गौतम चौधरी
दुनिया के बदलते लोकतांत्रिक परिदृश्य में एक और चिंताजनक संकेत सामने आया है। Reporters Without Borders (RSF) की 2026 की रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर प्रेस की स्वतंत्रता अपने सबसे कमजोर दौर में पहुँच रही है। यह केवल एक वार्षिक सूचकांक नहीं, बल्कि उस मौन संकट का दस्तावेज़ है, जिसमें सूचना, विचार और असहमति के स्वर धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं। इस रिपोर्ट में भारत के लिए भी एक नकारात्मक संदेश है। मसलन, भारत की रैंकिंग में भी गिरावट बतायी गयी है।
भारत की 157वीं रैंकिंग इसी व्यापक संकट का एक हिस्सा है। इसे केवल एक आंकड़े के रूप में पढ़ना न तो पर्याप्त है और न ही उचित। प्रश्न यह है कि क्या यह रैंकिंग भारत की वास्तविक स्थिति को प्रतिबिंबित करती है, या यह एक पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टिकोण का परिणाम है?
पहले वैश्विक संदर्भ को समझना आवश्यक है। RSF की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि आज दुनिया के आधे से अधिक देश “कठिन” या “गंभीर” श्रेणी में आ चुके हैं। “अच्छी” प्रेस स्वतंत्रता वाले देशों की संख्या नगण्य रह गई है। यह परिदृश्य बताता है कि लोकतंत्र की आत्मा—स्वतंत्र और निर्भीक मीडिया—अब अनेक प्रकार के दबावों से जूझ रही है, चाहे वे राजनीतिक हों, आर्थिक हों या तकनीकी।
भारत का संदर्भ इस वैश्विक प्रवृत्ति के भीतर एक विशिष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। एक ओर यहाँ मीडिया का अभूतपूर्व विस्तार है—डिजिटल प्लेटफॉर्म, क्षेत्रीय भाषाओं का प्रसार और सामाजिक मीडिया के माध्यम से अभिव्यक्ति के नए अवसर। दूसरी ओर, यही परिदृश्य कई प्रकार की चुनौतियों से भी घिरा हुआ है। कानूनों का उपयोग, न्यायिक प्रक्रियाओं का दबाव, मीडिया स्वामित्व का केंद्रीकरण और बढ़ता राजनीतिक ध्रुवीकरण—ये सभी तत्व मिलकर उस स्वतंत्रता को प्रभावित करते हैं, जो लोकतंत्र की आधारशिला मानी जाती है।
फिर भी, यह मान लेना कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है, एक अतिशयोक्ति होगी। देश में आज भी आलोचनात्मक पत्रकारिता मौजूद है, सत्ता से प्रश्न पूछने की परंपरा जीवित है और विविध मतों का सार्वजनिक विमर्श जारी है। यही विरोधाभास भारत की वास्तविकता को जटिल बनाता है—जहाँ स्वतंत्रता और नियंत्रण, दोनों साथ-साथ चलते हैं।
इस संदर्भ में RSF की रिपोर्ट की पद्धति पर भी विचार आवश्यक है। यह सूचकांक केवल ठोस आंकड़ों पर नहीं, बल्कि विशेषज्ञों और पत्रकारों की धारणाओं पर भी आधारित है। ऐसे में इसमें एक सीमा तक व्यक्तिपरकता का होना स्वाभाविक है। विभिन्न देशों की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को एक समान पैमाने पर मापना अपने आप में चुनौतीपूर्ण कार्य है। यही कारण है कि इस रिपोर्ट को लेकर सरकारों और विश्लेषकों के बीच मतभेद भी उभरते रहे हैं।
परंतु इन आलोचनाओं के बावजूद इस रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज करना भी उचित नहीं होगा। दो दशकों से अधिक समय से जारी यह अध्ययन वैश्विक प्रवृत्तियों को समझने का एक महत्वपूर्ण साधन रहा है। इसे एक चेतावनी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, न कि अंतिम निर्णय के रूप में।
वास्तव में, प्रेस की स्वतंत्रता केवल रैंकिंग का विषय नहीं है; यह लोकतांत्रिक चेतना का प्रश्न है। यदि मीडिया पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ते हैं, तो उसका प्रभाव केवल पत्रकारिता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह समाज की सोच, संवाद और निर्णय क्षमता को भी प्रभावित करता है।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम इस बहस को “रैंक सही या गलत” के सीमित दायरे से बाहर निकालें। मूल प्रश्न यह होना चाहिए कि क्या हमारा मीडिया वातावरण स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक है? क्या वह सत्ता और बाजार दोनों से समान दूरी बनाकर जनता के हित में कार्य कर पा रहा है?
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के लिए यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण है। यहाँ प्रेस की स्वतंत्रता केवल एक संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि विविधता और बहुलता की रक्षा का माध्यम है। RSF की यह रिपोर्ट एक आईना है—जिसमें हमें केवल अपनी छवि नहीं, बल्कि अपनी कमजोरियों को भी देखने की आवश्यकता है। सवाल रैंकिंग का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है, जिस पर लोकतंत्र की पूरी इमारत खड़ी है।
