कश्मीरियों को संविधान सम्मत सारे अधिकार प्रदान हो लेकिन पृथक्तावादी मनोवृति पर भी लगाम जरूरी

कश्मीरियों को संविधान सम्मत सारे अधिकार प्रदान हो लेकिन पृथक्तावादी मनोवृति पर भी लगाम जरूरी

गौतम चौधरी

नई संवैधानिक व्यवस्था के बाद पहली बार केन्द्र सरकार ने बड़े पैमाने पर जम्मू-कश्मीर के स्थानीय नेताओं के साथ अभी हाल ही में एक बैठक संपन्न की है। वार्ता की बैठक में कश्मीर के हालिया स्थिति पर चर्चा के साथ ही साथ संभवतः इस विषय पर भी एक राय बनाने की कोशिश की गयी कि आने वाले समय में कश्मीर को लेकर जो भारत सरकार सोचती है, वही भविष्य की रणनीति भी होगी। वार्ता के कई पक्ष समाचार माध्यमों में सुर्खियां बटोरी। इस बैठक के बाद अखबारी व्याख्याकार और टिप्पणीकारों ने कश्मीर मामले पर बहुत कुछ लिखा और दिखाया है।

कई लोगों ने केन्द्र सरकार एवं स्थानीय नेताओं के बीच की बैठक पर अपने मन्तव्य प्रस्तुत किए हैं। लिहाजा, बैठक की योजना सार्वजनिक होने से लेकर बैठक के बाद की स्थिति पर कई प्रश्न भी खड़े हुए हैं। सबसे पहला प्रश्न तो यही उठ रहा है कि आखिर इतने दिनों के बाद केन्द्र सरकार एकाएक बैठक की योजना क्यों बनाई? कुछ जानकारों ने यह भी आशंका व्यक्त की है कि संभवतः केन्द्र की नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार जम्मू-कश्मीर में कुछ नयी व्यवस्था देने की सोच रही है। कुछ टिप्पणीकारों ने यह आशंका भी जताई है कि केन्द्र सरकार अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के दबाव में है और यही कारण है कि कश्मीर के नेताओं के साथ वह बात करने के लिए बाध्य हुई है। 

तीनों आशंकाएं अपने जगह जायज है। इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है कि कश्मीर में स्थाई रूप से शांति अभी भी नहीं बन पाई है। खासकर श्रीनगर घाटी का इलाका अभी भी आतंकवादियों की जद में है। लाख कोशिश के बाद भी केन्द्र सरकार, स्थानीय आम मुसलमानों को यह समझाने में नाकाम रही है कि सरकार का निर्णय बिल्कुल सही है और उनके हितों को ध्यान रखकर लिया गया है। पड़ोसी देशों से सहयोगप्राप्त पृथक्तावादी शक्तियां, खासकर इस्लामिका आतंकवादी, स्थानीय मुसलमानों को यह समझाने में कामयाब हो रहे हैं कि भारत सरकार उन्हें गुलाम बनाने की कोशिश में है। इस बीच केन्द्र सरकार ने स्थानीय लोगों के हितों में बहुत फैसले लिए हैं। साथ ही विकास के कई काम भी वहां जोरों पर है लेकिन पांथिक उन्माद अभी भी वहां सिर चढ़ कर बोल रहा है, जिसका फायदा विदेशी शक्तियां उठा रही है। 

हो सकता है, केन्द्र सरकार कश्मीर को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव में हो लेकिन इससे बड़ी समस्या अफगानिस्तान से आती दिख रही है। वर्तमान सरकार की अमेरिकी परस्त विदेश नीति के कारण भारत का अफगान मिशन संकट में है। सत्ता परिवर्तन के साथ ही संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी सैन्य टुकड़ियों की घर वापसी को गति प्रदान कर दिया। अमेरिकी सेना की वापसी के साथ ही तालिवानी लड़ाके अफगान की सरजमीन पर तेजी से पैर पसारने लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आयी खबर के अनुसार अफगानिस्तान के लगभग 60 प्रतिशत जमीन पर तालिवानी लड़ाकों ने कब्जा जमा लिया है। यदि अफगानिस्तान में तालिवानियों ने कब्जा कर लिया तो यह भारत के लिए संकट पैदा करेगा और उसका सौफ्ट टारगेट कश्मीर ही होगा। इस लए कश्मीर में स्थायी शांति जरूरी है। संभवतः भारत सरकार इस संटक को ध्यान में रखकर स्थानीय नेताओं की बैठक बुलाई होगी। 

सरकार का यह निर्णय बुरा नहीं है और भारत सरकार जो आज कर रही है, उसे पहले ही कर लेनी चाहिए था। खबरों में छन कर आ रही है कि भारत सरकार कश्मीर के मामले में कुछ रियायत देने की योजना बना रही है। इसमें यह कहा जा रहा है कि सरकार हिमाचल प्रदेश या फिर पूर्वोत्तर राज्यों जैसा कोई अलग से कानून बना दे, जिससे स्थानीय लोगों को यह विश्वास हो कि विकास के सारे मानक राष्ट्रीय होंगे और स्थानीयता पर भी कोई आंच नहीं आएगी। यदि यह होता है, तो इसमें भी कोई बुराई नहीं है क्योंकि देश के कई राज्यों में स्थानीयता से संबंधित कई प्रकार के कानून हैं और वहां स्थाई रूप से शांति भी है लेकिन देश की अखंडता को ध्यान में रखकर ही ये सारे निर्णय होने चाहिए। 

प्रतिपक्षी नेता या फिर तथाकथित मानवाधिकारवादी कार्यकर्ता चाहे कुछ भी कह लें लेकिन दुनिया का एकलौता यह इलाका है, जहां स्थानीय लोगों को रिझाने के लिए न जाने क्या-क्या प्रयोग किए गए। विगत सात दशकों से कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए वे सारे प्रयास किए गए जो स्थानीय लोगों के हित में थे। बावजूद इसके घाटी के मुट्ठीभर मुस्लिम नेताओं ने कभी कश्मीर में स्थाई शांति को बढ़ावा नहीं दिया। हालांकि इस बीच भारत सरकार की ओर से भी कई गलतियां हुई। यही नहीं राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के स्थान पर कश्मीर में पृथकतावादी नेताओं को केन्द्र सरकार ने ज्यादा तरजीह दी। 

वर्तमान सरकार ने कश्मीर को लेकर जो निर्णय लिया, उससे बढ़िया निर्णय और कोई हो ही नहीं सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि स्थानीय लोगों के साथ अन्यय की जाए। हम लोकतंत्र वाले देश में निवास करते हैं। भारतीय संघ का संविधान जो हमे अधिकार दिया है वह कश्मीरियों को भी प्राप्त होना चाहिए। इस मामले में केन्द्र सरकार की थोड़ी चूक दिखती है लेकिन पूर्ववत व्यवस्था किसी कीमत पर नहीं होनी चाहिए। यदि फिर से ऐसा हुआ तो कश्मीर हमारे हाथ से निकल जाएगा और पश्चिमी देशों, खासकर ब्रिटेन और अमेरिका की रणनीति वहां कामयाब हो जाएगी।

इस बात को संभवतः पाकिस्तान के कूटनीतिज्ञ भी समझने लगे हैं। कश्मीर को लेकर पाकिस्तान सरकार भी इन दिनों लचीला रवैया अपना रही है। वर्तमान मौका बढ़िया है। कश्मीर की समस्या का समाधान का यही सही वक्त है। सरकार को कश्मीर में स्थायी शांति के लिए भारतीय संविधान के दायरे में वह हर व्यवस्थ कश्मीरियों को प्रदान करनी चाहिए जिसके वे हकदार हैं लेकिन पृथक्तावादियों को वही दंड मिलनी चाहिए जिसके लिए भारतीय कानून में व्यवस्था दी गयी है। 

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