इस्लामिक विश्वास में महिलाओं की स्वतंत्रता : सिद्धांत, भ्रांतियाँ और आगे का मार्ग

इस्लामिक विश्वास में महिलाओं की स्वतंत्रता : सिद्धांत, भ्रांतियाँ और आगे का मार्ग

भारत ही नहीं दुनिया के लगभग सभी देशों में इस्लाम का लगभग एक जैसा ही स्वरूप देखने को मिलता है। हालांकि कुछ देशों ने आधुनिकता के साथ इस्लाम को जोड़ दिया है लेकिन डर वहां भी है। पुरातनपंथी वहां भी हावी है। इस्लाम में खास कर महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर होने वाला बहस अक्सर रूढ़ियों, सांस्कृतिक आदतों और राजनीतिक शोर से प्रभावित रहती है। बहुत-से लोग यह नहीं जानते कि आधिक धर्म की वास्तव मर्यादा क्या है और वह क्या सिखाता है। इस्लाम में स्त्रिों के मामले में जब हम सीधे इस्लामी स्रोतों को देखते हैं, तो अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आती है – इस्लाम ने ऐसे समय में महिलाओं को मजबूत अधिकार दिए, जब उनके पास लगभग कोई अधिकार नहीं थे। क़ुरान के अवतरण के समय अरब समाज में महिलाओं को बहुत कम सुरक्षा प्राप्त थी। कुछ को विरासत से वंचित रखा जाता था, या संपत्ति की तरह माना जाता था। इस्लाम ने इन प्रथाओं को तोड़ते हुए यह सिखाया कि पुरुष और महिला एक ही आत्मा से उत्पन्न हुए हैं और आध्यात्मिक रूप से समान मूल्य रखते हैं। यही सिद्धांत पारिवारिक जीवन, शिक्षा और समाज में महिलाओं के अधिकारों की नींव बनी।

विवाह के समय महिला को महर (दहेज नहीं) दिया जाता है, जो उसकी निजी संपत्ति होती है और उसे अपने धन से घर का खर्च चलाने की कोई बाध्यता नहीं है। यह जिम्मेदारी पूरी तरह पति की होती है। यह आर्थिक स्वायत्तता उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करती है और यह सुनिश्चित करती है कि वह आर्थिक मजबूरी के कारण किसी अत्याचारी या अवांछित संबंध में रहने के लिए विवश न हो। इस्लाम में महिलाओं के लिए शिक्षा का अधिकार केवल एक सामाजिक सुविधा नहीं, बल्कि एक धार्मिक कर्तव्य है। पैग़म्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ज्ञान की प्राप्ति को हर मुसलमान-स्त्री और पुरुष दोनों, के लिए अनिवार्य बताया। इतिहास में अनेक मुस्लिम महिलाओं के उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने इस स्वतंत्रता का उपयोग कर विद्वान, न्यायविद और शैक्षणिक संस्थानों की संस्थापक के रूप में योगदान दिया। उदाहरण के तौर पर फ़ातिमा अल-फ़िहरी ने अल-क़रावीयीन विश्वविद्यालय की स्थापना की। यह विश्वविद्यालय आज इस्लामिक जगत का सबसे बड़ा शैक्षणिक संस्थान है। यह विश्वविद्यालय मोरक्को में स्थित है और कुछ विद्वान तो इसे दुनिया का सबसे पुराना विश्वविद्यालय मानते हैं।

सामाजिक क्षेत्र में चयन की स्वतंत्रता इस्लामी न्यायशास्त्र का एक अनिवार्य सिद्धांत है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित कुछ सांस्कृतिक प्रथाएँ-जैसे जबरन विवाह या महिलाओं की शिक्षा पर रोक-अक्सर धार्मिक परंपरा समझ ली जाती हैं। जबकि इस्लाम का रुख स्पष्ट है, विवाह या शिक्षा के मामलों में महिला की स्वतंत्र और स्पष्ट सहमति के बिना कोई भी निर्णय वैध नहीं है। पिता, भाई या पति की भूमिका बाधाएँ खड़ी करने की नहीं, बल्कि धार्मिक दायित्व निभाते हुए सहायक बनने की है। इसी सिद्धांत के अंतर्गत तलाक़ का अधिकार भी आता है, क्योंकि इस्लामी क़ानून महिला को ऐसे विवाह से बाहर निकलने की अनुमति देता है जो अत्याचारी हो या टिकाऊ न रहा हो। यद्यपि इन क़ानूनों की व्याख्या इतिहास में अलग-अलग रही है, लेकिन इसका मूल उद्देश्य महिला के कल्याण से ही जुड़ा हुआ है।

इस्लाम में महिलाओं की स्वतंत्रता पर कोई भी ईमानदार चर्चा आदर्श और वास्तविकता के बीच मौजूद गहरी खाई को स्वीकार किए बिना पूरी नहीं हो सकती। कई समकालीन समाजों में धार्मिक ग्रंथों की पितृसत्तात्मक व्याख्याओं और कठोर सांस्कृतिक मान्यताओं ने उन्हीं स्वतंत्रताओं को दबाने का काम किया है, जिन्हें धर्म मूल रूप से स्थापित करना चाहता था। इस तनाव का बड़ा कारण “इस्लाम” को, जो एक दैवी मार्ग है और “मुस्लिम संस्कृति” को जो मनुष्यों द्वारा निर्मित है एक-दूसरे में गड्डमड्ड कर देना है। यानी इस मामले में जो भी विसगति देखने को मिलती है उसे भले इस्लाम का ही अंग बताया जाता है लेकिन वह किसी कीमत पर इस्लाम के मूल सिद्धांत से मेल नहीं खाता है।

इसमें से कही कोई संदेह नहीं है कि राजनीतिक अस्थिरता, उपनिवेशवाद और कुछ क्षेत्रों में कठोर शाब्दिक विचारधाराओं के उभार ने महिलाओं के अधिकारों को पीछे धकेला है, जिससे ऐसा माहौल बना है जहाँ महिलाओं को शिक्षा से वंचित किया जाता है, उनकी आवाजाही सीमित होती है और उन्हें सार्वजनिक जीवन से बाहर रखा जाता है। वास्तविकता इससे भिन्न है। ऐसे में शिक्षित युवा मुसलमानों, विद्वानों और मुस्लिम महिलाओं को क़ुरान और पैग़म्बरी परंपराओं के आधार पर इन प्रवृत्तियों को चुनौती देनी चाहिए और इस्लाम की समतावादी भावना की ओर लौटने की वकालत करनी होगी। उन्हें यह स्थापित करना होगा कि महिलाओं की मुक्ति पश्चिम से आयातित नहीं, बल्कि उनकी अपनी धार्मिक पहचान की मूल भावना का अंग है। इसके लिए इज्तिहाद, स्वतंत्र विधिक चिंतन की ज़रूरत है, ताकि पितृसत्तात्मक परंपराओं को तोड़ा जा सके और न्याय तथा समानता जैसे मूल इस्लामी मूल्यों को उजागर किया जा सके।

राजनीतिक भागीदारी भी इस्लामी परंपरा में महिलाओं की स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण पहलू है। इस्लामिक दुनिया में प्रारंभिक काल से ही महिलाएँ सामुदायिक मामलों में सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं। इस्लामी इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ महिलाओं ने शासकों को परामर्श दिया और आवश्यकता पड़ने पर युद्ध में भी भाग लिया। इस बात को आधुनिक दुनिया में प्रचारित करने की जिम्मेदारी मुस्लिम महिलाओं को उठानी चाहिए। सच तो यह है कि सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी उनके धर्म से विचलन नहीं, बल्कि उसी की अभिव्यक्ति है। भारतीय मुस्लिम समाज में इस संदर्भ में अपार संभावनाएँ हैं, विशेषकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाने वाली मुस्लिम महिलाओं की ऐतिहासिक विरासत को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। भारतीय मुसलमानोंकृविशेष रूप से महिलाओं, को अपनी मुस्लिम पहचान को राजनीतिक, पेशेवर और सामाजिक आकांक्षाओं के साथ जोड़ते हुए यह पुनर्परिभाषित करना होगा कि एक स्वतंत्र महिला होने का अर्थ क्या है।

इस्लाम में महिलाओं की स्वतंत्रता एक गतिशील और विकसित होती हुई अवधारणा है, ऐसी यात्रा, जिसका लक्ष्य ऐसा वातावरण बनाना है जहाँ महिला के विकल्प, चाहे वह काम करना चुने, घर पर रहना, नेतृत्व करना या अनुसरण, उसकी ईश्वर-प्रदत्त क्षमता की अभिव्यक्ति के रूप में सम्मानित किए जाएँ। इस्लामी ढाँचा मानवाधिकारों की वैश्विक चर्चा में एक विशिष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, यह कहते हुए कि सच्ची मुक्ति तब प्राप्त होती है जब सामाजिक और कानूनी अधिकार उच्च नैतिक उद्देश्यों से जुड़े हों। सच तो यह है, मानव की अंतर्निहित गरिमा पर ज़ोर देकर इस्लाम आधुनिक दुनिया में महिलाओं के शोषण के विभिन्न रूपों के विरुद्ध एक मज़बूत रक्षा प्रणाली प्रस्तुत करता है। आधुनिक मुस्लिम दुनिया, विशेषकर भारतीय मुसलमानों को इन आदर्शों को व्यवहार में उतारने का प्रयास करना चाहिए, ताकि स्वतंत्रता हर महिला के लिए एक ठोस वास्तविकता बन सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »