हिन्दी के कालजयी रचनाकार ‘रेणु’ पर वेब संगोष्ठी का आयोजन

हिन्दी के कालजयी रचनाकार ‘रेणु’ पर वेब संगोष्ठी का आयोजन

गौतम चौधरी 

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र, रांची द्वारा आजादी की 75 वीं वर्षगांठ को समर्पित ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के तहत हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की जन्म शतवार्षिकी के उपलक्ष्य में दिनांक 14 अप्रैल, 2021 को ‘फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का साहित्य और क्रांतिकारी जीवन’ विषय पर एक राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने की, जबकि स्वागत उद्बोधन तथा समन्वयन इ.गा.रा.का.केंद्र, राँची के निदेशक डॉ. कुमार संजय झा द्वारा किया गया। कार्यक्रम में आमंत्रित वक्तागणों में हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार आलोक धन्वा, प्रो. भारत यायावर, डॉ. सदन झा, डॉ. राकेश रेणु, पुष्य मित्र, डॉ. अमरनाथ झा, बृजेश कुमार, दक्षिणेश्वर रेणु तथा प्रो. कमल कुमार बोस आदि विद्वतजनों ने अपने विचार प्रकट किए।

कार्यक्रम के स्वागत उद्बोधन में डॉ. कुमार संजय झा ने सभी वक्ताओं का परिचय देते हुए, औपचारिक रूप से कार्यक्रम का शुभारंभ किया। कार्यक्रम के दौरान अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि रेणु जी के साहित्य को वर्तमान संदर्भ में देखे जाने की आवश्यकता है। अपने वक्तव्य में आगे कहते है डॉ. जोशी ने कहा कि कहानी में गाँव आना एवं गाँव में कहानी आने में बहुत अंतर है। आजकल की रचनाओं में ग्रामीण वास्तविक आंचलिकता का आभाव है। रेणु की ‘पंचलाईट’ कहानी में अभिवक्त ग्रामीण जीवन की समस्याएँ आज भी अन्य रूप में यथातथ्य रूप से बनी हुई है। रेणु के जीवन को राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। वर्तमान साहित्य पर व्यंग्य करते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि आज का साहित्य केवल सोशल मीडिया तक सीमित होता जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि ‘रेणु’ जी की लेखनी को देखकर ऐसा लगता है जैसे प्रेमचंद के बनाए खाचों में ‘रेणु’ ने अपनी रचनाओं से रंग भरे हों, प्रेम, सद्भावना, सहभागिता के गाढे रंग। ‘गोदान’ के बाद मैला आंचल ही वह दूसरा उपन्यास था, जिसने उसी की तर्ज पर और उसी गति से चैतरफा तारीफ पाई थी। उन्होंने अपनी रचनाओं, खासकर अपने उपन्यासों में, उस जातिविहीन समाज का सपना भी देखा था, जिसे न रच पाने का खामियाजा हम आज तक देख और भुगत रहे हैं।

प्रो. भारत यायावर ने फणीश्वर ‘रेणु’ जी से जुड़े उनके क्रांतिकारी जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। वे कहते हैं कि क्रांतिकारी होने के लिए मातृभूमि के प्रति समर्पण आवश्यक है। साहित्य बदलाव के लिए प्रेरित करता है, साहित्य खुद बदलाव नहीं ला सकता है।

प्रो. कमल कुमार बोस ने रेणु कृत ‘मैला आंचल’ उपन्यास में जनजातीय प्रसंगों को उद्घाटित किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि रेणु का साहित्य विभिन्नताओं से लेकर आम जन का साहित्य है। राजनीति से साहित्य में आकर उन्होंने आम जन की समस्याओं को रेखांकित किया। मैला आंचल उपन्यास में संथाल आदिवासी जीवन-संघर्ष के साथ-साथ ग्रामीण जीवन की आंचलिकता एवं ग्रामीण संगीत की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है।

डॉ. अमरनाथ झा ने रेणु के साहित्य के माध्यम से उस समय के इतिहास में झाँकने का प्रयास किया। डॉ. अमरनाथ ने बिहार के दो यशस्वी साहित्यकारों फनीश्वरनाथ रेणु एवं ज्योतिन्द्र प्रसाद झा ‘पंकज’ के साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अगर भारतीय समाज के ग्रामीण जीवन को समझना है तो रेणु की रचनाएँ इसमें सबसे अधिक हमारी मार्गदर्शक होगीं।

डॉ. सदन झा ने रेणु के कथा रिपोर्ताजों का इतिहास के आर्काइव दृष्टिकोण से विश्लेषण किया। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि रेणु एक कथाकार के साथ-साथ एक उम्दा कवि भी रहे हैं, जिसकी बहुत अधिक चर्चा देखने को नहीं मिलती है। रेणु की रचनाओं का पाठ, पाठक वर्ग को सदैव नए तरह से आकर्षित करता रहा है। रेणु की रचनाओं में आंचलिकता के साथ-साथ मानवीयता का गुण पाया जाता है। डॉ. झा ने रेणु जी के विदापद नाच की विशेषताओं को रेखांकित किया तथा आर्काइव दृष्टिकोण से उसका विश्लेषण किया।

राकेश रेणु ने फणीश्वर रेणु के उपन्यासों के विभिन्न आयामों से प्रकाश डालते हुए कहा कि रेणु के साहित्य में एक ओर जहाँ अस्मितामूलक विमर्श दिखाई देता है तो वहीँ दूसरी ओर उनके उपन्यासों में स्त्री जीवन संघर्ष देखने को मिलता है। इसके साथ ही उन्होंने रेणु के उपन्यासों के माध्यम से विभाजन तथा शरणार्थी समस्याओं को रेखांकित करने का प्रयास किया। रेणु जी का समस्त जीवन आजादी एवं लोकतंत्र बहाली के लिए संघर्षरत जीवन है। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना तथा लोक सर्वप्रमुख है।

पुष्य मित्र ने फणीश्वर रेणु के एक्टिविस्ट जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि रेणु जी का जीवन एवं साहित्य दोनों ही बेहद प्रभावशाली रहे हैं। मैला आंचल की जितनी प्रसिद्धि हिंदी भाषा में उतनी ही प्रसिद्धि सादरी एवं अन्य भाषाओ में देखने को मिलती है।

दक्षिणेश्वर रेणु ने पिता और साहित्यकार एवं स्वतंत्रता सेनानी के रूप में फणीश्वर ‘रेणु’ विषय पर अपनी बात रखते हुए अपने जीवन से जुड़े अपने महत्वपूर्ण जीवन संदर्भों की चर्चा की। इसके साथ ही रेणु की साहित्यिक महत्वता पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. कुमार संजय झा द्वारा किया गया। वेबिनार का मुख्य उद्देश्य हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ के साहित्यिक एवं सामाजिक जीवन संदर्भ को उद्घाटित करना रहा। फलस्वरूप कार्यक्रम में फणीश्वरनाथ के जीवन से जुड़े विभिन्न जीवन संदर्भों पर प्रकाश डाला गया। कार्यक्रम का समापन डॉ. मनोज कुमार के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।

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