सांप्रदायिकता की राजनीति विकास से भटकाने की साजिश

सांप्रदायिकता की राजनीति विकास से भटकाने की साजिश

गौतम चौधरी 

हाल के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में, विपक्षी दलों की अल्पसंख्यक वोट पर निर्भरता और इसे निर्णायक कारक मानने के कारण योगी सरकार एक बार फिर से वापस आ गयी। दूसरी ओर, जिस दल को बहुमत मिला है, उसने अपने चुनाव प्रचार में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की विभाजनकारी राजनीति को बहुत महत्व नहीं दिया। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने आर्थिक विकास, शिक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं स्थानीय सुरक्षा, सामाजिक समरसता आदि विषय को मुद्दा बनया और चुनाव में बढ़त हासिल कर ली। इसलिए उन नेताओं को सतर्क हो जाना चाहिए जो जाति, धर्म, संप्रदाय, भाषा, वर्ग आदि जैसे विभाजनकारी मुद्दों पर वोट मांगते रहे हैं। ये मुद्दे अब चलने वाले नहीं हैं। वैसे तत्वों से बचने की कोशिश करनी चाहिए।

संपन्न चुनावों ने प्रदर्शित किया है कि मुस्लिम वोट चुनावों की हार या जीत का निर्धारण नहीं करता है। बल्कि, अब अन्य सामाजिक ताकतें भी बड़े पैमाने पर चुनाव परिणाम को प्रभावित करत है। उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा ने जमीनी स्तर पर सामाजिक संपर्क नेटवर्क का भरपूर उपयोग किया। लोगों को रोजमर्रा की वास्तविकताओं को बताया और अपनी योजनाओं का भरपूर प्रचार किया। इन सामाजिक जुड़ावों में कल्याणकारी योजनाएं शामिल हैं जिनका उद्देश्य सबसे कमजोर आबादी को आर्थिक ताकत प्रदान करना है।

मुस्लिम चुनावी राजनीति और इसके मतदान की प्रकृति पर शोध करने वालों का मत है कि उत्तर प्रदेश में इस बार लगभग आठ प्रतिशत मुस्लिम वोट भाजपा के पक्ष में गया। मुसलमानों में ये कौन लोग हैं, उस पर भी बाकायदा रिपोर्ट आयी है। भाजपा के पक्ष में जाने वाले वोटों की मूल व्याख्या यह है कि उत्तर प्रदेश में मुसलमानों ने पिछले पांच वर्षों के दौरान कई सामाजिक पहलों और कल्याणकारी योजनाओं से हिंदुओं के बराबर ही लाभ प्राप्त किया है। उत्तर प्रदेश के चुनावों में मुसलमानों के बीच सामाजिक विभाजन ने भी काम किया है। माना जाता है कि इस बार पसमांदा वोट भाजपा के पक्ष में स्थानांतरित हो गया। बता दें कि पसमांदा मुसलमान देश की मुस्लिम आबादी का लगभग 80 प्रतिशत हैं। पसमांदा यानी पिछड़े हुए मुसलमान, इस समुदाय के लोग ज्यादातर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे गरीब प्रांतों में रहते हैं। बढ़ई, प्लंबर, कपड़ा बुनकर, लोहार, धुनिया, डफाली और सफाईकर्मी कम वेतन वाले ऐसे व्यवसाय हैं, जिनमें ये लोग शामिल हैं। इधर सैय्यद, शेख, पठान या मिर्जा और मोगल जैसे उपनामों वाले समुदाय के कुलीन मुस्लिम नेतृत्व के पदों पर हावी हैं। पसमांदा धीरे-धीरे लेकिन लगातार अपने विकास और कल्याणकारी मुद्दों के साथ चुनावी राजनीति में पैर जमा रहे हैं। इसलिए, यह समुदाय भविष्य की मुस्लिम राजनीति के प्रणेता बनकर उभरेंगे। ये समुदाय उत्तरजीवी नहीं हो सकता क्योंकि यहां भी हिन्दुओं की तरह इन्हें प्रताड़ित किया जाता रहा है। यह समुदाय अपना विकास चाहता है और आगे बढ़े हुए मुसलमानों की बराबरी करना चाहता है। मुस्लिम राजनेताओं को भी इनकी ताकतों का अंदाजा लगा लेना चाहिए। उन्हें सामाजिक न्याय और अधिकारिता के अपने राजनीतिक दावों में तेजी लानी होगी और इसे राजनीतिक चर्चा में शामिल करना होगा।

भारतीय जनता पार्टी को मुसलमानों के बीच के विभाजन से लाभ मिलना स्वाभाविक है। भाजपा ने हिंदुत्व के मुद्दों के साथ ही सामाजिक अभियंत्रण पर भी पूरा ध्यान दिया है। जिस समाज की जितनी संख्या है उसके आधार पर भाजपा प्रतिनिधित्व देने की दिशा में पहल कर रही है। भाजपा की इस राजनीति को विपक्ष यदि नहीं समझ पाया तो फिर भाजपा को हराना कठिन बना रहेगा। सुरक्षा एक अहम मुद्दा है। उत्तर प्रदेश में शहरी मतदाताओं के बीच यह मुद्दा जबरदस्त चला। इसलिए बिना किसी भेदभाव के सुरक्षा की गारंटी अल्पसंख्यकवाद पर स्वाभाविक रूप से इस बार भारी पड़ा। यह मुद्दा आगे भी काम करने वाला है। इसलिए विपक्षी दलों को सतर्क हो जाना चाहिए।

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