गौतम चौधरी
भारतीय चिंतन परंपरा में पुरुषार्थ चतुष्टय-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का विशेष महत्व है। इनमें “अर्थ” को अत्यंत केंद्रीय स्थान प्राप्त है, क्योंकि बिना अर्थ के न तो धर्म का पालन संभव है और न ही काम की पूर्ति। कौटिल्य के ’अर्थशास्त्र’ में यह विचार स्पष्ट रूप से प्रतिपादित होता है कि अर्थ ही राज्य, समाज और व्यक्ति के अस्तित्व का मूल आधार है। कौटिल्य के अनुसार, प्रत्येक वस्तु और सेवा का एक मूल्य होता है और वही “अर्थ” है। यह केवल धन या संपत्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें श्रम, उत्पादन, सेवा और संसाधन सभी सम्मिलित हैं। इस प्रकार अर्थ जीवन के प्रत्येक आयाम में विद्यमान है।
अर्थशास्त्र में यह स्पष्ट किया गया है कि धर्म और काम दोनों अर्थ पर आधारित हैं। यदि व्यक्ति या राज्य के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, तो वह न तो धार्मिक कर्तव्यों का पालन कर सकता है और न ही जीवन की आवश्यक इच्छाओं की पूर्ति कर सकता है। इसलिए अर्थ को प्राथमिकता देना आवश्यक है, किंतु यह नैतिक सीमाओं के भीतर होना चाहिए।
कौटिल्य ने दूसरे के अर्थ के अपहरण को गंभीर अपराध माना है। उनका मानना है कि ‘‘किसी अन्य व्यक्ति की संपत्ति या संसाधन को हानि पहुँचाना, केवल उसका ही नहीं बल्कि सामाजिक संतुलन का भी नाश करता है। जब यह प्रवृत्ति बढ़ती है, तो यह अंततः स्वयं के पतन का कारण बनती है। इस प्रकार, अर्थ की सुरक्षा केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है।’’
कौटिल्य के अनुसार, राज्य की शक्ति उसकी जनता और उनके संसाधनों (अन्न, सेवा, उत्पादन) पर निर्भर करती है। यदि राज्य ‘‘जनता के संसाधनों का शोषण करता है, या उनके अधिकारों का हनन करता है, तो यह राज्य के पतन का कारण बनता है।’’ इस संदर्भ में कौटिल्य ने स्पष्ट किया है कि राजा का कर्तव्य है कि वह, ‘‘जनता की रक्षा करे, उनके संसाधनों का संरक्षण करे और न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करे।’’
अंततः कौटिल्य का ’अर्थशास्त्र’ केवल आर्थिक नीति का ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह एक समग्र शासन-दर्शन प्रस्तुत करता है। इसमें अर्थ को जीवन और राज्य का आधार मानते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि ‘‘अर्थ का संरक्षण ही धर्म और काम की स्थिरता सुनिश्चित करता है और जनता के संसाधनों की रक्षा ही राज्य की दीर्घकालिक स्थिरता का आधार है।’’ अतः यह कहा जा सकता है कि कौटिल्य का यह सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है -“दूसरे के अर्थ का नाश, अंततः अपने ही विनाश का कारण बनता है।”
हर वस्तु का मूल्य है, हर सेवा का मूल्य है और जिसका भी मूल्य है, वही अर्थ है। यह साधारण-सा दिखने वाला सिद्धांत वास्तव में समाज और राज्य की स्थिरता का मूलाधार है। भारतीय चिंतन में अर्थ को केवल धन या संपत्ति नहीं, बल्कि जीवन की संपूर्ण उत्पादकता, श्रम और संसाधनों का प्रतीक माना गया है। यही कारण है कि आचार्य कौटिल्य के ’अर्थशास्त्र’ में अर्थ को धर्म और काम-दोनों पुरुषार्थों का आधार बताया गया है।

बहुत ही सारगर्भित