गौतम चौधरी
क्या आपको पता है, जिस गीत के कारण ‘गूंज उठी शहनाई’ फिल्म कामयाब हुई, उस गीत की धुन कोई और नहीं, बिहार के मुजफ्फरपुर की रहने वाली एक तवायफ ने दी थी। उस तवायफ के बारे में खुद शहनाई नवाज़ उस्ताद बिस्मिल्लाह खां साहब ने तारीफ की है। बृजबाला मुज़फ़्फ़रपुर की तवायफ थी। खां साहब डुमराव के रहने वाले थे। दोनों बिहारी थे। एक महफ़िल में दोनो की मुलाक़ात हुई और इस तवायफ ने बिस्मिल्लाह को बिस्मिल्लाह बना दिया। ‘गूंज उठी शहनाई’ में भरत व्यास का वो गीत ‘दिल का खिलौना हाय टूट गया’ बृजवाला की ही धुन थी। खां साहब इससे अमर हो गए। खां साहब कहते थे “मैं उनके साथ में बहुत रियाज करता था। उसकी बंदिश को मैंने शहनाई में उतारा और मेरी वह फूंक अमर हो गई।” ये बात दीगर है कि खां साहब भारत रत्न बने और बृजबाला गुमनामी के अंधेरे में गुम हो गईं।
खुद खां साहब कहते थे कि अगर कोठे नहीं होते, तवायफ़ें नहीं होतीं तो आज बिस्मिल्लाह बिस्मिल्लाह नहीं होता। उनका मानना था कि जितनी पक्की गायकी कोठे पर थी, वह कहीं और नहीं मिलती थी। हालांकि कोठे की परंपरा मुजफ्फरपुर में भी थी और वहां एक से बढ़ कर एक तवायफें भी थी लेकिन वह उतनी विकसित नहीं हो पायी।
तवायफ, वेश्या, गणिकाएं, वारांगना, नगर वधू, पतुरिया, रंडी-मुंडी देश के सांस्कृतिक इतिहास की ये रवायतें ढाई से तीन हज़ार साल पुरानी हैं। अवध, बनारस और मुज़फ़्फ़रपुर का चतुर्भुज स्थान इस इतिहास के जिन्दा केन्द्र रहे हैं। बौद्ध काल में भी गणिकाओं का उल्लेख मिलता है। आम्रपाली की कथा तो आप जानते ही होंगे। बुद्ध ने इसकी प्रतिभा देख इसे अपने विहार में प्रवेश दिया था। तब तक महिलाएं बौद्ध विहारों में प्रतिबंधित थीं। पारम्परिक मुजरा, गीत, ग़ज़ल, बंदिशों के बोलों को भावपूर्ण नृत्य शैली में अंजाम देने वाली नर्तकी को तवायफ कहते हैं। यह नर्तकियां ‘पेशवाज’ पहन कर नृत्य करती थीं, जिसमें शरीर के ऊपरी भाग में घेरेदार अंगरखा और पैरों में चूड़ीदार पाजामा पहना जाता है।
तवायफें अमूमन जिस्मफरोशी नहीं करती थीं। आमतौर पर किसी राजा, नवाब, रईस या गोरे साहब की रक्षिता (रखैल भी पढ़ सकते हैं) के तौर पर ये तवायफें अपना जीवन गुज़ारती थीं। हर शाम कोठे पर महफ़िल सजाना और उपशास्त्रीय गायन ही इनका काम था।
तवायफों का इतिहास बहुत पुराना है। संस्कृत में गणिका का मतलब वेश्या होता है। ‘शब्द कल्पद्रुम’ में इन्हे लम्पटगणों की भोग्या कहा गया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के मुताबिक़ उस वक्त गणिकाओं का इस्तेमाल सूचना इकट्ठा (जासूसी) करने के लिए भी होता था। बाद के दिनों में वेश्या नृत्य संगीत के अलावा जिस्मफरोशी में भी लग गईं। साधारण तौर पर इन्हें कोठेवालियां या रंडी भी कहते हैं।
अवध में इन्हे पतुरिया भी कहा जाता था। वैसे काशी की तवायफ परम्परा काफ़ी समृद्ध थी तभी तो भारतेन्दु ने ‘प्रेमयोगिनी’ में लिखा है “आधी कासी भाट भंडोरिया बाम्हन औ संन्यासी। आधी कासी रंडी मुंडी रांड़ खानगी खासी। देखी तुम्हरी काशी लोगों, देखी तुम्हरी काशी।’’
पर तवायफ और गणिका में बड़ा झीना अन्तर है। ‘तवायफ’ अरबी ‘तायफा’ का बहुवचन है जिसका अर्थ है व्यक्तियों का दल, विशेषतरू गाने बजाने वालों का दल. इस मंडली में शामिल नाचने वाली को ही ‘तवायफ’ कहा गया है। मध्य युग में रईस और जमींदारों के घरों में विवाह या अन्य-उत्सवों में मुजरा होता था। मुजरे में कई तवायफ अपनी साथियों के साथ शामिल होती थीं। तवायफों की परिभाषा शब्दकोष में भी मिलती है। मुजरे में नाचने वाली नर्तकियों को तवायफ कहा जाता है।
भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दिनों में अंग्रेजों ने गड़बड़ की। सभी नाचने वालियों को एक ही श्रेणी में रख इन्हें ‘नॉच गर्ल’ कहा। इसी के चलते समझ में यह अंतर मिटने लगा। अंग्रेजी चश्मे से लिखे गए इन अभिलेखों, क्रॉनिकल, गज़ेटियर में इन सबको नॉच गर्ल करार दिया गया। इस विषय पर सबसे प्रामाणिक लेखन अंग्रेज़ लेखक प्राण नेविल और फ्रेंचेस्का ऑरसीनी का है। जबकि हिन्दी में प्रामाणिक लेखन अमृत लाल नागर की ‘ये कोठेवालियां’ है।
