास ही गोबर के ढेर में दफना दिया। मृत्यु के लगभग 44 वर्ष बाद जेसूइट कालेज के तत्कालीन प्राचार्य ने एक रात स्वप्न देखा कि फादर बोबेला की लाश चर्च के पास के गोबर के ढेर के नीचे पड़ी है। स्वप्न के आधार पर ही गोबर की ढेर को खोदा गया तो लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। बोबेला की लाश 44 वर्ष बाद भी जीवितों जैसी प्रतीत हो रही थी। 6 पादरियों के सामने 5 शरीराकृतिविज्ञानियों ने लाश का अंत्यपरीक्षण कर बताया कि यह विलक्षणता किसी प्राकृतिक संरक्षण का परिणाम है अन्यथा गोबर में दफनाई गई लाश तो तुरंत ही सड़ जाती है।

12वीं सदी (1195-1231) केे महान फ्रांसिसी ब्रहमविज्ञानी, संत व धर्मोपदेशक ‘एन्थनी’ की लाश के साथ एक विचित्रा करिश्मा जुड़ा था। उनकी मृत्यु 1232 ई. में हुई थी पर मृत्यु के पूरे चार सौ वर्ष बाद जब कब्र से उनका ताबूत निकाला गया- वह भूरे रंग की धूल से भरा(ढंका) बिल्कुल तरोताजा था। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह थी कि कफन के किनारे में बिल्कुल ही कोमल व गुलाबी ताजी जीभ (मुंह की जगह कफन पर) पड़ी थी। 400 वर्षों के बाद भी लाश का न सड़ना सचमुच कितना बड़ा आश्चर्य था?

कहा जाता है कि योगिराज अरविंद की मृत्यु (1950ई) के पूरे 72 घंटे बाद तक उनके चेहरे से दिव्य प्रकाश निकलता रहा था। प्रकाश की तीव्रता इतनी थी कि लोगों की आंखें उन्हें देखने से चैंधिया जाती थीं।

(अदिति)

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