बांग्लादेश में कथित ईशनिंदा पर एक हिन्दू की हत्या इस्लामिक मान्यता और न्याय शास्त्र दोनों के खिलाफ

बांग्लादेश में कथित ईशनिंदा पर एक हिन्दू की हत्या इस्लामिक मान्यता और न्याय शास्त्र दोनों के खिलाफ

भारत का पड़ोसी बांग्लादेश, जुलाई-अगस्त 2024 से बेहद परेशान है। इस्लामिक चरमपंथियों ने एक बार फिर से बांग्लादेश को तबाही की ओर ढ़केल दिया है। पिछले वर्ष अगस्त में बांग्लादेश में हुए हिंसक आंदोलन ने शेख़ हसीना की सरकार को हटा दिया था। साथ ही इस हिंसा ने देश को उस ट्रैक से भी उतार दिया जिस पर वह पिछले कई सालों से सावधानीपूर्वक बढ़ रहा था। उसी हिंसक आन्दोलन की दूसरी कड़ी में विगत दिनों एक चरमपंथी छात्र नेता को किसी ने गोली मार दिया। इसके कुछ ही दिन उसकी मृत्यु हो गयी। छात्र नेता लगातार भारत विरोधी बयान के कारण सुर्खियों में था। उस छात्र नेता की किसने हत्या की अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है लेकिन इसकी आड़ में पूरा बांग्लादेश एक बार फिर से जल उठा।

दूसरी ओर बांग्लादेश में कथित ईशनिंदा के आरोप में एक हिंदू मज़दूर की बेरहमी से लिंचिंग कर हत्या केवल इसलिए कर दी गयी कि वह हिन्दू था। यह केवल एक मानव जीवन की क्षति नहीं है, यह पूरे समाज के नैतिक विवेक के क्षरण का संकेत है। इस्लाम के अपमान के एक अप्रमाणित आरोप के बाद हुई यह घटना एक बार फिर भारतीय उपमहाद्वीप को एक असहज सच्चाई का सामना करने को मजबूर कर दिया है। ईशनिंदा के आरोपों का बढ़ते हुए हिंसा को वैध ठहराने, न्याय को दरकिनार करने और कमजोर वर्गों को चुप कराने के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है। ऐसे कृत्य अक्सर धर्म के नाम पर किए जाते हैं, लेकिन वे स्वयं इस्लाम की मूल शिक्षाओं के विपरीत हैं।

दक्षिण एशिया में, विशेषकर बांग्लादेश और पाकिस्तान में, ईशनिंदा के आरोप एक खतरनाक सामाजिक हथियार बन चुका है। अफवाहें तेज़ी से फैलती हैं, भावनाएँ भड़काई जाती हैं और भीड़ स्वयं न्यायाधीश, जूरी और जल्लाद की भूमिका आकर खड़ा हो जाता है। तथ्य सत्यापित होने या सुरक्षा उपलब्ध कराए जाने से पहले ही, बस चंद घंटों में परिवार तबाह हो जाते हैं। अल्पसंख्यकों, असहमत लोगों या सामाजिक रूप से कमजोरों के लिए मात्र आरोप ही मौत का फरमान बन जाता है।

हर ईशनिंदा के आरोप के पीछे एक भयभीत इंसान होता है, जिसके माता-पिता, बच्चे, सहकर्मी और सपने होते हैं। बांग्लादेश के हालिया मामले में आरोपी को न तो बचाव का अवसर मिला, न जाँच का, न ही जीवन का। उसकी हत्या करुणा के क्षरण को दर्शाती है, जहाँ संवेदना की जगह आक्रोश और न्याय की जगह संदेह ले लेता है। यह पैटर्न नया नहीं है। पाकिस्तान में अदालतों द्वारा बाद में आरोप निराधार पाए जाने के बावजूद दर्जनों लोगों को भीड़ ने मार डाला। भारत में, जहाँ कानूनी सुरक्षा अपेक्षाकृत मजबूत है, फिर भी “धार्मिक भावनाएँ आहत करने” के आरोपों का उपयोग लेखकों, कलाकारों और अल्पसंख्यकों को डराने के लिए किया गया है। साझा सूत्र है भय, जो दुष्प्रचार और नैतिक घबराहट से और बढ़ जाता है। सबसे चिंताजनक दावा यह है कि ऐसी हिंसा धार्मिक रूप से जायज़ ठहरा दी जाती है। इस दावे की गंभीर जाँच आवश्यक है।

लोगों के वीच प्रचलित धारणा के विपरीत, पवित्र कुरान ईशनिंदा के लिए किसी सांसारिक दंड का प्रावधान नहीं करता। इस मामले में बरेलवी संप्रदाय के इस्लामिक विद्वान, मुफ्ती तुफैल खान कादिरी साहब कहते हैं, ‘‘सदियों से अनेक प्रतिष्ठित विद्वानों ने इस बात पर ज़ोर दिया है। क़ुरान स्वीकार करता है कि आस्थावान लोगों को अपमान और उपहास सहना पड़ेगा, मसलन, “तुम अवश्य ही उन लोगों से बहुत सी तकलीफ़देह बातें सुनोगे जिन्हें तुमसे पहले किताब दी गई और बहुदेववादियों से भी, पर यदि तुम धैर्य रखो और ईश्वर का ध्यान रखो, तो यह बड़े संकल्प की बात है।’’ (क़ुरान 3ः186)। एक अन्य आयत मुसलमानों को हिंसक प्रतिशोध के बजाय अलग हो जाने का निर्देश देती है, “और जब तुम सुनो कि ईश्वर की आयतों का इनकार किया जा रहा है और उनका मज़ाक उड़ाया जा रहा है, तो उनके साथ मत बैठो जब तक वे विषय न बदल लें।” (क़ुरान 4ः140)। इससे यह साफ हो जाता है कि अपमान या उपहास से संबंधित किसी भी क़ुरानी आयत में चौकसी-न्याय, लिंचिंग तो दूर सामान्य दंड का भी आदेश नहीं हे।

पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ का जीवन मुसलमानों के लिए सबसे प्रामाणिक मार्गदर्शक माना जाता है। शास्त्रीय इतिहासकारों ने ऐसे अनेक प्रसंग दर्ज किए हैं जब पैग़म्बर का व्यक्तिगत रूप से अपमान, उपहास किया गया। ताइफ़ में उन पर पत्थर फेंके गए, यहाँ तक कि वे लहूलुहान हो गए। जब दैवी प्रतिशोध का विकल्प दिया गया, तो उन्होंने इनकार किया और अपने हमलावरों के लिए दुआ की। इस्लाम के महान धर्मशास्त्री इमाम अल-ग़ज़ाली ने ज़ोर दिया कि व्यक्तिगत अपमान निजी प्रतिशोध को उचित नहीं ठहराते और नैतिक संयम एक उच्च इस्लामी गुण है। इसी तरह, कठोरपंथियों द्वारा उद्धृत किए जाने वाले इब्न तैमिय्या ने एक महत्वपूर्ण भेद स्पष्ट किया। जहाँ ईशनिंदा पर दंड मान्य भी माना गया, वह राज्य का विषय था, न्यायिक अधिकार, विधिसम्मत प्रक्रिया और स्पष्ट प्रमाण के साथ, न कि भीड़ की कार्रवाई। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कई मामलों में पश्चाताप दंड को निष्प्रभावी कर सकता है।

इस्लामी न्यायशास्त्र (फ़िक़्ह) में ईशनिंदा पर बहसें अवश्य हैं, लेकिन वे आधुनिक नारों से कहीं अधिक सूक्ष्म हैं। हनफ़ी फ़िक़्ह के संस्थापक इमाम अबू हनीफ़ा (जिसका दक्षिण एशिया में व्यापक अनुसरण है) का मत था कि इस्लामी शासन में गैर-मुसलमानों को ईशनिंदा के लिए मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता और उन्होंने संयम पर ज़ोर दिया। आधुनिक विद्वान तर्क देते हैं कि प्रारंभिक इस्लामी इतिहास में ईशनिंदा से जुड़े दंड राजनीतिक ग़द्दारी और हिंसक उकसावे से जुड़े थे, न कि मात्र कथन या कथित अपमान से। एक बिंदु पर विद्वानों में सर्वसम्मति है, ‘‘भीड़ का न्याय इस्लाम में पूर्णतः निषिद्ध है।’’

इस्लामिक पवित्र ग्रंथ क़ुरान कहता है, “किसी समुदाय के प्रति द्वेष तुम्हें अन्याय करने पर न उकसाए। न्याय करो, यही धर्मपरायणता के अधिक निकट है” (क़ुरान 5ः8)। पैग़म्बर ﷺ ने सामूहिक दंड और भावनात्मक निर्णयों के विरुद्ध चेतावनी देते हुए कहा, “संदेह से बचो, क्योंकि संदेह सबसे झूठी बात है” (बुख़ारी)। बिना मुक़दमे लिंचिंग, सार्वजनिक अपमान और हत्या न्याय, दया और जीवन की पवित्रता (हुरमत-अन-नफ़्स) जैसे इस्लामी मूल सिद्धांतों का उल्लंघन हैं। उपमहाद्वीप में ईशनिंदा क़ानूनों का दुरुपयोग इस्लामी शिक्षा का प्रतिबिंब नहीं, बल्कि सामाजिक असुरक्षा, राजनीतिक हेरफेर और धार्मिक अशिक्षा का परिणाम है। धर्म की रक्षा के लिए लोगों की हत्या आवश्यक नहीं है, आवश्यक है न्याय, सत्य और करुणा की स्थापना करना। जो समाज भीड़ को अपराध तय करने देता है, वह कानून और धर्म, दोनों के लिए घातक है।

बांग्लादेश की यह त्रासदी एक चेतावनी है। यदि ईशनिंदा के आरोपों का हथियारीकरण जारी रहा, तो और निर्दाेष जानें जाएँगी और इस्लाम को दया के बजाय क्रोध व आतंक का धर्म के रूप में प्रचारित करना आसान हो जाएगा। धर्म के प्रति सच्चा आदर हिंसा में नहीं, संयम में है। भय में नहीं, न्याय में है। इस नैतिक स्पष्टता को पुनः प्राप्त करना केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक दायित्व भी है।

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