आनन्द
ईरान आज गहरे राजनीतिक-आर्थिक संकट से गुजर रहा है। महँगाई, बेरोज़गारी, मुद्रा अवमूल्यन और सामाजिक दमन ने आम जनताकृविशेषकर मजदूरों, युवाओं और महिलाओंकृको असंतोष की स्थिति में ला खड़ा किया है। राजधानी तेहरान सहित कई शहरों में समय-समय पर हुए व्यापक प्रदर्शनों ने यह स्पष्ट किया है कि अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई के नेतृत्व वाली सत्ता के प्रति जनआक्रोश सतह के नीचे लगातार उबल रहा है।
लेकिन इस संकट को केवल “तानाशाही बनाम जनता” के सरल द्वंद्व में नहीं समझा जा सकता। दूसरी ओर अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों की भूमिका भी है, जो ईरान के आंतरिक संकट को अपने भू-राजनीतिक हितों के लिए भुनाने की कोशिश करते रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि इस जटिल परिस्थिति को मजदूर वर्गीय दृष्टिकोण से कैसे समझा जाए?
आंतरिक संकट की जड़ें
ईरान की अर्थव्यवस्था मुख्यतः तेल और गैस निर्यात पर निर्भर है। पश्चिमी प्रतिबंधों और वैश्विक अस्थिरता के कारण निर्यात में गिरावट आई है, जिससे राजस्व घटा और महँगाई आसमान छूने लगी। रियाल का तीव्र अवमूल्यन हुआ, जिससे आम लोगों की क्रय-शक्ति बुरी तरह प्रभावित हुई। मजदूरों की वास्तविक आय घटी, जबकि आवश्यक वस्तुओं के दाम कई गुना बढ़ गए।
यह आर्थिक संकट केवल बाहरी दबाव का परिणाम नहीं है। देश के भीतर एक केंद्रीकृत, अपारदर्शी और भ्रष्ट पूँजीवादी ढाँचा मौजूद है, जिसमें धार्मिक प्रतिष्ठान, तथाकथित ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड’ और उनसे जुड़े आर्थिक नेटवर्क प्रमुख उद्योगों और अनुबंधों पर नियंत्रण रखते हैं। “बुनियाद” जैसे ट्रस्टों के माध्यम से विशाल आर्थिक संसाधन सीमित तबकों के हाथों में केंद्रित हैं।
इसके साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक दमनकृविशेषकर महिलाओं पर नियंत्रण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी और राजनीतिक असहमति का दमनकृने जनता के असंतोष को और तीखा किया है। 2022 में महसा अमीनी की हिरासत में मौत के बाद भड़का आंदोलन यह दिखा चुका है कि सामाजिक स्वतंत्रता का प्रश्न आर्थिक संकट से गहराई से जुड़ा हुआ है।
बाहरी हस्तक्षेप और साम्राज्यवादी रणनीति
ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों का इतिहास लंबा है। 2015 के परमाणु समझौते से अमेरिका के बाहर निकलने के बाद प्रतिबंधों को और कड़ा किया गया। इन प्रतिबंधों ने अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया और संकट को गहराया।
अमेरिकी प्रशासन ने कई बार ईरान में “लोकतंत्र” के नाम पर हस्तक्षेप की भाषा अपनाई है। पश्चिमी मीडिया में पूर्व शाह के पुत्र रज़ा पहलवी को संभावित विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना इसी रणनीति का हिस्सा माना जाता है। इज़रायल के साथ क्षेत्रीय तनाव और खुफिया गतिविधियों की खबरें भी समय-समय पर आती रही हैं।
यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि साम्राज्यवाद का उद्देश्य ईरानी जनता की मुक्ति नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में अपने हितों की पूर्ति है। इतिहास साक्षी है कि बाहरी हस्तक्षेप अक्सर लोकतंत्र नहीं, बल्कि अस्थिरता और नए निर्भर संबंध पैदा करते हैं।
दो ध्रुवों के बीच फँसी जनता
ईरान के भीतर चल रहे आंदोलनों को लेकर दो अतिवादी दृष्टिकोण प्रचलित हैं। एक धारा हर विरोध को विदेशी साज़िश बताकर खारिज कर देती है। दूसरी धारा समूचे संकट का दोष केवल धार्मिक सत्ता पर डालकर अमेरिकी हस्तक्षेप को सकारात्मक मानती है।
वास्तविकता इन दोनों से अधिक जटिल है। जनता का असंतोष वास्तविक है और उसकी जड़ें आंतरिक आर्थिक-सामाजिक संरचना में हैं। साथ ही, बाहरी शक्तियाँ इस असंतोष को अपने हितों के लिए उपयोग करने का प्रयास करती हैं।
जब भी बाहरी सैन्य खतरा मंडराता है, राष्ट्रवादी भावनाएँ उभरती हैं और सत्ता अपने विरोध को “विदेशी साज़िश” बताकर दमन को वैध ठहराने की कोशिश करती है। इस प्रकार, बाहरी हस्तक्षेप वस्तुतः जनआंदोलन को कमजोर कर सकता है और सत्ताधारी तंत्र को मजबूत बना सकता है।
मजदूर वर्ग का दृष्टिकोण
मजदूर वर्गीय नजरिये से देखें तो ईरान की मौजूदा धार्मिक-पूँजीवादी सत्ता और अमेरिकी साम्राज्यवादकृदोनों ही मेहनतकश जनता के हितों के प्रतिकूल हैं। एक ओर आंतरिक शोषण, दमन और असमानता है; दूसरी ओर बाहरी आर्थिक-सैन्य दबाव, जो देश को और अस्थिर करता है।
मजदूर वर्ग को इन दोनों ध्रुवों में से किसी एक का समर्थन करने के लिए बाध्य नहीं होना चाहिए। ईरान के आंतरिक संकट का समाधान बाहरी हस्तक्षेप या राजशाही की पुनर्स्थापना नहीं हो सकता। शाह के दौर का इतिहास बताता है कि राजतंत्र भी दमनकारी और साम्राज्यवादी शक्तियों से जुड़ा हुआ था।
वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या ईरान की जनताकृविशेषकर मजदूर वर्गकृअपनी स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति का निर्माण कर सकती है? क्या वह आर्थिक न्याय, लोकतांत्रिक अधिकार और सामाजिक स्वतंत्रता को जोड़ते हुए वैकल्पिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर सकती है?
संभावनाएँ और सीमाएँ
फिलहाल ईरान में ऐसी संगठित क्रांतिकारी शक्ति स्पष्ट रूप से उभरती नहीं दिखती, जो सत्ता परिवर्तन को समाजवादी दिशा दे सके। दमन, संगठनात्मक विखंडन और बाहरी दबाव इसके मार्ग में बाधाएँ हैं।
फिर भी, बार-बार उभरते जनआंदोलन यह संकेत देते हैं कि सामाजिक आधार तैयार हो रहा है। आर्थिक संकट और सामाजिक असंतोष दीर्घकाल में राजनीतिक पुनर्संरचना की जमीन बन सकते हैं।
निष्कर्ष
ईरान की मौजूदा परिस्थिति दोहरे संकट की अभिव्यक्ति हैकृआंतरिक निरंकुश पूँजीवादी व्यवस्था और बाहरी साम्राज्यवादी दबाव का सम्मिलित परिणाम। इस जटिलता को समझे बिना किसी एक पक्ष का समर्थन करना जनता के हितों के विपरीत होगा।
स्थायी समाधान न तो धार्मिक तानाशाही में है, न ही विदेशी हस्तक्षेप में। वास्तविक मुक्ति तभी संभव है जब मेहनतकश जनता अपने स्वतंत्र राजनीतिक संगठन और कार्यक्रम के साथ आगे आए, आर्थिक न्याय, लोकतांत्रिक अधिकार और सामाजिक समानता को एक समग्र दृष्टि में जोड़े।
ईरान की जनता के सामने चुनौती बड़ी है, पर इतिहास गवाह है कि जब जनता संगठित होती है, तो वह सबसे जटिल संकटों का भी समाधान खोज सकती है।
(नोट: यह लेख फरवरी 2026 में प्रकाशित एक लेख का संशोधित व संपादित रूप है। हाल के दिनों की सैन्य कार्रवाइयों को इसमें शामिल नहीं किया गया है। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे हमारे प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।)
