गौतम चौधरी
अंततोगत्वा हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली महागठबंधन की सरकार ने झारखंड में पेसा कानून लागू कर दिया। लागू कानून में कई विसंगतियां हो सकती है लेकिन इस कानून को अमली जामा पहनाने के लिए निःसंदेह हेमंत और उनकी सरकार धन्यवाद के पात्र हैं। हेमंत सोरेन की सरकार ने जिस पेसा को मान्यता दी है, उस पर कई सवाल खड़े किए जा रहा हैं। वर्तमान पेसा अधिसूचना की यदि खामियों पर प्रकाश डालें तो उसमें चार बड़ी विसंगतियां देखने को मिलती है।
पहली विसंगति तो यह बताया जा रहा है कि पेसा नियमावली आदिवासी हितों की रक्षा के लिए बना था। इसमें शिड्यूल्ड एरिया चिंहित करने की बात कही गयी थी। इसका चिंहिंकरण पारंपरिक आधार पर करना था और जहां पारंपरिक आधार काम नहीं कर रहा है वहां ग्राम सभा की समिति को करना था लेकिन सरकार ने नियमावली बनाते समय उसकी मूल भावना को ही खत्म कर दिया.है। अब शिड्यूल्ड एरिया उपायुक्त के द्वारा बनायी गयी समिति तय करेगी। हालांकि पेसा कानून की अधिसूचना में इस बात का साफ-साफ जिक्र नहीं किया गया है लेकिन यह जरूर बताया गया है कि आदिवासियों के गांवों का सीमांकन उपायुक्त के द्वारा बनायी गयी समिति करेगी। इसके कारण आने वाले समय में आदिवासियों के साथ बड़ी समस्या होने वाली है।
दूसरी जो सबसे बड़ी खामी बतायी जा रही है, पेसा नियमावली के पहले पन्ने से ही रूढ़ि-प्रथा को हटा दिया गया है। अब जब रूढ़ि-प्रथा ही नहीं है तो आदिवासियों का मूल पहचान ही खत्म हो जा रहा है। पेसा तो रूढि और प्रथाओं को अंगीकार करने वालों के लिए लाया गया था। जो अपनी प्रथाओं को छोड़ चुके हैं और आस्था बदल लिए हैं उनके लिए तो अलग से कानून है ही लेकिन पेसा तो आदिवासियों की परंपरा और रूढ़ियों की रक्षा के लिए ही लया गया था।
तीसरा आरोप यह है कि सरकार ने ग्राम सभा को सशक्त बनाने के बजाय उसे कमजोर करने का काम किया है। मसलन, पहले सीएनटी से जुड़े मामलों में ग्राम सभा की निर्णायक भूमिका होती थी, लेकिन अब यह अधिकार उपायुक्त (डीसी) को सौंप दिया गया है। इससे तो झारखंड के आदिवासियों को पहले से प्राप्त संरक्षक तीन कानून, जैसे – सीएनटी, एसपीटी और विल्किंसन रूल भी कमजोर हो जा रहा है।
इस तीन के अलावे चौथी विसंगति यह बतायी जा रही है, वर्तमान पेसा अधिसूचना में ग्राम सभा के द्वारा यदि किसी बात पर निर्णय में विलंब हो रही है तो एक निश्चित समय सीमा के बाद उस निर्णय को स्वतः पास माना जाएगा। यह ग्राम सभा को कमजोर करने वाला कानून है। इस नियम ने प्रशासन और स्थानीय नौकरशाहों को ग्राम सभा से ज्यादा ताकत प्रदान कर दिया है, जबकि मूल पेसा कानून में ग्राम सभा का निर्णय ही सर्वोपरी माना गया है।
इस प्रकार कई मामलों में पेसा को उचित और मजबूत बताया जा रहा है लेकिन पेसा से झारखंड के आदिवासियों को बहुत फायदा तो होता नहीं दिख रहा है, उलट उसके पास जो पहले से तीन कानून प्राप्त थे उसे भी कमजोर होने का खतरा बढ़ गया है।
अब थोड़ा पेसा कानून की मूल प्रवृति को भी समझ लेना चाहिए। दरअसल, झारखंड में पहले से यह नारा लगता रहा है कि “लोकसभा न विधानसभा, सबसे ऊपर ग्राम सभा” मतलब, ग्राम सभा ही शासन का प्रमुख केन्द्र होना चाहिए। वैसे भारत में सभ्यता के साथ ही ग्राम सभा की संरचना प्रारंभ हो गयी थी। यही नहीं लगभग सभी शासकों ने इस स्थानीय शान प्रणाली को मान्यता प्रदान की। प्रथम चरण में फिरंगियों ने तो इसे नजरअंदाज किया लेकिन बाद में उन्हें भी स्थानीय निकाय को मान्यता प्रदान करनी पड़ी।
ग्राम सभा और ग्राम पंचायत को भारतीय संसद के दोनों सदनों ने 73वां संशोधन कर मान्यता प्रदान किया। अब यह शासन की स्थानीय निकाय के रूप में संविधान संमत इकाई है। शासन की स्थानीय प्रणाली में अनुसूची पांच के क्षेत्रों के लिए कोई विधान नहीं किया गया था। इसी विषय को आधार बनाकर दिलिप सिंह भूरिया के नेतृत्व में एक समिति बनाई गयी। उस समिति ने वर्ष 1995 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और उसी के आधार पर वर्ष 1996 में एक बार फिर से भारतीय संसद के दोनों सदनों में पंचायती राज अधिनियम का विस्तारित प्रस्ताव पारित किया, जिसका विस्तार शिड्यूल 5 तक किया गया और उसमें आदिवासियों की परंपरा एवं रूढ़ियों को जोड़ा गया।
मतलब साफ है कि पेसा आदिवासियों को स्वशासन, संसाधन अधिकार और सांस्कृतिक सुरक्षा प्रदान करने वाला एक कानून है। यदि परिभाषा के तौर पर पेसा को प्रस्तुत किया जाए तो पेसा, 73वें संविधान संशोधन का अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार है। यह पांचवीं अनुसूची के आदिवासी क्षेत्रों हेतु विशेष कानून है।
जल, जंगल, जमीन से बेदखल हो रहे आदिवासियों के लिए यह एक बड़ा संवल है। यह सूनिश्चित की गयी थी कि इससे विस्थापन और सांस्कृतिक क्षरण का शिकार हो रहे आदिवासियों का संरक्षण होगा। सच पूछिए तो ग्राम सभा ही पेसा की आत्मा है। पेसा कानून में सर्वोच्च निर्णयी संस्था ग्राम सभा को ही बनाया गया है। योजना, भूमि अधिग्रहण और संसाधनों पर अंतिम अधिकार आदिवासियों के पारंपरिक ग्राम सभा के पास ही रखा गया है।
ग्राम सभा के प्रमुख अधिकारों की बात की जाए तो, लघु वन उपज, जल स्रोत, हाट-बाज़ार, भूमि अधिग्रहण व पुनर्वास पर सहमति, परंपरागत विवाद निवारण, सामुदायिक संसाधनों का संरक्षण आदि इसके अधिकार क्षेत्र में आता है।
देश में दस ऐसे राज्य हैं, जो अनुसूची पांच में आते हैं, उसमें झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश है। अपने-अपने तरीके से 9 राज्यों ने पेसा कानून पहले ही अपने यहां लागू कर दिया था लेकिन झारखंड बचा हुआ था। अब झारखंड में भी पेसा को अधिसूचित कर दिया गया है।
यदि झारखंड की बात करें तो यहां कुल 24 जिले हैं, जिनमें से 13 जिले पूर्ण रूप से और दो जिले आंशिक रूप से अनुसूचित क्षेत्र में आते हैं। प्रदेश में कुल 112 प्रखंड पांचवीं अनुसूची में शामिल किए गए हैं। अब झारखंड में पेसा कानून लागू है और यह प्रदेश के 112 प्रखंडों में प्रभावी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।
पेसा कानून के लागू होने से झारखंड में कई प्रकार के बदलाव संभव हैं। हालांकि जिस प्रकार का मूल पेसा कानून है, उस प्रकार झारखंड में लागू नहीं किया गया है। सच तो यह है दस के दस प्रांतों ने पेसा को कमजोर करके लागू किया है लेकिन इससे आदिवासियों को फायदा होता दिख तो रहा है। झारखंड में भी पेसा को नख-दंत विहीन बताया जा रहा है, बावजूद इसके चित्र बदलने की पूरी संभावना भी बतायी जा रही है।
