प्राचीनतम सांस्कृतिक भूखंडों में से एक है तीरभुक्ति प्रदेश

प्राचीनतम सांस्कृतिक भूखंडों में से एक है तीरभुक्ति प्रदेश

गौतम चौधरी 

आर्यावर्त में तीरभुक्ति (तिरहुत) की अत्यन्त प्राचीन एवं महनीय परम्परा रही है। तथ्यों की मिमांसा से यह ज्ञात होता है कि वैदिक आर्य प्रायः सप्तसिन्धु प्रदेश तक ही सीमित थे, किन्तु उत्तर वैदिक काल के प्रारम्भ में आर्य की एक शाखा ने सदानीरा (नारायणी) नदी को पार कर तिरहुत क्षेत्र में प्रवेश किया था। लगभग 3000 ई.पू. लिखित शतपथ ब्राहृमण की बहुश्रुत कथा के अनुसार विदेह माथव के नेतृत्व में ऋषिप्रवर पुरोहित गौतम रहुगण के साथ र्सवप्रथम सदानीरा-गण्डकी को पार कर तत्कालीन निर्जन सघन वन प्रदेश में अग्नि स्थापन कर ‘‘यज्ञिय पद्धति’’ से इस क्षेत्र को जनावास योग्य बनाया तथा यह क्षेत्र यज्ञिय परम्परा से संयुक्त हुआ।

अग्नि आर्य संस्कृति का प्रतीक माना गया है। तभी से वनाच्छादित यह प्रदेश विदेध अथवा विदेह कहलाने लगा। वसाढ़ -वैशाली से प्राप्त गुप्तकालीन मुहर में तथा वृहतर विष्णपुराण में इसे तीरभुक्ति कहा गया जिसका अपभ्रंश तिरहुत है। नदियों पर स्थित होने के कारण ये पूरा क्षेत्र तीरभुक्ति कहलाया। र्पूव मध्यकाल में जिला अथवा परगना को भुक्ति कहते थे। इस प्रकार इस पूरे प्रदेश को तिरहुत के नाम से ही जाना जाता रहा है। विष्णुपुराण एवं भविष्य पुराण के अनुसार अयोध्या के सूर्यवंशी निमि नामक राजा को ऋषि वशिष्ठ के शाप के कारण मृत्यु को प्राप्त होना पड़ा था। दरअसल, राजा निमि ने एक हजार वर्षों तक चलने वाले यज्ञ कराने का निश्चय किया तथा पुरोहित के लिए वशिष्ठ को आमंत्रित किया, जो सूर्यवंशियों के कुल प्रोहित भी थे। उस समय वाशिष्ठ इन्द्र द्वारा पांच सौ वर्षों तक चलने वाले यज्ञ की बात कहकर स्वर्ग चले गए। यज्ञ समाप्ति के पश्चात पुरोहित बनने का बचन दिया था। धैर्य नहीं रखकर निमि ने गौतम को पुरोहित बनाकर यज्ञ प्रारम्भ किया। इन्द्र के यज्ञ पश्चात ऋषि वशिष्ठ निमि के यज्ञस्थल पर पहुँचे तो गौतम को पुरोहित देख अत्यन्त क्रोधित होते हुए निमि को तत्काल शाप दे दिया। निमि का देहिक जीव नष्ट हो गया। उस वक्त महाराजा निमि का कोई पुत्र नहीं था। यज्ञ अधूरा देख ऋषि प्रवरों ने आपस में विचार-विमर्श कर निमि के अवशेषों को मथकर उस शरीर से जो बालक उत्पन्न किया उसे मिथि कहा जाने लगा। मत्स्य पुराण के अनुसार ‘‘मिथिस्तु मथनाज्जात मिथिला येन निर्मिता।’’ दैहिक चेतना से रहित अर्थ की कल्पना कर विदेह शब्द राजा विशेष की वाचकता हो गयी। कालान्तर में विदेह पद राजवंश एवं राज्य दोनों के लिए वाचक हो गयी। व्युत्पत्ति की दृष्टि से मिथि या मिथिला हिमालयी भाषा समूह के शब्द प्रतीत होता है। मिथिला के अन्य व्यवहृत नाम-नेभिकानन, ज्ञानपीठ, स्वर्णांगल, शाम्भवी, विकल्मषा, रामानन्दकृति, विश्वभाभिनी, नित्यमंगला, तपोवन, वृहदारण्य आदि है। इन सारे क्षेत्रों को सिद्धपीठ भी कहा जाता है। इस क्षेत्र के सभी निवासी तिरहुतिया कहलाते है। राजा मिथि ने जिस नगर को बसाया  उसे मिथिला नाम से जाना गया। मिथिला नगरी सूर्यवंशी राजाओं द्वारा शासित तीरभुक्ति या विदेह की लंबे समय तक राजधानी रही। इसका अर्थ यही है कि तीरभुक्ति नामक प्रदेश की राजधानी मिथिला थी, जिसे राजा मिथि के द्वारा बसाया गया था।

विदेह माथव के उत्तराधिकारियों ने लम्बे समय तक मिथिला में राज्य किया। महाकाव्यों तथा पुराणों में कोई 55 राजाओं का वरर्णामिलता है, निमि, मिथि, जनक, उदावसु, नन्दिवर्धन, सेकुत, देवरात, वृहद्रय, महावीर, सुधृति, धृष्टकेतु, हर्यश्व, मरु, प्रतीन्धक, र्कीर्तिरथ, देवमीढ, विवुध, महीद्रक, र्कीर्तिशत, महारोमा, स्वर्णाेमा, ह्रस्वरोमा, सीरध्वज, कुशध्वज आदि। विदेह के जितने भी राजा हुए सभी तत्वज्ञानी के साथ ब्रहृमवेत्ता भी थे। मिथि और देवरात के बाद सीरध्वज जनक सबसे अधिक विख्यात हुए, जिनकी सूर्यशाला में शिक्षित थियी के पुत्र अखरानन को मिस्र में सूयोर्पासना की धार्मिक क्रान्ति लाने का श्रेय जाता है।

हल के सीत से प्राप्त धरती पुत्री सीता हुई, जिन्हें जानकी, वैदेही, किशोरी एवं मैथिली भी कहा जाता है। जानकी के अतिरिक्त सरस्वती इसी मिथिलांचल स्थित महोत्तरी-नेपाल के अभृण ऋषि की पुत्री थी। हैमवती, उमा ने महादेव के परिणय सूत्र में आवद्ध होकर जगदीश की पदवी दिलायी।

सति भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी।
उग्रेण तपसा लब्धो यथा पशुपति पतिः।।
अधिकांश दर्शन के बीज तिरहुत की धरती पर ही अंकुरित हुये। प्राचीन एवं नवीन न्याय के जनक गौतम एवं गंगेशोपाध्याय का आविर्भाव तिरहुत की धरती पर ही हुआ। यही नहीं नवीन न्याय के प्रणेता कहे जाने वाले उदैनाचार्य की जन्मभूमि भी करियन तिरहुत ही है। सांख्य दर्शन के प्रवर्तक कपिल मुनि यहीं पैदा हुए। तिरहुत का व्यवहार धर्म का दर्पण बन गया – ‘‘धर्मस्य निर्णाेज्ञेयो मिथिला व्यवहारतः।’’ जैन और बौद्ध धर्मों को तिरहुत में उर्वरा भूमि मिली, परन्तु अन्तिम जनक कराल के दुश्चरित्रता से प्रतापी सूर्यवंश का नाश हो गया और पूरा तिरहुत प्रदेश ‘‘वज्जिगणतंत्र’’ के अधीन हो गया। हालांकि, बज्जिगणतंत्र के आठ गणों में से एक विदेह तिरहुत के राजा हुआ करते थे, उनका प्रभाव बरकरार रहा। समय क्रम में वज्जिगणतंत्र का विखराब हुआ और तिरहुत सोलह सौ वर्षों तक परतंत्रता की बेड़ी में जकड़ा रहा। 11वीं शताब्दी में जब कर्णाट क्षत्रीय राजा नान्यदेव इस प्रदेश पर अपना राज्य स्थापित किए तो इसने मिथिला एवं स्वयं को मिथिलेश्वर कहना आरम्भ किया।

लगभग 1600 वर्ष बाद नान्यदेव के आगमन से तिरहुत यानी मिथिला को अपना राजा मिला। कर्णाट शासन काल में विशिष्ट वैवाहिक पद्धति अथवा पंजी व्यवस्था आरम्भ हुई। पांडुलिपियों तथा अभिलेखों को शक-संवत के अनुसार लिपिवद्ध किया जाने लगा। विद्वतजन अपने विद्वता के बलपर धन और मान अर्जन करने लगे। कर्णाट वंश के राजाओं ने वर्ष 1324 तक तिरहुत के संपूर्ण भूभाग पर शासन किया। कर्णाट शासकों की छः पीढ़ी तिरहुत पर राज्य किया। इसके बाद हरिसिंह देव (1295 से 1324 ई.), जो नान्यदेव के छठे वंशज थे, तुगलतक वंश के संस्थापक और दिल्ली सुल्तान, गयासुद्दीन तुगलक की सेना ने आक्रमण कर दिया। कर्नाट वंश के अंतिम राजा हरिसिंह देव ने अपनी ताकत नहीं दिखाई और किले को छोड़ कर भाग गए। हरिसिंह देव के पुत्र जगतसिंह देव ने भक्तपुर नायक की विधवा राजकुमारी से विवाह किया और भक्तपुर नामक नगर बसा कर वहां से शासन करने लगे। इधर तिरहुत को गयासुद्दीन तुगलक ने हरिसिंह देव के मंत्री रहे ओनियार वंशी मैथिल ब्राह्मण कामेश्वर ठाकुर को मिथिला (तिरहुत) का शासनाधिकार दे दिया।

कामेश्वर ठाकुर 1354 ई. तक तिरहुत पर शासन किए। इसके बाद ठाकुर के वंशज कई वर्षों तक तिरहुत के कुछ भागों पर शासन करते रहे। उत्तर बिहार के गंधवारिया राजपूत सिमराँव राजाओं के वंशज होने का दावा करते हैं। कर्णट व ओईनवार शासकों की सुव्यवस्था में तिरहुत लंबे समय तक सुरक्षित रहा। वस्तुतः पूरे आर्यावर्त में तिरहुत ही ऐसा क्षेत्र है जहाँ मुसलमान शासक सबसे अन्त में अपनी प्रभुता स्थापित कर सके। संक्षेप में कहा जा सकता है कि कर्णाटवंशीय काल में एक बार फिर से तीरभुक्ति का एकीकरण हुआ। यह काल कला, साहित्य और तिरहुतिया भाषा, जिसे मैथिली भी कहा जाता है, के विकास का उत्कर्षकाल रहा। मिथिला पर कर्णाटवंशीय का शासन लगभग 200 वर्षों तक चला, जो तिरहुत का स्वर्णाल माना जाता है। उनकी राजधानी नानपुर से सिमरौनगढ़ स्थानान्तरित किया गया, जो कथित रूप से जनक कालीन राजधानी जनकपुर से पश्चिम तथा बारा जिला के कलैया से बीस किलोमीटर दक्षिण-र्पूव में अवस्थित है। 

कर्णाटवंशीय का वैवाहिक सम्बन्ध काठमांडू उपत्यका के राजा के साथ भी था। गयासुद्दीन तुगलक के आक्रमण के बाद अटूट तिरहुत अप्राकृतिक रूप से दो भागों में विभक्त हो गया। उत्तरी तिरहुत मुसलमान शासक से विमुक्त रहा जबकि दक्षिण तिरहुत, मुसलमान शासक के अधीनस्थ हो गया। बाद में चलकर मुसलमान शासक ओइनवार वंश को दक्षिण मिथिला का राज्य सौंप दिया, जिसके एवज में निर्धारित कर लेता रहा। उत्तरी मिथिला का बचा हुआ शेष भाग का विभाजन पुनः हुआ, जिसे हम सुगौली सन्धि के नाम से जानते हैं। एकल तिरहुत के विभक्त होने के बाद ही समय-समय पर सीमा का विवाद उचरता रहा है। 
नेपाल का नामकरण का कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलता है। कहा जाता है कि नेत्र मुनी बागमती एवं विष्णुमती के तट पर टेकु नामक स्थान पर अपने घर में तपस्या किया करते थे। वहाँ के संरक्षक राजा ने उन्हीं के नाम से उक्त स्थल का नाम रख दिया। तिब्बती भाषा में ‘‘ने’’ का अर्थ घर और पाल का अर्थ ऊन होता है। अर्थात ऊन का घर। संस्कृत वांगमय के अनुसार देवताओं के वासस्थान को ने कहा जाता है। भाषाविदों ने लिखा है – ने नीतिः ताम्पालवति नेपालः। इसे और स्पष्ट करते हुए लिखा गया है कि न्यायः पाल्यते यः सः नेपालः। वाद में चलकर यह पूरा क्षेत्र नेपाल के नाम से जनप्रिय हो गया। वृहद विष्णु पुराण, मिथिला माहात्म्य वर्णित तथ्यों के आधार पर कोसी से गंडक तक, गंगा प्रवाह से हिमालय वन तक की भूमि को तीरभुक्ति अथवा मिथिला कहा गया है। महेन्द्र नारायण शर्मा कृत मिथिलादेशीय-पञ्चांग तिरहुत का वर्णन इस प्रकार है –

गंगा वहथि जनिक दक्षिण र्पूव कौशिकी धारा।
पश्चिम वहथि गण्डकी उत्तर हिमवत वन विस्तारा।
कमला त्रियुगा अमृता धेमुरा वागमती कृत सारा।
मध्य वहथि लक्ष्मणा प्रभृत्ति से मिथिला विद्यागारा।।
आज ये लगभग पाँच हजार वर्ष र्पूव यह क्षेत्र गंगासागर का भाग था और अरब सागर से भी जुड़ा था। अजातशत्रु के समय तिरहुत का ऐसा उत्कर्ष काल था कि चीन के दक्षिण भाग की वस्तियों का नाम मिथिला नगरी के नाम पर रख दिया गया। यथा मानचाड का नाम मिथिला रखा गया था। तिरहुत का अतीत कहता है कि यह धरती याचना नहीं करता परन्तु अयाची ने शंकर को जन्म देकर संपूर्ण जगत को धन्य का दिया। भामती ने दीप को सहेज कर वाचस्पति का अंक पूरा किया, भारती अर्धांगिनी के रूप में मंडन मिश्र को विजयश्री दिलायी, विद्योत्तमा ज्ञान दात्री बना कालिदास का, सीता ने सहिष्णुता दी समस्त नारी समाज को।

नोट : इस आलेख को मैंने केवल संकलित किया है। यथा जहां-तहां थोड़ी व्याख्या भी करने की कोशिश की है। आने वाले समय में तिरहुत के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, धर्म, परंपरा आदि की व्याख्या अपने आलेख के माध्यम से करता रहूंगा। इस आलेख में आईना-ए-तिरहुत के तथ्यों को भी समाहित किया गया है। साथ ही मिथिला के कई इतिहासों से तथ्यों को लिया गया है। आलेख को लिखने में बड़े पैमाने पर इंटरनेट का सहारा लिया गया है।

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