नितीश कुमार : लोहियावादी समाजवाद के अंतिम राजनीतिक योद्धा का पराभव

नितीश कुमार : लोहियावादी समाजवाद के अंतिम राजनीतिक योद्धा का पराभव

किसी समय यह कहावत प्रचलित थी कि बिहार की राजनीति में लालू जी अपरिहार्य हैं। इसके बाद लालू प्रसाद यादव की छवि बेहद खराब हो गयी या ऐसा कहें खराब कर दी गयी और उनके स्थान पर नितीश कुमार का उदय हुआ। नितीश कुमार केवल बिहार की राजनीति ही नहीं केन्द्र की राजनीति में भी सफल रहे। उन्होंने राजनीति की नयी परिभाषा गढ़ी और बिहार में ही नहीं पूरे देश में यह कहा जाने लगा कि नितीश कुमार बिहार की राजनीति में अपरिहार्य हैं।

बिहार की राजनीति हमेशा से सामाजिक समीकरणों, गठबंधनों और नेतृत्व के उतार-चढ़ाव से प्रभावित रही है। पिछले लगभग दो दशकों में अगर किसी एक नेता ने राज्य की राजनीति को सबसे अधिक प्रभावित किया है, तो वह हैं नितीश कुमार। उनकी राजनीतिक यात्रा केवल एक नेता की कहानी नहीं है, बल्कि यह बिहार की बदलती राजनीतिक संस्कृति और सत्ता संतुलन की भी कहानी है।

पहले बिहार की सामाजिक समीकरण पर थोड़ी चर्चा करते हैं। बिहार की राजनीति लंबे समय तक जातीय समीकरणों और सामाजिक न्याय के मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में सामाजिक न्याय की राजनीति ने राज्य की सत्ता को नई दिशा दी। उस दौर में पिछड़े और वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी, लेकिन साथ ही प्रशासनिक चुनौतियाँ और विकास के सवाल भी लगातार उठते रहे। इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में नितीश कुमार एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में उभरे। उन्होंने स्वयं को विकास, सुशासन और संतुलित सामाजिक राजनीति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।

नितीश कुमार ने 2005 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता संभाली और उसके बाद से वे राज्य की राजनीति के केंद्रीय नेता बने रहे। वे कई बार मुख्यमंत्री बने और 2025 में उन्होंने रिकॉर्ड दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके शासनकाल को अक्सर “सुशासन” की राजनीति के रूप में प्रस्तुत किया गया। वैसे कई मायने में नितीश कुमार ने बिहार के लिए बहुत कुछ किया और बहुत कुछ करने की कोशिश की। उनके कार्यकाल में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में सुधार की चर्चा की गई। खासकर लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए साइकिल योजना और छात्रवृत्ति योजनाएँ काफी चर्चित रहीं।

वैसे नितीश कुमार का कार्यकाल भी चुनौतियों और आलोचनाओं से भरा रहा। आलोचकों का यह भी कहना रहा है कि बिहार का समग्र औद्योगिक विकास अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाया है और रोजगार का संकट बना हुआ है। आलोचकों की मानें तो नितीश कुमार के प्रथम चरण का कार्यकाल तो बेहद बढ़िया रहा लेकिन बाद के दिनों में कानून व्यवस्था बिगड़ने लगी और आज वह लालू राज की याद दिला रही है। हाल के जहानाबाद की बेटी के साथ पटना में बलात्कार और उसके बाद कथित रूप से उसकी हत्या का मामला नितीश कुमार के कार्यकाल का सबसे बदनुमा दाग साबित हुआ है। नितीश कुमार पर कई भ्रष्टाचार के भी आरोप हैं लेकिन नितीश के पार्टी और उनके समर्थक यही कहते रहे हैं कि नितीश कुमार में कोई दोष नहीं है। गठबंधन की राजनीति के कारण नितीश कुमार को समझौता करना पड़ा है। यह कई मायने में ठीक भी दिखता है। वैसे नितीश कुमार लंबे समय तक भाजपा और थोड़े समय के लिए राष्ट्रीय जनता दल के साथ सरकार में रहे। राष्ट्रीय जनता दल के बारे में तो सबको पता है। इधर भारतीय जनता पार्टी के बारे में इस बात की चर्चा कम होती है कि आज जो भाजपा का बिहारी नेतृत्व है, वही नेतृत्व, लालू प्रसाद यादव के दौर में राष्ट्रीय जनता दल का हुआ करता था। मसलन, जिन नेताओं के कारण लालू प्रसाद यादव के शासन पर जंगल राज का आरोप लगा वही नेता आज बिहार भाजपा में प्रभावशाली भूमिका में हैं।

नितीश कुमार की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू गठबंधन बदलने की प्रवृत्ति भी रहा है। उन्होंने समय-समय पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन कियाकृकभी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ, तो कभी विपक्षी गठबंधनों के साथ। इसी कारण उनके विरोधियों ने उन्हें “पलटू राम” जैसे राजनीतिक विशेषणों से भी संबोधित किया। लेकिन समर्थकों का तर्क है कि नितीश कुमार ने बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार रणनीति अपनाई और अपने राजनीतिक अस्तित्व को बनाए रखा।

हाल के समय में बिहार की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। समाचार माध्यमों में आयी खबरों के अनुसार नितीश कुमार राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ने के संकेत देते हुए राज्यसभा जाने की तैयारी कर रहे हैं, जिससे बिहार की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर ऐसा होता है तो यह बिहार की राजनीति में एक युग के अंत जैसा होगा, क्योंकि लंबे समय से राज्य की राजनीति नितीश कुमार और लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है।

आज बिहार के सामने कई महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैंकृरोजगार, औद्योगिक विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रवासन जैसी समस्याएँ अभी भी प्रमुख मुद्दे हैं। नई पीढ़ी की राजनीति इन सवालों के समाधान की अपेक्षा करती है। इस संदर्भ में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य का नेतृत्व विकास और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन कैसे स्थापित करता है।

नितीश कुमार का राजनीतिक जीवन बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में देखा जाएगा। उन्होंने राज्य की राजनीति को कई बार नई दिशा दी और गठबंधन राजनीति की जटिलताओं के बीच अपनी जगह बनाए रखी। आज जब बिहार की राजनीति एक नए दौर की ओर बढ़ रही है, तब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले वर्षों में राज्य का नेतृत्व किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या बिहार विकास तथा सामाजिक परिवर्तन की नई कहानी लिख पाता है।

One thought on “नितीश कुमार : लोहियावादी समाजवाद के अंतिम राजनीतिक योद्धा का पराभव

  1. बहुत सही ✅ नीतीश कुमार जी के बाद बिहार की क्या तस्वीर होगी यह देखना होगा

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