2 जनवरी उनके शहादत दिवस पर विशेष/ प्रतिरोध की अमर आवाज़ सफदर हाशमी

2 जनवरी उनके शहादत दिवस पर विशेष/ प्रतिरोध की अमर आवाज़ सफदर हाशमी

सफदर हाशमी का जीवन भारतीय रंगमंच के इतिहास में एक ऐसे उज्ज्वल अध्याय की तरह दर्ज है, जहाँ कला, विचार और संघर्ष एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे में घुले हुए दिखाई देते हैं। वे केवल एक रंगकर्मी नहीं थे, बल्कि जनसंघर्षों की चेतना से लैस ऐसे सांस्कृतिक योद्धा थे, जिन्होंने यह सिद्ध किया कि जब कला जनता के पक्ष में खड़ी होती है, तो वह सत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाती है। उनका जीवन और उनकी शहादतकृदोनों इस बात के प्रमाण हैं कि सच्ची कला हमेशा असुविधाजनक होती है, क्योंकि वह प्रश्न पूछती है, चुप्पी तोड़ती है और अन्याय को बेनकाब करती है।

12 अप्रैल 1954 को दिल्ली में जन्मे सफदर हाशमी को विरासत में साहित्य और प्रगतिशील चेतना मिली। उनके पिता हामिद हाशमी उर्दू के जाने-माने प्रगतिशील कवि थे और माँ शमीम हाशमी शिक्षिका थीं। घर का वातावरण साहित्यिक बहसों, सामाजिक सरोकारों और वैचारिक प्रतिबद्धता से भरा हुआ था। यही कारण था कि सफदर बचपन से ही केवल अपने आसपास की दुनिया को देखने वाले नहीं, बल्कि उसे समझने और बदलने की आकांक्षा रखने वाले व्यक्ति बने। दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से अंग्रेज़ी साहित्य की पढ़ाई के दौरान उनके भीतर रंगमंच के प्रति गहरी रुचि विकसित हुई, लेकिन यह रुचि पारंपरिक मंचीय अभिनय तक सीमित नहीं थी।

सफदर ने बहुत जल्दी यह महसूस कर लिया कि सभागारों में सिमटा रंगमंच आम जनता से कटता जा रहा है। उन्हें लगने लगा कि जिस समाज में असमानता, शोषण और दमन रोज़मर्रा की सच्चाई हैं, वहाँ कला अगर केवल मनोरंजन बनकर रह जाए, तो वह अपनी सामाजिक भूमिका से विमुख हो जाती है। इसी सोच ने उन्हें जननाट्य की ओर मोड़ा। भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जुड़ने के बाद 1973 में वे जन नाट्य मंचकृजनमकृका सक्रिय हिस्सा बने और धीरे-धीरे उसकी वैचारिक दिशा के प्रमुख सूत्रधार बन गए।

जनम के माध्यम से सफदर हाशमी ने नुक्कड़ नाटक को एक सशक्त राजनीतिक और सांस्कृतिक माध्यम के रूप में स्थापित किया। सड़क, चौराहा, फैक्ट्री गेट और बस्तीकृयही उनका रंगमंच था। बिना मंच, बिना रोशनी और बिना परदे के खेले जाने वाले उनके नाटक सीधे जनता से संवाद करते थे। उनके लिए दर्शक कोई निष्क्रिय उपभोक्ता नहीं था, बल्कि एक सक्रिय सहभागी था, जो नाटक के सवालों से टकराता था। ‘मशीन’, ‘हल्ला बोल’, ‘औरत’, ‘दस्तक’, ‘जनता पागल हो गई है’ जैसे नाटकों ने श्रमिक शोषण, पूँजीवादी लूट, साम्प्रदायिकता, पितृसत्ता और राज्य के दमनकारी चरित्र को बेहद सहज लेकिन तीखे अंदाज़ में उजागर किया।

सफदर के नाटकों की भाषा सरल थी, पर उसमें गहरी वैचारिक धार थी। वे न तो जटिल प्रतीकों के बोझ तले दबे होते थे और न ही उपदेशात्मक। उनके व्यंग्य में करुणा थी और उनके प्रतिरोध में मानवीय संवेदना। वे मानते थे कि जननाट्य का उद्देश्य केवल गुस्सा पैदा करना नहीं, बल्कि चेतना जगाना है। यही कारण है कि उनके नाटक आज भी उतने ही प्रासंगिक लगते हैं, जितने अपने समय में थे।

सफदर हाशमी केवल रंगमंच तक सीमित नहीं थे। वे एक गंभीर लेखक और चिंतक भी थे। कला और संस्कृति पर उनके लेख यह स्पष्ट करते हैं कि वे तटस्थता को एक प्रकार की कायरता मानते थे। उनका प्रसिद्ध कथनकृ“संस्कृति कभी तटस्थ नहीं होती”कृआज भी सांस्कृतिक विमर्श का केंद्रीय सूत्र है। उनके लिए कलाकार का दायित्व था कि वह अन्याय के विरुद्ध स्पष्ट पक्ष ले, चाहे उसकी कीमत कुछ भी हो। उनका निजी जीवन भी इसी सादगी और प्रतिबद्धता का विस्तार था। उनकी पत्नी मोलॉयश्री हाशमी स्वयं एक संवेदनशील लेखिका और सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने सफदर के बाद जनम और सांस्कृतिक प्रतिरोध की परंपरा को आगे बढ़ाया।

1 जनवरी 1989 भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का एक दुखद और निर्णायक दिन बन गया। ग़ाज़ियाबाद के साहिबाबाद में जनम के कलाकार ‘हल्ला बोल’ नाटक का मंचन कर रहे थे, जो स्थानीय राजनीतिक हिंसा और गुंडागर्दी के खिलाफ था। सत्ता-संरक्षित अपराधियों ने नाटक के दौरान हमला कर दिया। सफदर हाशमी को लोहे की रॉड से बेरहमी से पीटा गया और अगले दिन, 2 जनवरी 1989 को, 34 वर्ष की उम्र में उन्होंने दम तोड़ दिया। यह केवल एक कलाकार की हत्या नहीं थी, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला था।

सफदर की शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया। कलाकारों, लेखकों और आम नागरिकों ने महसूस किया कि अगर सड़क पर सच बोलने वाला कलाकार सुरक्षित नहीं है, तो लोकतंत्र भी सुरक्षित नहीं है। उनकी हत्या के ठीक बाद उसी जगह जनम ने फिर नाटक खेलाकृयह घोषणा करते हुए कि विचारों को लाठियों से कुचला नहीं जा सकता। यही क्षण सफदर हाशमी को एक व्यक्ति से प्रतीक में बदल देता हैकृप्रतिरोध के प्रतीक में।

आज सफदर हाशमी हमारे बीच शारीरिक रूप से नहीं हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति हर उस नुक्कड़ पर महसूस की जा सकती है, जहाँ कोई कलाकार सत्ता से सवाल करता है। उनके नाम पर गठित ‘सफदर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट’ (सहमत) सांप्रदायिकता, फासीवादी प्रवृत्तियों और सांस्कृतिक दमन के विरुद्ध लगातार सक्रिय है। सफदर की विरासत यह सिखाती है कि कला का असली मूल्य उसकी बाज़ारू सफलता में नहीं, बल्कि उसकी जनपक्षधरता में है।

ऐसे समय में, जब कला को लाभ, टीआरपी और प्रायोजकों की शर्तों में बाँधने की कोशिशें तेज़ हैं, सफदर हाशमी और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि कलाकार होना केवल प्रतिभा का प्रश्न नहीं, बल्कि साहस, ईमानदारी और प्रतिबद्धता का प्रश्न भी है। सफदर हाशमी का जीवन भले ही छोटा रहा हो, लेकिन उसका प्रभाव असाधारण रूप से व्यापक है। वे आज भी हमें पुकारते हैंकृअन्याय के विरुद्ध, चुप्पी के विरुद्ध और डर के विरुद्ध,
हल्ला बोल।

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