गौतम चौधरी
इतिहास में कुछ तिथियाँ ऐसी होती हैं, जो केवल स्मरण के लिए नहीं, बल्कि आत्मपरीक्षण के लिए लौटती हैं। 1 मई, मई दिवस, ऐसी ही एक तिथि है। इसकी जड़ें Haymarket Affair में हैं, जब Chicago के मजदूरों ने 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग को लेकर संघर्ष किया और अंततः चार नेताओं, —Albert Parsons, August Spies, Adolph Fischer और George Engel—फांसी के फंदे पर चढ़ा दिया गया। यह शहादत केवल एक घटना नहीं, बल्कि श्रमिक अधिकारों के इतिहास का नैतिक आधार बन गई।
आज, जब हम फिर से एक बार मई दिवस मना रहे हैं, तो प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि हमने क्या हासिल किया, बल्कि यह कि हमने क्या खोया और क्या खोने की कगार पर हैं। इस परिप्रेक्ष्य में एक बात और बता देना जरूरी है कि आज दुनिया का कोई भी नेता दावे के साथ यह नहीं कह सकता है कि मैं पूंजीवादी हूं। यह समाजवाद और सर्वहाराओं की नैतिक जीत है लेकिन इस जीत को हार में बदलने की साजिश पूरी दुनिया में चल रही है और भारत भी इससे अछूता नहीं है।
वैश्विक स्तर पर श्रम की दुनिया एक गहरे संक्रमण से गुजर रही है। International Labour Organization के अनुसार, दुनिया का लगभग 60 % कार्यबल आज भी अनौपचारिक क्षेत्र में है, जहाँ न तो सामाजिक सुरक्षा है और न ही स्थिर आय। हर वर्ष लगभग 30 लाख लोग काम से जुड़ी दुर्घटनाओं और बीमारियों के कारण अपनी जान गंवाते हैं। तकनीक और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने रोजगार के नए अवसर तो पैदा किए हैं, लेकिन “गिग इकॉनमी” के नाम पर श्रम को एक बार फिर असुरक्षा के घेरे में धकेल दिया है, जहाँ काम है, पर अधिकार नहीं।
भारत की तस्वीर भी इससे अलग नहीं है। National Statistical Office के आंकड़े बताते हैं कि 90 प्रतिशत से अधिक श्रमिक असंगठित क्षेत्र में हैं। NITI Aayog का अनुमान है कि देश में गिग वर्कर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है और 2030 तक यह 2.3 करोड़ तक पहुँच सकती है। परंतु इन श्रमिकों के पास न सामाजिक सुरक्षा है, न ही स्पष्ट कानूनी पहचान। यह विडंबना ही है कि जिस अर्थव्यवस्था को “नया भारत” कहा जा रहा है, उसकी नींव पुराने ढर्रे की असुरक्षा पर टिकी हुई है।
इसी बीच, श्रम सुधारों के नाम पर बनाए गए नए लेबर कोड्स को लेकर भी बहस जारी है। सरकार इन्हें सरलता और निवेश बढ़ाने का माध्यम मानती है, जबकि आलोचक आशंका जताते हैं कि इससे श्रमिकों के अधिकार कमजोर पड़ सकते हैं। यह द्वंद्व दरअसल विकास और न्याय के बीच संतुलन का प्रश्न है, क्या हम आर्थिक प्रगति की कीमत श्रमिक सुरक्षा से चुकाने को तैयार हैं?
जमीनी हकीकत और भी चिंताजनक है। शहरों में डिलीवरी कर्मी 12-14 घंटे काम करते हैं, पर वे “कर्मचारी” नहीं माने जाते। ग्रामीण क्षेत्रों में निर्माण मजदूरों के लिए बनी कल्याणकारी योजनाएँ कागजों में सीमित रह जाती हैं। और कॉर्पाेरेट दुनिया में “वर्क फ्रॉम होम” ने काम और जीवन की सीमाओं को धुंधला कर दिया है, जहाँ काम के घंटे अनौपचारिक रूप से बढ़ते जा रहे हैं।
ऐसे समय में मई दिवस हमें यह याद दिलाता है कि अधिकार कभी स्थायी नहीं होते। वे संघर्ष से अर्जित होते हैं और उपेक्षा से क्षीण भी हो सकते हैं। Second International द्वारा 1889 में घोषित यह दिवस केवल अतीत का स्मारक नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए चेतावनी है।
इसलिए आज आवश्यकता केवल उत्सव मनाने की नहीं, बल्कि उस मूल प्रश्न पर लौटने की है, क्या श्रम को वह सम्मान और सुरक्षा मिल रही है, जिसकी कल्पना उन शहीदों ने की थी?
यदि इसका उत्तर नकारात्मक है, तो यह मान लेना चाहिए कि Haymarket Affair की गूंज अभी थमी नहीं है। वह हमारे समय में, हमारे बीच, नए रूपों में प्रतिध्वनित हो रही है और हमसे एक बार फिर जवाब मांग रही है।
