रहस्य रोमांच/ जब महाराजा अनूपसिंह की धधकती चिता में ‘मोर‘ कूदे

रहस्य रोमांच/ जब महाराजा अनूपसिंह की धधकती चिता में ‘मोर‘ कूदे

चेतन चौहान

राजस्थान की वीर प्रसूता धरा समूचे विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान कायम कर चुकी है और यही वजह है कि विश्व के कोने-कोने से भारत आने वाले सैलानी यहाँ की ऐतिहासिक इमारतें, किलों, हवेलियों व राजप्रसादों के अलावा पत्थर पर की गई बारीक नक्काशी के नायब कलाकृतियों के रूप में बनी छतरियों को देखना चाहते हैं जो आज भी अपनी भूली बिसरी यादों को अपने दामन में समेटे हुए है।

ऐतिहासिक शहर बीकानेर में यहां के पंाचवंे शासक कल्याणमल से लेकर महाराजा करणीसिंह तक की छतरियां बनी हुई हैं जो स्थापत्य कला की बेजोड़ नमूना है। ये छतरियां कल्याण सागर नामक तालाब के चारों ओर स्थित है जो अपने युग की रोचक कथाँए व इतिहास समेटे हुए हैं। ये कलात्मक छतरियां टुलमेरा के लाल बलुई पत्थरों व मकराना के प्रसिद्ध सफेद संगमरमर से बनी हुई है।

बीकानेर के महाराजा अनूपसिंह जी की स्मृति में भी यहॉं बनी छतरी अपने आप में एक रोचक गाथा समेटे हुए है। जो उनके कला साहित्य व संस्कृति प्रेम के साथ जुड़ी हुई है। महाराजा अनूपसिंह सम्राट औरंगजेब के समकालीन थे व इन्होने औरंगजेब की सेना में सेनानायक के रूप में दक्षिण भारत के कई युद्धों में अपनी अहम भूमिका निभाई थी। जब महाराजा अनूपसिंह का निधन हुआ था तब उनके चितास्थल के आसपास का माहौल शोक मंे डूबा हुआ था। जब महाराजा की शवयात्रा चितास्थल पर पहुंची तो लोगो के नेत्रों से आंसुओं की धाराएँ बह निकली। उनके धार्मिक क्रियाकर्म के बाद महाराजा का पार्थिव शरीर चिता पर रखकर अग्नि को समर्पित किया गया। जैसे ही शासक की चिता से अग्नि की लपटें धधकने लगी, तभी अचानक आसपास के पेड़ों पर बेठै दर्जनों मोर भी चिता में कूद कर अपने स्वामी के साथ स्वाहा हो गये। इस दृश्य को देखकर शोकाकुल लोगों की आँखे आश्चर्य से फटी रह गयी।

तत्पश्चात् महाराजा अनूपसिंह के चिता-स्थल पर ही उनकी स्मृति में 1698 ईस्वी में एक विशाल कलात्मक छतरी को बनवाया गया जो एक यादगार बन गयी। इस छतरी को लाल पत्थरों से नक्काशीदार बनवाया गया जिसमें चार मुगल शैली के और चार राजपूत शैली के गुम्बद है। छतरी के खंबो पर सुन्दर नक्काशी की गई है जो मुख्य गुम्बद पर कृष्ण को बांसुरी बजाते हुए नृत्य मुद्रा में उकेरा गया है छतरी की गोलछत बेलबूटों से अलंकृत है व विभिन्न वाद्ययंत्रा बजाते हुए गोपियां भी दर्शाई गयी है।

बीकानेर से पूर्व में 7 किलोमीटर दूर बीकानेर जयपुर मार्ग के दांयी ओर पुरोहितान गांव के नजदीक देवकुंड सागर की ऐतिहासिक छतरियां है। छतरियों के चारों और मंदिर व भव्य राजप्रसाद हैं जो तीन भागों में विभाजित हैं जिनमें दो भागों में राजा और राजपरिवारों की छतरियां है। इसके अलावा पातुरियों व सेविकाओं की भी छतरिया हैं। बीकानेर की कलात्मक छतरियों में पुरूषों की छतरियां बड़ी व भव्य है। जिनमें स्मृति स्वरूप संगमरमर के शिलालेख लगे हुए है। यहाँ पर मुख्य परिसर में बनी छतरियों में महाराजा गजसिंह की वि.स. 1844 में बनी विशाल छतरी है जो कलात्मक 16 खंबों पर टिकी हुई है। सबसे ज्यादा गुम्बदों से युक्त छतरी महाराजा सुजानसिंह की हैं।

आधुनिक बीकानेर के निर्माता महाराजा गंगासिंह की सफेद संगमरमर से निर्मित छतरी है जसके गुम्बद में चार झरोखें हैं जिसमें कृष्ण व मीरा के चित्रा हैं। ऐसा माना जाता है कि महाराजा ने अपने जीवनकाल में ही अपनी छतरी का नक्शा बनवाया था जो 24 खंबों से युक्त थी लेकिन महाराजा की मृत्यु के पश्चात् जब छतरी निर्माण का वक्त आया तो दो प्रतियों में से एक उनके निवास लालगढ़ पैलेस में व दूसरी पुरोहित परिवार के पास थी परन्तु उपलब्ध न हो सकी जिससे यह छतरी 12 खंबों से ही बनायी गयी।

महाराजा गंगासिंह जी की पत्नी वल्लभकुंवर जो उनसे पूर्व स्वर्गवासी हो गई थी, की याद में बनी छतरी में लगे कलश से रहस्यमय ढंग से दूध टपकने लगा था। जब यह बात महाराजा तक पहुंची तो उन्होने कलश तुड़वाया परन्तु उसमें कुछ भी नही था। पुनः कलश बनाने के बाद फिर से दूध टपकने लगा, ऐसा सात बार कलश खुदवाने के बाद भी जब कारण पता न लगा तो महाराज गंगासिंह को स्वप्न में रानी ने कहा कि मेरे मृत पुत्रों का नाडा मेरी छतरी के पास बनवा देने से छतरी से दूध टपकना बन्द हो जायेगा। तत्पश्चात् दोनों मृत पुत्रों का नाड़ा बनवाने के बाद दूध टपकने की यह घटना फिर न घटी।

कल्याण सागर की छतरियों में महाराजा सार्दूल सिंह की छतरी गुलाबी, पीले व कालेरंग के संगमरमर से बनी खूबसूरत छतरी है तो उनकी पत्नी सुदर्शना कुमारी व विख्यात निसानेबाज पुत्रा करणीसिंह की भी आधुनिक छतरियां हैं। यहां की छतरियों में महाराजा राजसिंह जिनका 25 अप्रेल 1787 में निधन हुआ था तो उनके सेवक मण्डावत संग्रामसिंह भी उनकी चिता के साथ जिन्दा जल गये थे। इसका उल्लेख छतरी में लगे शिलालेख से मिलता है। कल्याण सागर का निर्माण राव जैतसिंह ने करवाया था। सागर के पास ही एक सुरंग बनी हुई है जिसके ओर-छोर का आजतक पता नहीं लग सका है। फिलहाल इसके मुहाने को बंद कर दिया गया है।

कुलमिलाकर बीकानेर स्थित सागर की छतरियां महज राजाओं के स्मारक ही नही बल्कि इन ऐतिहासिक धरोंहरो में इतिहास भी पलता है। इन छतरियों के रखरखाव की जिम्मेदारी सदियों से सागर के पुष्करणा पुरोहितों के हाथ में है।

(अदिति)

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