गौतम चौधरी
इस्लामिक मान्यता के आधार पर पवित्र कुरान अल्लाह द्वारा अवतरित मार्गदर्शन की अंतिम पुस्तक है। यह ग्रंथ न केवल आध्यात्मिक दिशा प्रदान करता है, बल्कि जीवन का एक संपूर्ण विधान (जाब्ता-ए-हयात) भी है। कुरान का मूल संदेश जीवन के हर पहलू, चाहे वह व्यक्तिगत हो, सामाजिक, नैतिक या कानूनी हो, में संतुलन और मध्यमार्ग अपनाने पर जोर देता है। कुरान, बार-बार यह शिक्षा देता है कि अतिवाद और कट्टरता से बचकर ही एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना संभव है। यह ग्रंथ मनुष्य को सिखाता है कि वह अपने कार्यों और विचारों में स्थिरता लाए।
दरअसल, यह मैं नहीं कह रहा हूं। इस बात की चर्चा इस्लामिक विद्वान और स्तंभ लेखक मुजफ्फर हुसैन साहब ने कही है। विगत दिनों मुजफ्फर हुसैन साहब की एक किताब पढ़ने का मौका मिला। मुजफ्फर हुसैन द्वारा लिखी किताब, ‘पवित्र कुरान और गौमांश’ में उन्होंने साफ तौर पर यह बताने की कोशिश की है कि पवित्र कुरान भी उसी तरह मांसाहार का निषेध करता है, जैसे हिन्दुओं के ग्रंथों में बताया गया है। किताब में कई चौकाने वाली बातें कही गयी है। बाकायदा पवित्र कुरान की आयतों का हवाला देते हुए कहा गया है कि गोहत्या पर महज एक जगह इब्राहिम-अले-इस्लाम की एक आयत है। जिसमें वे कहते हैं, ‘विशेष परिस्थिति में काली गाय की कुर्बानी दी जा सकती है।’ इस विषय पर जब मुफ्ती तुफैल खान साहब से चर्चा की तो उन्होंने पूरे कुरान को ही मध्यममार्गी बता दिया और कहा, ‘कुरान केवल मुसलमानों के लिए नहीं, यह पूरी मानवता के लिए एक पवित्र ग्रंथ है।’
मुफ्ती तुफैल बताते हैं, ‘‘कुरान की सूरह अन-नहल (आयत 90) में अल्लाह न्याय (अदल), श्रेष्ठता (एहसान) और रिश्तेदारों की मदद का स्पष्ट आदेश देता है। विद्वानों के अनुसार, यहाँ ‘न्याय’ का अर्थ केवल कानूनी बराबरी नहीं है, बल्कि विश्वास, कार्यों, चरित्र और भावनाओं में पूर्ण संतुलन बनाए रखना है। इसका तात्पर्य यह है कि व्यक्ति को न तो किसी चीज में अति (Excess) करनी चाहिए और न ही कमी (Deficiency)। यहाँ तक कि शत्रुओं के साथ व्यवहार में भी न्याय का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। इंसान का आंतरिक और बाहरी जीवन एक समान होना चाहिए। वहीं ‘एहसान’ न्याय से एक कदम आगे की स्थिति है, जहाँ व्यक्ति न केवल अपने अनिवार्य कर्तव्य निभाता है, बल्कि दूसरों के प्रति क्षमाशील, कोमल और उदार भी होता है।’’
इस्लाम के अन्य जानकारों का मानना है कि कुरान हमें तीन बड़ी बुराइयों से बचने की चेतावनी देता है, निर्लज्जता, बुराई और अत्याचार। ये तीनों मानवीय कमजोरियों, अनियंत्रित इच्छाओं, गुमराह सोच और बेलगाम क्रोध से जुड़ी हैं। एक व्यक्ति वास्तव में तभी परिष्कृत हो सकता है जब वह इन ताकतों को वश में करे और तर्क व नैतिक जागरूकता को अपना मार्गदर्शक बनाए। मध्यमार्ग का महत्व इस बात से भी स्पष्ट होता है कि अल्लाह ने मुस्लिम समुदाय को ‘उम्मते वस्त’ यानी ‘मध्य राष्ट्र’ या संतुलित राष्ट्र कहा है। इसका अर्थ यह है कि इस समुदाय को जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करना है।
मौलाना बहिरुद्दीन खान कई मौकों पर यह दुहरा चुके हैं कि आस्था के मामले में, इस्लाम सिखाता है कि पैगंबरों के प्रति न तो अनादर हो और न ही उन्हें ईश्वर का दर्जा दिया जाए। इबादत के मामले में, इस्लाम न तो धर्म की पूरी उपेक्षा की अनुमति देता है और न ही दुनिया को छोड़कर वैराग्य अपनाने का समर्थन करता है। सच्चा धार्मिक मार्ग वह है जिसमें मनुष्य अपने आध्यात्मिक कर्तव्यों को निभाते हुए समाज में एक जिम्मेदार जीवन व्यतीत करे। सामाजिक स्तर पर, इस्लाम मानवाधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाता है। यह मानवीय गरिमा की रक्षा करता है और कठिन परिस्थितियों में भी निष्पक्षता की मांग करता है।
भारत में जन्में और बटवाड़े के बाद पाकिस्तान में जाकर बस गए डॉ. इसरार अहमद ने अपनी कई तकरीरों में कुरान को मानवीय मूल्यों का ग्रंथ बताया है। चुनांचे, आर्थिक जीवन में भी इस्लाम का दृष्टिकोण अत्यंत संतुलित है। यह न तो पूंजीवाद की तरह धन के असीमित संचय की छूट देता है और न ही साम्यवाद की तरह व्यक्तिगत स्वामित्व को पूरी तरह नकारता है। यह जकात और दान के माध्यम से यह सुनिश्चित करता है कि धन का प्रवाह समाज के वंचित वर्गों तक बना रहे और वह केवल कुछ हाथों में केंद्रित न हो जाए।
अंत में इस्लामिक विचारकों और जानकारों की राय के अनुसार हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि पवित्र कुरान मध्यमार्ग को जीवन के केंद्रीय सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत करता है। यह संतुलित दृष्टिकोण न केवल व्यक्तिगत शांति सुनिश्चित करता है, बल्कि सामूहिक जीवन में भी सद्भाव, न्याय और लोक-कल्याण की नींव रखता है। यही वह मार्ग है जो मानवता को स्थिरता और गरिमा प्रदान करता है।
