डॉ. नवमीत
अमेरिकी-इजराइली हमलों में ईरान के सर्वाेच्च धार्मिक नेता अली खामेनेई की मौत हो गई है। पिछले काफी समय से ईरान पर अमेरिकी-इजराइली आक्रमण की आशंका व्यक्त की जा रही थी, जो अब वास्तविकता में बदल गई है।
इजराइल के फासिस्ट जायनवादी निज़ाम ने पिछले कुछ वर्षों में ग़ज़ा में व्यापक तबाही और नरसंहार किया है। इसके कारण न केवल पश्चिम एशिया बल्कि पूरी दुनिया में उसकी तीखी आलोचना हो रही थी। यहाँ तक कि इजराइली राज्य की वैधता पर भी सवाल उठने लगे थे। स्वयं इजराइल के भीतर भी मौजूदा सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा है। इतिहास बताता है कि ऐसे समय में सत्ता-प्रतिष्ठान अक्सर बाहरी टकरावों के माध्यम से आंतरिक असंतोष को मोड़ने का प्रयास करते हैं। युद्ध के जरिये राष्ट्रीय एकता का आह्वान किया जाता है और वर्गीय प्रश्नों को अस्थायी रूप से राष्ट्रवादी विमर्श में ढालने की कोशिश की जाती है। यह पूँजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था की एक जानी-पहचानी प्रवृत्ति है।
दूसरी ओर, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था की धुरी रहा है। उसका प्रभुत्व केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वित्तीय, तकनीकी और वैचारिक क्षेत्रों में भी फैला हुआ है। इराक, लीबिया, सीरिया, अफगानिस्तान, कोरिया और वियतनाम से लेकर हाल के वर्षों में वेनेजुएला तक की घटनाएँ यह दिखाती हैं कि “लोकतंत्र की स्थापना” का अमेरिकी तर्क अक्सर नाटो के सैन्य और आर्थिक हितों से गहराई से जुड़ा रहा है।
आज प्रत्यक्ष उपनिवेशवाद का दौर भले समाप्त हो चुका हो, लेकिन साम्राज्यवाद का स्वरूप बदल कर कायम है। पूँजी निर्यात, आर्थिक प्रतिबंध, सैन्य गठबंधन और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं के माध्यम से प्रभाव और नियंत्रण स्थापित किया जाता है।
दूसरी तरफ ईरान का मौजूदा निज़ाम एक धार्मिक-राजनीतिक संरचना पर आधारित राज्य है, जहाँ लंबे समय से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असंतोष मौजूद है। ऐसे में यदि बाहरी सैन्य हस्तक्षेप होता है, तो उसके परिणाम सीधे और सरल नहीं होंगे। एक संभावना यह है कि यह हस्तक्षेप ईरान के भीतर राष्ट्रवादी एकता को मजबूत कर दे और प्रगतिशील शक्तियों को हाशिये पर धकेल दे। दूसरी संभावना यह है कि पहले से मौजूद अंतर्विरोध और अधिक तीखे हो जाएँ, जिससे व्यवस्था का संकट और गहरा हो।
फिर भी ऐतिहासिक अनुभव यह बताता है कि बाहरी सैन्य हस्तक्षेप अक्सर राज्य सत्ता को अस्थायी वैधता प्रदान करता है और आंतरिक परिवर्तन की संभावनाओं को कमजोर कर देता है।
अली खामेनेई की मौत के बाद यह संभावना अधिक है कि ईरान की जनता साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ जोरदार प्रतिरोध करेगी। लेकिन फिलहाल वर्ग संघर्ष के आधार पर किसी व्यापक प्रणालीगत परिवर्तन की संभावना कम दिखाई देती है।
साम्राज्यवादी युद्धों का सबसे स्थायी निष्कर्ष यही रहा है कि उनका खामियाजा अंततः आम जनता को ही भुगतना पड़ता है। ऐसे युद्ध श्रमशक्ति का विनाश करते हैं और नागरिक जीवन को असुरक्षा तथा अस्थिरता में धकेल देते हैं। शासक वर्गों के लिए यह शक्ति संतुलन का साधन हो सकता है, लेकिन व्यापक जनसमुदाय के लिए यह अस्तित्व का संकट बन जाता है।
बाहरी हस्तक्षेप द्वारा लाए गए परिवर्तन अक्सर न तो स्थायी होते हैं और न ही प्रगतिशील। स्थायी और प्रगतिशील परिवर्तन आम तौर पर आंतरिक वर्ग संघर्ष की प्रक्रिया से ही पैदा होते हैं। बाहरी हस्तक्षेप से सामान्यतः दो ही तरह के परिणाम सामने आते हैंकृया तो एक आश्रित और नियंत्रित “पपेट” शासन स्थापित हो जाता है, या फिर प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ और अधिक संगठित और कठोर हो जाती हैं।
दोनों ही स्थितियों में जनता की क्रांतिकारी प्रक्रिया बाधित होती है।
यह सर्वविदित है कि साम्राज्यवाद, यानी पूँजीवाद की चरम अवस्था में, इजारेदार पूँजी का प्रभुत्व स्थापित हो जाता है और वित्तीय पूँजी राज्य सत्ता के साथ गहराई से जुड़ जाती है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक साम्राज्यवादी शक्तियाँ संसाधनों और क्षेत्रों के पुनर्विभाजन के लिए प्रतिस्पर्धा करती हैं।
पश्चिम एशिया की घटनाओं को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यहाँ केवल धार्मिक या सांस्कृतिक संघर्ष ही नहीं चल रहे हैं, बल्कि यह क्षेत्र लंबे समय से तेल, गैस, व्यापार मार्गों और सामरिक प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा है।
पूँजीवाद की अपनी अंतर्निहित संकट-प्रवृत्ति होती है। जब घरेलू अंतर्विरोध तीखे होते हैं, तो बाहरी हस्तक्षेप आंतरिक वर्ग संघर्ष को राष्ट्रवादी विमर्श में बदल सकता है। साथ ही सैन्यीकरण के माध्यम से अधिशेष पूँजी को भी अवशोषित किया जाता है। इस प्रक्रिया में जनता का असंतोष बाहरी “दुश्मन” की ओर मोड़ दिया जाता है।
ईरान की वर्तमान स्थिति को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। यहाँ एक तरफ जनता रूढ़िवादी धार्मिक दमन और स्थानीय पूँजीवादी शोषण का सामना कर रही है, वहीं दूसरी तरफ साम्राज्यवादी शक्तियों के सैन्य आक्रमण का खतरा भी मौजूद है।
यह वैश्विक पूँजीवाद की उस संरचनात्मक अवस्था की अभिव्यक्ति है जहाँ राज्य और वित्तीय पूँजी का संलयन, संसाधनों पर प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा और आंतरिक अंतर्विरोधों का सैन्यीकरण एक साथ कार्य कर रहे हैं।
साम्राज्यवादी युद्ध वास्तव में केवल दो-तीन देशों के बीच का युद्ध नहीं होता, बल्कि यह विभिन्न शासक वर्गों के बीच का संघर्ष होता है। इसलिए किसी भी देश की जनता के साथ एकजुटता व्यक्त की जानी चाहिए और साथ ही हर देश के शासक वर्ग की सैन्य आक्रामकता की आलोचना की जानी चाहिए।
न तो साम्राज्यवाद का समर्थन किया जाना चाहिए और न ही प्रतिक्रियावाद का।
एक तरफ वैश्विक प्रभुत्ववादी अमेरिकी शक्ति है, और दूसरी तरफ एक प्रतिक्रियावादी धार्मिक-राजनीतिक शासन, जो अपनी ही जनता पर दकियानूसी दमन थोप रहा है। ऐसे में “दुश्मन का दुश्मन दोस्त है” जैसी सोच सही नहीं हो सकती।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लेनिन ने स्पष्ट कहा था कि मजदूर वर्ग को अपने ही साम्राज्यवादी शासकों का विरोध करना चाहिए, लेकिन दूसरे शासक वर्गों का समर्थन भी नहीं करना चाहिए। शासक वर्ग साम्राज्यवादी युद्धों के माध्यम से वर्ग संघर्ष को राष्ट्रवादी सैन्यवाद में बदलने की कोशिश करता है और आलोचना को “देशद्रोह” या “धर्मद्रोह” घोषित कर देता है।
साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि यदि कोई शासन दमनकारी है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि अमेरिका या इजराइल को वहाँ हस्तक्षेप करने या कब्जा करने का अधिकार मिल जाता है। इतिहास गवाह है कि “लोकतंत्र की स्थापना” के नाम पर साम्राज्यवादी शक्तियों ने कई जगह इससे भी अधिक दमनकारी और निर्मम व्यवस्थाएँ स्थापित की हैं।
ऐसी स्थिति में सही दृष्टिकोण यह है कि अमेरिकी-इजराइली सैन्य आक्रमण का विरोध किया जाए और साथ ही ईरान की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के समर्थन में खड़ा हुआ जाए।
आलेख मजदूर बिगुल पत्रिकार प्राप्त की गयी है। इस लेख के माध्यम से अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान युद्ध को और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे हमारे प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
