समावेशी राष्ट्रवाद के प्रखर पैरोकार डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी

समावेशी राष्ट्रवाद के प्रखर पैरोकार डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी

वह दौर स्वतंत्र समर का था। ऐसे समय में डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी भारत के राष्ट्र-निर्माण बेहद तसल्ली लगे थे। उन्होंने अपने जीवन में देश के लिए अपेक्षाकृत शांत लेकिन कहीं अधिक स्थायी योगदान देकर अलग पहचान कायम की है। उनका योगदान नैतिक साहस, समावेशी राष्ट्रवाद और शिक्षा-आधारित संस्थागत निर्माण में निहित था। पेशे से चिकित्सक, विश्वास से स्वतंत्रता सेनानी और स्वभाव से राष्ट्रवादी—डॉ. अंसारी उन नेताओं में थे जो मानते थे कि शिक्षित और सामाजिक रूप से जागरूक नागरिकों के बिना भारत की आज़ादी अधूरी है।

डॉ. अंसारी को जानना हमारी पीढ़ी के लिए बेहद जरूरी है। 1880 में ग़ाज़ीपुर के यूसुफ़पुर में जन्मे डॉ. अंसारी उस पीढ़ी के भारतीय मुसलमानों में से थे जिन्होंने अपनी धार्मिक पहचान और एक संयुक्त, स्वतंत्र भारत के प्रति प्रतिबद्धता के बीच कोई विरोध नहीं देखा। इंग्लैंड में चिकित्सा की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे विदेश में एक समृद्ध पेशेवर जीवन बिता सकते थे, लेकिन उन्होंने औपनिवेशिक भारत लौटने का निर्णय लिया—ऐसे समय में जब स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ना निगरानी, आर्थिक अनिश्चितता और सामाजिक जोखिम का अर्थ रखता था। यह निर्णय ही उनकी पहली बड़ी उपलब्धि थी। 

डॉ. अंसारी शीघ्र ही महात्मा गांधी के विश्वस्त सहयोगी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेता के रूप में उभरे। उन्होंने असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की और अंग्रेज़ी संस्थाओं के बहिष्कार तथा स्वदेशी विकल्पों के निर्माण का आह्वान किया। उनके लिए राजनीतिक प्रतिरोध नैतिक अनुशासन से अलग नहीं था। उनका विश्वास था कि स्वतंत्रता केवल विरोध से नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, त्याग और नैतिक सार्वजनिक जीवन से अर्जित होती है।

डॉ. अंसारी की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में 1920 में स्थापित जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापक और मार्गदर्शक के रूप में उनकी भूमिका प्रमुख है। जामिया केवल एक विश्वविद्यालय नहीं था, वह राष्ट्रीय शिक्षा का एक साहसिक प्रयोग था, जो भारतीय मन पर औपनिवेशिक नियंत्रण के प्रत्यक्ष विरोध में स्थापित किया गया था। हकीम अजमल ख़ान, मौलाना मोहम्मद अली जौहर और डॉ. ज़ाकिर हुसैन जैसे दूरदर्शी नेताओं के साथ मिलकर डॉ. अंसारी ने जामिया को एक ऐसी संस्था के रूप में आकार दिया जहाँ आधुनिक ज्ञान भारतीय मूल्यों, सामाजिक ज़िम्मेदारी और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा हो। शुरुआती वर्षों में जब जामिया गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक संकटों से जूझ रही थी, तब कुलाधिपति (शैख़-उल-जामिया) के रूप में डॉ. अंसारी के नेतृत्व ने संस्था को जीवित रखा। उन्होंने संसाधन जुटाए, विश्वास पैदा किया और जामिया को राजनीतिक दबावों से बचाया। आज, एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के रूप में अपनी अकादमिक उत्कृष्टता और सामाजिक प्रतिबद्धता के लिए प्रसिद्ध जामिया मिल्लिया इस्लामिया, डॉ. अंसारी की सबसे जीवित स्मारक के रूप में हमारे बीच उपस्थित है।

उनके सार्वजनिक जीवन की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि 1927 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष (मद्रास अधिवेशन) के रूप में उनका कार्यकाल था। ऐसे समय में जब सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहे थे और औपनिवेशिक नीतियाँ धार्मिक आधार पर भारतीयों को बाँटने का प्रयास कर रही थीं, डॉ. अंसारी ने हिंदू–मुस्लिम एकता को राजनीतिक ही नहीं, नैतिक अनिवार्यता के रूप में निरंतर आगे बढ़ाया। उन्होंने अलगाववादी सोच को अस्वीकार किया और मुसलमानों को मात्र वोट बैंक या सौदेबाज़ी समूह में सीमित करने की प्रवृत्ति के विरुद्ध चेतावनी दी। उनके अनुसार, मुसलमान भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अतिथि नहीं, बल्कि उसके समान भागीदार और शिल्पकार थे।

डॉ. अंसारी ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत के हितों की पैरवी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वैश्विक मंचों पर उनकी भागीदारी ने भारत को प्रतिस्पर्धी समुदायों के समूह के रूप में नहीं, बल्कि स्वशासन का अधिकारी एक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी चिकित्सकीय पृष्ठभूमि ने उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण दिया, जबकि उनकी राजनीतिक सक्रियता नैतिक संयम से युक्त थी—यह संयोजन उनके समय में भी दुर्लभ था।

आज के संदर्भ में डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी की प्रासंगिकता उनकी राजनीति और समकालीन सार्वजनिक जीवन के बीच के अंतर से और स्पष्ट होती है। वे प्रदर्शन से अधिक सेवा, व्यक्तियों से अधिक संस्थाओं और तात्कालिक तालियों से अधिक दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित में विश्वास रखते थे। उन्होंने पहचान को हथियार नहीं बनाया, उसे मानवीय बनाया। उनका इस्लाम नैतिक, समावेशी और भारतीय मिट्टी में गहराई से रचा-बसा था—इतना आत्मविश्वासी कि टकराव के बजाय सहयोग को चुना।

वर्ष 1936 में, भारत की स्वतंत्रता से एक दशक से भी पहले, डॉ. अंसारी का निधन हो गया। किंतु स्वतंत्रता के क्षण में उनकी अनुपस्थिति उनके योगदान को कम नहीं करती। उन्हीं जैसे नेताओं ने वह बौद्धिक और नैतिक आधार तैयार किया, जिस पर स्वतंत्र भारत का निर्माण हुआ। डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी को स्मरण करते हुए यह बोध होता है कि सच्ची देशभक्ति हमेशा नारे नहीं लगाती। कभी-कभी वह सिखाती है, बनाती है, उपचार करती है और जोड़ती है। ऐसे समय में जब इतिहास को अक्सर सरल द्वैतों में समेट दिया जाता है, उनका जीवन एक सशक्त संदेश देता है, “भारत की शक्ति हमेशा साझा भविष्य में विश्वास रखने वालों से आई है, न कि विभाजित कल की कल्पनाओं से।” यही कारण है कि डॉ. मुख़्तार अहमद साहब आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी सोच पर खड़ा समावेशी हिन्दुस्तान अपनी गति से निरंतर आगे बढ़ रहा है। 

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