भारत में नारीवाद आन्दोलन और मुस्लिम महिलाओं की भूमिका

भारत में नारीवाद आन्दोलन और मुस्लिम महिलाओं की भूमिका

खुशबू खान

भारत में नारीवाद आन्दोलन भारतीय महिलाओं के लिए समान राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक अधिकारों को परिभाषित करने, स्थापित करने, समान अवसर प्रदान करने और उनका बचाव करने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया। यह आन्दोलन किसी न किसी रूप में आज भी प्रभावशाली भूमिका में है। दुनिया भर में अपने नारीवादी समकक्षों की तरह, भारत में नारीवादी, लैंगिक समानता, समान मजदूरी के लिए काम करने का अधिकार, स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए समान पहुंच का अधिकार और समान राजनीतिक अधिकार चाहते हैं। भारतीय नारीवादियों ने भारत के पितृसत्तात्मक समाज के भीतर संस्कृति-विशिष्ट मुद्दों जैसे कि वंशानुगत कानून और सती जैसी प्रथा के खिलाफ सशक्त लड़ाइयां लड़ी है।

भारत में नारीवाद के आन्दोलन को तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है। पहला चरण, 19वीं शताब्दी के मध्य में शुरू हुआ। यह औपनिवेशिक काल था। इस आन्दोलन ने सती प्रथा को समाप्त किया और उन दिनों की कई समाजिक बुराइयों के खिलाफ समाज के बड़े क्षेत्र को प्रभावित किया। दूसरा चरण, 1915 से माना जाना चाहिए, जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इस दौरान स्वतंत्र महिला संगठन उभरे। तीसरा चरण, स्वतंत्रता के बाद प्रारंभ हुआ। इस दौरान शादी के बाद ससुराल में, कार्यस्थल में और राजनीतिक समानता के अधिकार में महिलाओं के निष्पक्ष व्यवहार पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

भारतीय नारीवादी आंदोलनों द्वारा की गई प्रगति के बावजूद, आधुनिक भारत में रहने वाली महिलाओं को अभी भी भेदभाव के कई मुद्दों का सामना करना पड़ता है। भारत की पितृसत्तात्मक संस्कृति ने भूमि-स्वामित्व के अधिकार प्राप्त करने और शिक्षा तक पहुंच को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। पिछले दो दशकों में, लिंग-चयनात्मक गर्भपात की प्रवृत्ति भी सामने आई है। भारतीय नारीवादियों के लिए, इसे अन्याय के खिलाफ संघर्ष के रूप में देखा जाता है।

वैश्विक नारीवाद का आन्दोलन मुख्य रूप से ईसाइयत के खिलाफ महिलाओं का व्यापक संघर्ष था। इसे सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों की एक श्रृंखला के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा। 18 वीं शताब्दी में पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता के आधार पर महिलाओं के अधिकारों और अभिव्यक्तियों की वकालत से यह आन्दोलन प्रारंभ हुआ। मैरी वोलस्टोनक्राफ्ट के द्वारा लिखी गयी 1792 की किताब ‘‘ए विन्डिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमन’’ यकीनन पहली नारीवादी साहित्यिक कृति है और इसी किताब को पश्चिमी जगत के नारीवादी आन्दोलन का प्रारंभ माना जाता है। पश्चिमी नारीवादी आदर्शों से प्रेरित होकर, भारतीय नारीवादी आंदोलन ने दहेज से संबंधित हिंसा, लिंग चयनात्मक गर्भपात के साथ-साथ शिक्षा और समानता के अधिकारों के मुद्दों को लेकर एक संघर्ष प्रारंभ किया। संक्षेप में, जो कोई भी लिंग की समानता में विश्वास करता है और इसे वास्तविकता बनाने के लिए काम करता है वह नारीवादी है।

अन्य आस्था और पंथों में तो यह आन्दोलन व्यापक स्वरूप ग्रहण किया और उसका सकारात्मक परिणाम में सामने आए लेकिन कट्टरपंथियों द्वारा मुस्लिम नारीवादियों का सामाजिक दमन प्रारंभ हो गया। इस्लाम में धार्मिक आधार पर नारियों के अधिकारों की व्यापक व्याख्या है, बावजूद इसके उन्हें कट्टरपंथियों द्वारा  चिंहित किया गया और ऐसी महिलाओं के खिलाफ सामाजिक प्रतिरोध खड़ी करने की कोशिश की गयी। अनिवार्य रूप से मुस्लिम नारीवादी वे नारीवादी हैं, जो इस्लामी आस्था के दायरे में, पुरषों और महिलाओं के बीच सामाजिक और राजनीतिक समानता की दिशा में काम करती हैं लेकिन कट्टरपंथी इसे धर्म के खिलाफ कहकर प्रचारित करने लगते हैं। मुस्लिम नारीवादियों ने कई मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकारों को महसूस करने में मदद की है, जिन्हें अनुचित प्रभुत्व बनाए रखने के लिए उनसे दूर रखा गया था। खुला लेने का अधिकार (विवाह में अलगाव), शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार, पसंद से शादी करने का अधिकार, संपत्ति का अधिकार, पति, पिता, पुत्र और भाई पर वित्तीय अधिकार, वे सभी अधिकार हैं जो आमतौर पर मुस्लिम महिलाओं को नहीं दिए जाते हैं, जबकि इस्लाम के पवित्र गंथ कुरान में ऐसा कुछ भी नहीं है।

भारत ने अपने इतिहास में कई मुस्लिम नारीवादियों को देखा है। रजिया सुल्तान का कार्यकाल छोटा था लेकिन इसे भारतीय मुस्लिम नारीवादी आन्दोलन का प्रणेता माना जाना चाहिए। समकालीन समय में, इस्मत चुगताई, उर्दू साहित्य में एक प्रमुख नाम शायद सबसे प्रभावशाली मुस्लिम नारीवादियों में से एक थी। उन्होंने अपने कई कार्यों में लैंगिक अन्याय, पुरुष विशेषाधिकार और कामुकता के मुद्दों को निडरता से संबोधित किया। उनके अधिकांश कार्यों को विवादास्पद माना गया और उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यह अकेले उनके लेखन की शक्ति और भारतीय नारीवादी विचार पर उनके द्वारा छोड़ी गई छाप को साबित करता है। कुर्रतुलैन हैदर, मुस्लिम नारीवादियों के बीच एक और महत्वपूर्ण नाम है। एक अत्यंत सुशिक्षित महिला और बुद्धिजीवी, हैदर अपनी साहित्यिक उत्कृष्टता और दूरदृष्टि के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से रूढ़िवादी लिंग भूमिकाओं को चुनौती दी और बदलाव की लहर लाई। पेशे से डॉक्टर, राशिद जहान ने अपने लेखन के माध्यम से महिलाओं के खिलाफ कई पूर्व निर्धारित धारणाओं का इलाज किया। उन्होंने अपने कार्यों के माध्यम से पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के मुद्दों को संबोधित किया और अपने समय की कामकाजी महिलाओं की समस्याओं को व्यक्त किया। बेगम रोकैया भारत में नारीवाद के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण शख्सियत हैं। वह महिलाओं की शिक्षा की प्रबल हिमायती थीं और सभी बाधाओं और विवादों के बावजूद, उन्होंने बंगाल में पहले लड़कियों के स्कूल की स्थापना की।

ऊपर वर्णित महिलाओं की तरह एक साहित्यिक व्यक्तित्व तो वह नहीं थी लेकिन भारत की मुस्लिम महिलाओं को उसने कानूनी रास्ते दिखाए, जिसकी बुहिनयाद पर भारतीय संसद ने तीन तलाक के खिलफ कानून बनाया। नाम है शाह बानो, वर्ष 1985 में उसने तीन तलाक को कानूनी चुनौती दी। शाह बानो ने अपने पति से लड़ाई लड़ी जिन्होंने उन्हें और उनके पांच बच्चों को बिना किसी वित्तीय सहायता के छोड़ दिया था। उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में उनके खिलाफ मुकदमा जीता और पूरे देश में कई उत्पीड़ित महिलाओं के लिए आदर्श बन गयी। इस सुचि में और भी कई नाम जुड़ सकते हैं। इन नारीवादियों के कार्य, महिलाओं के संबंध में, इस्लाम के नियमों की बुनियादी समझ की कमी के तरफ ध्यान आकर्षित करते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कैसे मुस्लिम समुदाय के विशेषाधिकार प्राप्त पुरुषों ने सांस्कृतिक पितृसत्ता की सहायता से इन इस्लामी शासनों को अपने फायदे के लिए तोड़-मरोड़ कर पेश किया है, और वर्षों से मुस्लिम महिलाओं पर इतना अत्याचार किया है। मुस्लिम नारीवादियों, विशेष रूप से ऊपर वर्णित महिलाओं ने मुस्लिम पुरुषों और यहां तक कि पूरे मुस्लिम समुदाय के पाखंड और दोहरे मानकों को उजागर किया है।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी हैं, इससे जनलेखा प्रबंधन का कोई लेना देना नहीं है।)

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