आइए चलते हैं पहाड़ों की रानी मसूरी की सैर पर

आइए चलते हैं पहाड़ों की रानी मसूरी की सैर पर

विनय पांडेय

उत्तराखंड राज्य की अस्थाई राजधानी देहरादून से लगभग 32 किलोमीटर की दूरी पर शिवालिग की ढलान पर बसा एक अति मनोरम एवं अप्रतिम हिल स्टेशन है, जिसे दुनिया मसूरी के नाम से जानती है। इसे पर्वतों की रानी भी कहा जाता है। समुद्र तल से लगभग 2112 मीटर की उंचाई वाला यह हिल स्टेशन सचमुच बेहद मनोहारी है।

मसूरी की अद्भुत खूबसूरती यहां आनेवाले पर्यटकों का बरबस ही मन मोह लेती है। मसूरी की खोज सन् 1825 ईस्वी में एक साहसिक ब्रिटिश मिलिट्री अधिकारी कैप्टन यंग और देहरादून निवासी अधीक्षक शोर के द्वारा की गई थी। इस जगह पर बहुतायत में उगनेवाले एक पौधे ‘‘मंसूर‘‘ के वजह से इसका नामकरण मंसूरी किया गया था। 1827 में यहां लैंढोर इलाके में (जो अब कैंटोनमेंट बन चुका है) एक सेनिटोरियम बनवाया गया था। यहां के प्राकृतिक सौंदर्य और हिमाच्छादित पर्वतों से मोहित होकर कर्नल एवरेस्ट ने भी 1832 में यहीं अपना घर बनवाया। अंग्रेजों द्वारा बसाए गए अन्य शहरों की भांति, इस शहर के मुख्य स्थल को ‘‘मॉल‘‘ कहा गया। मसूरी का मॉल रोड पूर्व में पिक्चर पैलेस से लेकर पश्चिम में पब्लिक लाइब्रेरी तक जाता है।

ब्रिटिश शासन काल में मॉल रोड में भारतीयों को जाने की अनुमति नहीं थी। मॉल रोड पर लिखा होता था ‘‘डॉग्स एंड इंडियंस नॉट एलाउड‘‘ यानि भारतीय और कुत्तों को अनुमति नहीं। ब्रिटिश काल में बसाए गए प्रायः हर शहरों में उनकी मानसिकता का परिचय देते इस प्रकार के चिन्ह मिल ही जाते थे। उस समय मसूरी सड़क मार्ग से सहारनपुर से जाया जाता था। सन् 1900 में रेल के आने से इसकी गम्यता सरल हो गई, जिससे सड़क मार्ग से केवल 21 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती थी। निकटवर्ती देहरादून में रहनेवाले अंग्रेज ऑफिसर्स भी गर्मी में मसूरी में ही रहना पसंद करते थे।

अप्रैल 1959 में चीन अधिकृत तिब्बत से निर्वासित होकर दलाई लामा सर्व प्रथम यहीं आए और तिब्बत की निर्वासित सरकार का गठन किया। बाद में यह सरकार हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में स्थानांतरित हो गई। भारत में पहला तिब्बती स्कूल भी सन् 1960 में यहीं खुला था। आज भी 5000 से ज्यादा तिब्बती लोग मसूरी के हैप्पी वैली इलाके में बसे हुए हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार मसूरी की जनसंख्या मात्र 30118 थी एवं साक्षरता दर 89.69 प्रतिशत थी।

भारत का एकमात्र भारतीय प्रशासनिक प्रशिक्षण केंद्र, ‘‘लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी’’ मसूरी में ही स्थित है। यहां भारत तिब्बत सीमा पुलिस यानि आई टी बी पी का उत्तर क्षेत्रीय मुख्यालय एवं पूर्ण प्रशिक्षण केंद्र भी स्थित है।

अंग्रेजों ने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के उद्देश्य से यहां कई उच्च स्तरीय विद्यालय बनवाए। इनमें से कई आज भी अपना वही मूल्य संरक्षित किए हुए उच्च गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा दे रहे हैं। 1853 में स्थापित सेंट जॉर्ज विद्यालय यहां के पुराने और प्रसिद्ध विद्यालयों में से एक है। 400 एकड़ में फैला इसका कैंपस मैनर हाउस के नाम से जाना जाता है।

1850 ईसवी में 250 एकड़ क्षेत्र में बना वुडस्टॉक आवासीय विद्यालय भी भारतीय उपमहाद्वीप के प्रसिद्ध आवासीय विद्यालयों में से एक है। सन् 1969 में गुरु नानक देव जी की स्मृति में स्थापित गुरु नानक फिप्थ सेंटेनरी स्कूल (जी एन एफ सी एस) एवं मसूरी इंटरनेशनल स्कूल भी अपनी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिहाज से काफी लोकप्रिय है। अब तो मसूरी में कई अन्य नामी गिरामी स्कूल भी गरिमापूर्ण ढंग से संचालित किए जा रहे हैं।

मसूरी एवं इसके आसपास पर्यटकों के लिए कई दर्शनीय स्थल हैं। आप जब भी मसूरी जाएं तो इन स्थलों का दर्शन अवश्य करें। वैसे तो पूरा क्षेत्र ही पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है लेकिन कुछ ऐसी जगह भी है, जहां घूमे बगैर आपका मसूरी भ्रमण अधूरा ही माना जायेगा। जैसे .. ’गन हिल’, यह मसूरी की दुसरी सबसे ऊंची चोटी पर है। यहां आप पैदल भी जा सकते हैं और रोप वे से भी। गन हिल की सैर अति रोमांचक और अविस्मरणीय है। यहां से हिमालय पर्वत श्रृंखला अर्थात, बंदरपंच, श्रीकांता, पिथवाड़ा और गंगोत्री समूह आदि के सुंदर दृश्य को देख सकते हैं, साथ ही मसूरी और दूनघाटी का विहंगम दृश्य भी यहां से दिखता है, जो मनमोहक है। आजादी से पहले इस पहाड़ी के ऊपर रखी तोप प्रतिदिन दोपहर को चलाई जाती थी ताकि लोग अपनी घड़ियों का समय सेट कर लें, इसी कारण इस स्थान का नाम गन हिल पड़ा।

’म्युनिसिपल गार्डन’ मसूरी का वर्तमान कंपनी गार्डन या म्युनिसिपल गार्डन आजादी से पहले तक बोटेनिकल गार्डन कहलाता था। कंपनी गार्डन के निर्माता विश्वविख्यात भूवैज्ञानिक डॉ. एच. फाकनार लोगी थे। सन् 1842 के आस-पास उन्होंने इस क्षेत्र को सुंदर उद्यान में बदल दिया था। बाद में इसकी देखभाल कंपनी प्रशासन के जिम्मे आ गया। इसलिए इसे कंपनी गार्डन या म्युनिसिपल गार्डन कहा जाने लगा।

तिब्बती मंदिर बौद्ध सभ्यता और तिब्बती अस्थापत्य कला की निशानी है। बौद्ध गाथा कहता यह मंदिर बड़ा ही मनमोहक है। इस मंदिर के पीछे की तरफ कुछ ड्रम लगे हुए हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि इन्हें घुमाने से मनोकामना पूरी होती है। चाइल्डर्स लॉज, लाल टिब्बा के निकट यह मसूरी की सबसे ऊंची चोटी है। यहां तक घोड़े पर या पैदल भी पहुंचा जा सकता है। यहां से हिमाच्छादित पहाड़ों के दृश्य देखना बहुत रोमांचक लगता है।

कैमल बैक रोड कुल 3 किलोमीटर लंबा, रिंक हॉल के समीप कुलरी बाजार से आरंभ होता है और लाइब्रेरी बाजार पर जाकर समाप्त होता है। इस सड़क पर पैदल चलना या घुड़सवारी करना अच्छा लगता है। हिमालय में सूर्यास्त का दृश्य यहां से बहुत ही सुंदर दिखाई पड़ता है। मसूरी पब्लिक स्कूल से देखने पर कैमल रॉक जीते जागते ऊंट जैसा लगता है, इसलिए इसका नाम उंट के नाम पर रख दिया गया है।

झड़ीपानी फाल, यह जल प्रपात मसूरी-झड़ीपानी रोड पर मसूरी से 8.5 किलोमीटर की दूर स्थित है। पर्यटक झड़ीपानी तक 7 किलोमीटर की दूरी बस या कार द्वारा तय करके यहां से पैदल 1.5 किलोमीटर दूरी तय कर झरने तक पहुंच सकते हैं। भट्टा फाल, यह फाल मसूरी-देहरादून रोड पर मसूरी से 7 किलोमीटर दूर स्थित है। पर्यटक बस या कार द्वारा यहां पहुंचकर आगे की 3 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करके झरने तक पहुंच सकते हैं। स्नान और पिकनिक के लिए भी यह अच्छी जगह है।

कैम्पटी फाल, यमुनोत्री रोड पर मसूरी से 15 किलोमीटर की दूर 4500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यह इस सुंदर घाटी में स्थित सबसे बड़ा और सबसे खूबसूरत झरना है, जो चारों ओर से ऊंचे पहाड़ों से घिरा है। झरने की तलहटी में स्नान तरोताजा कर देता है और बच्चों के साथ-साथ बड़े भी इसका आनंद उठाते हैं। यह झरना पांच अलग-अलग धाराओं में बहता है, जो पर्यटकों के लिए खासा आकर्षण का केंद्र बना रहता है। यह स्थल समुद्रतल से लगभग 4500 फुट की ऊंचाई पर है। इसके चारों ओर पर्वत श्रृंखलाएं दिखाई देती हैं। अंग्रेज अपनी चाय दावत अकसर यहीं पर किया करते थे। इसीलिए इस झरने का नाम कैंप-टी फाल पड़ा।

नाग देवता मंदिर, कार्ट मेकेंजी रोड पर स्थित यह प्राचीन मंदिर, मसूरी से लगभग 6 किलोमीटर की दूर पर स्थित है। वाहन से ठीक मंदिर तक जाया जा सकता है। यहां से मसूरी के साथ-साथ दून-घाटी का सुंदर दृश्य देखा जा सकता है। मसूरी झील, मसूरी-देहरादून रोड पर यह नया विकसित किया गया पिकनिक स्पॉट है, जो मसूरी से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी है। यह एक आकर्षक स्थान है। यहां पैडल-बोट उपलब्ध रहती हैं। यहां से दून-घाटी और आसपास के गांवों का सुंदर दृश्य दिखाई देता है।

वाम चेतना केंद्र, टिहरी बाईपास रोड पर लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर यह एक विकसित किया गया पिकनिक स्पॉट है, इसके आसपास पार्क हैं, जो देवदार के जंगलों और फूलों की झाड़ियों से घिरा है। यहां तक पैदल या टैक्सी या फिर कार से पहुंचा जा सकता है। पार्क में वन्य प्राणी जैसे घुरार, कांकर, हिमालयी मोर, मोनाल आदि आकर्षण के मुख्य केंद्र हैं।

सर जॉर्ज एवरेस्ट हाउस, 6 किलोमीटर की दूरी पर भारत के प्रथम सर्वेयर जनरल सर जॉर्ज एवरेस्ट की दी पार्क एस्टेट है। उनका आवास और कार्यालय यहीं था, यहां सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है। विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट का नाम इन्हीं के नाम पर रखा गया है।

ज्वालाजी मंदिर, मसूरी से 9 किलोमीटर पश्चिम में 2104 मीटर की ऊंचाई पर ज्वालाजी मंदिर स्थित है। यह बेनोग हिल की चोटी पर बना है, जहां माता दुर्गा की पूजा होती है। मंदिर के चारों ओर घना जंगल है, जहां से हिमालय की चोटियों, दून घाटी और यमुना घाटी के सुंदर दृश्य दिखाई देते हैं।

क्लाउड्स एंड, यह बंगला 1838 में एक ब्रिटिश मेजर ने बनवाया था, जो मसूरी में बने पहले चार भवनों में से एक है। अब इस बंगले को होटल में बदला जा चुका है, क्लाउड्स एंड कहे जाने वाला यह होटल मसूरी हिल के एकदम पश्चिम में, लाइब्रेरी से 8 किलोमीटर दूर स्थित है। यह रिजार्ट घने जंगलों से घिरा है, जहां पेड़-पौधों की विविध किस्में हैं, साथ ही यहां से हिमालय की हिमाच्छादित चोटियां और यमुना नदी को देखा जा सकता है। विदेशी पर्यटकों और हनीमून पर आने वाले दंपत्तियों के लिए यह सबसे उपयुक्त रिजार्ट माना जाता है। यमुना ब्रिज, मसूरी से 27 किलोमीटर दूर चकराता-बारकोट रोड पर स्थित है। यह फिशिंग के लिए एक आदर्श स्थान है।

धनोल्टी, मसूरी से लगभग 25 किलोमीटर दूर मसूरी-टिहरी रोड पर स्थित है। मार्ग में, चीड़ और देवदार के जंगलों के बीच बुरानखांडा से हिमालय का शानदार दृश्य देखा जा सकता है। सप्तांहत में आराम करने के लिए धनोल्टी एक आदर्श स्थान है। यहां टूरिस्ट-बंगलो भी उपलब्ध हैं। सुरखंडा देवी, यह स्थान मसूरी-टिहरी रोड पर मसूरी से लगभग 33 किलोमीटर दूर और धनोल्टी से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पर्यटक बस या कार द्वारा कड्डु खाल (देवास-थाली) तक जा सकते हैं। जहां से आगे 2 किलोमीटर पैदल चलकर यहां पहुंचा जा सकता है। यह मंदिर समुद्र तल से 10,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है, यहां से हिमालय का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। यहां की यात्रा का अनुभव आपको अविस्मरणीय अहसास देगा।

चंबा (टिहरी)’ यह धनोल्टी से लगभग 31 किलोमीटर दूर है। यहां तक यात्रा बहुत शानदार है। सीजन के दौरान, पूरे मार्ग पर सेव बहुतायत में मिलते हैं। लाखा मंडल, कैम्पटी फाल से गुजरने पर मसूरी-यमुनोत्री रोड पर 75 किलोमीटर दूर है। लाखा-मंडल, कुवा तक 71 किलोमीटर की सड़क यात्रा के बाद यमुना नदी को सड़क-पुल से पार करना पड़ता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा यहां पुरातत्व महत्व की सैंकड़ो मूर्तियां रखी गई हैं। कहा जाता है कि कौरवों ने यहां लाह का महल बनाया था और पांडवों को जिंदा जलाने का षडयंत्र रचा था।

मसूरी-नागटिब्बा, नागटिब्बा से हिमालय की चोटियां का शानदार दृश्य दिखाई देता है। यहां से बरास्ता पंथवाड़ी, नैनबाग और कैम्पटी की कुल 62 किलोमीटर की दूरी कवर की जा सकती है। मसूरी-भद्रज, बरास्ता पार्क टोल-क्लाउड्स एंड, धुधली मसूरी से लगभग 15 किलोमीटर दूर यह ट्रेकिंग के लिए एक आदर्श स्थान है। मसूरी शहर के एकदम पश्चिमी क्षेत्र में स्थित भद्रज से दूनघाटी, चकराता श्रृंखला और गढ़वाल हिमालय के जौनसर बालर क्षेत्र का शानदार दृश्य दिखाई देता है। भगवान बलभद्र को समर्पित भद्रज मंदिर पहाड़ी की चोटी पर स्थित है।

इसके अलावा मसूरी के आसपास अनेक ऐसे मार्ग हैं, जहां प्रकृति के भरपूर दर्शन किए जा सकते हैं और जहां पूर्ण शांति है। जैसे, कैमल बैक रोड, चार्लविले रोड, जज टिहरी रोड, सिस्टर बाजार रोड, स्प्रिंग रोड आदि। इन मार्गों से गुजरते हुए आप यहां के भव्य प्राकृतिक नजरों का भरपूर लुफ्त उठा सकते हैं।

यूं तो मसूरी में हमेशा पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है लेकिन गर्मी के दिनों में तो देहरादून मसूरी मार्ग गाड़ियों से खचाखच भरा रहता है। पर्यटन को और भी रोमांचक बनाने के लिए देहरादून से मसूरी के लिए ट्रॉली सेवा भी शुरू की जा रही है। इस रोपवे के शुरू होने पर पर्यटकों के लिए गम्यता और बढ़ जाएगी। पर्यटक, रोमांचक और आकर्षक और अधिक आनंद उठा पाएंगे।

मसूरी के उत्तर पूर्व में हिम मंडित शिखर सिर उठाए दृष्टिगोचर होते हैं, तो दक्षिण में दून घाटी और शिवालिक श्रेणी की अद्भुत छटा भी दिखती है। इसी कारण यह शहर पर्यटकों के लिए परी महल जैसा प्रतीत होता है। मसूरी यमुनोत्री, गंगोत्री का प्रवेश द्वार भी है। देहरादून में पायी जानेवाली वनस्पति और जीव जंतु इसके आकर्षण को और बढ़ा देते हैं।

मसूरी भ्रमण के लिए देश विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटकों का आना सालों भर लगा रहता है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के लोग तो गर्मी के मौसम में अक्सर अपना सप्ताहांत बिताने यहां पहुंच जाते हैं। यहां पहुंचने के लिए सड़क, रेल और हवाई मार्ग उपलब्ध है। निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट है, तो निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून है। अच्छे होटल, रेस्टोरेंट, बाजार, बस और टैक्सी सेवा आपके सफर को यादगार बना देते हैं।

यहां जो एक बार आता है वह बार बार आने को विवश हो जाता है। यहां जब भी आप आएं, अपने साथ गर्म कपड़ा अवश्य लाएं क्योंकि यहां सालोभर ठंड पड़ती है।

(लेखक यशवीता त्रयमासिक पत्रिकार के प्रधान संपादक हैं।)

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