रघुवर की एक और परियोजना पर ग्रहण, खंडहरों में बदल रहा HEC विस्थापितों के लिए बने भवन

रघुवर की एक और परियोजना पर ग्रहण, खंडहरों में बदल रहा HEC विस्थापितों के लिए बने भवन

रांची : हैवी इंजिनियरिंग काॅरपोरेशन विस्थापितों के लिए बनाए गए भवन विगत तीन साल से बन कर तैयार है लेकिन राज्य सरकार उसे विस्थापितों को हस्तगत करने में आना-कानी कर रही है। इस मामले को लेकर स्थानीय विधायक नवीन जायसवाल ने झारखंड विधानसभा में सवाल भी उठा चुके हैं लेकिन फिलहाल सरकार की ओर से कोई कार्रवाई होते नहीं दिख रही है।

बता दें कि जब एचईसी की स्थापना हो रही थी तो कुल 32 गांव के लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा था। 32 गांवों में से 13 ऐसे गांव हैं, जिन्हें पूर्ण रूपेण उजार दिया गया था। उजारे गए कुछ लोगों को तो बसाया गया लेकिन कुछ लोग आज भी विस्थापन का दंश झेलते रहे हैं। उन दिनों लतमा, जगन्नाथपुर, धुर्वा, भुसूर, मबई बगान, नचियातू, सतरंजी, तिरील, लाबेद, कुटे, मुर्मा, आनी आदि गांवों को पूरी तरह से विस्थापित किया गया था लेकिन कुछ लोग अपने पैतरिक घर को छोड़ कर नहीं गए और सरकार के साथ कानूनी लड़ाई लड़ते रहे।

2014 में जब रघुवर दास के नेतृत्व में भाजपा ने सरकार बनाई तो इस समस्या को हल करने के लिए शासन ने 400 के करीब विस्थापितों को चिंहित कर उसे घर देने का वादा किया। अपने वादे के अनुरूप नए विधानसभा के पास, एचईसी द्वारा राज्य सरकार को आवंटित जमीन पर भवन निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ।

चिंहित विस्थापितों के लिए प्रतिविस्थापित कुल 1250 वर्ग फीट की जमीन आवंटित की गयी और उसपर राज्य सरकार की निर्माण एजेंसी, ग्रेटर रांची डेवलपमेंट आॅथरीटी ने भवन का निर्माण कार्य प्रारंभ किया। विस्थापितों को फिलहाल एक मंजिला भवन आवंटित करने की बात की गयी थी लेकिन इसमें यह भी तय हुआ था कि बाद में अवंटित भवन पर विस्थापित आवस्यकता के अनुसार निर्माण कर सकते हैं।

सरकारी दस्तावेजों के अनुसा जीआरडीए के द्वारा बनाए गए भवन को वर्ष 2020 तक विस्थातिपों को सौंप दिया जाना था लेकिन 2021 पूरा बीत गया और अब 2022 भी प्रारंभ होने वाला है। विस्थापितों को अभी तक भवन का अधिकार प्राप्त नहीं हुआ है। आश्चर्य की बात यह है कि भवन निर्माण का कार्य पूर्ण हो चुका है बावजूद इसके विस्थापितों को भवन नहीं दिया जा सका है।

स्थानिए विस्थापितों का कहना है कि वर्तमान सरकार की उदासीनता के कारण भवन खंडहर में बदल रहा है। भवन में लगाए गए खिर्की, किबार, नलके, कंबोड आदि सामानों की चोरी हो चुकी है और भवन पूर्ण रूपेण खंडहर-सा दिखने लगा है। यदि इसे तत्काल हस्तगत नहीं किया गया तो इसकी हालत और खराब हो जाएगी।

इस मामले में स्थानीय विधायक नवीन जायसवाल ने कहा कि रघुवर दास की सरकार के द्वारा बनाई गयी सारी योजनओं को को अधर में रखकर हेमंत सरकार पूर्वाग्रह सोच का परिचय दे रही है। सरकार को जनता से कुछ भी लेना-देना नहीं है। भवन बन कर तैयार है केवल सरकार को अधिकार देना बांकी है। इसमें भी सरकार आना-कानी कर रही है। हमने इस विषय को विधानसभा में भी उठाया है।

इस संदर्भ में विस्थापितों के नेता अशोक शाहदेव कहते हैं, वर्ष 1980 से हमलोग संघर्ष कर रहे हैं। न केवल स्थानीय स्तर पर संघर्ष किया अपितु इसके लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ी गयी है। पिछली सरकार ने एक सकारात्मक काम किया और हमलोगों को घर देने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। घर बनकर तैयार है लेकिन हमें प्राप्त नहीं हो रहा है। हमने पूरा पूता किया है तकनीकी तौर पर किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं है फिर भी सरकार इसे देने में आना-कानी कर रही है।

मामले में रांची की मेयर ने बताया कि यह विशुद्ध रूप से अपराध है। एक ओर सरकारी पैसे का दूरूपयोग हो रहा है, तो दूसरी ओर भुप्तभोगी विस्थापित घर की प्रत्याशा में परेशान हैं। यह सरकार की घटियां मानसिकता द्योतक है। यह विशुद्ध रूप से पूर्वाग्रह से ग्रस्त मानसिकता का परिचायक है।

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