गौतम चौधरी
पश्चिम एशिया की राजनीति लंबे समय से प्रतिस्पर्धा, अविश्वास और सामरिक टकराव से प्रभावित रही है। हाल के वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव इस क्षेत्र को संभावित बड़े संघर्ष की ओर धकेलता हुआ दिखाई देता है। दोनों पक्ष अब आमने-सामने की लड़ाई में उतर गए हैं। अमेरिका और इजरायल की सेना ने ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या कर दी है और भारत से लौट रहे एक ईरानी युद्धपोत को तबाह कर दिया है। इस टकराव ने भयावह स्वरूप ग्रहण कर लिया है। इधर ईरान, मघ्य पूरव के देशों में फैले अमेरिकी सैन्य आधार पर लगातार अपने मिसाइल से हमला कर रहा है। उधर इजरायल की राजधानी तेलहवीब में भी भयंकर विस्फोट हो रहे हैं। इससे अब साफ हो गया है कि यह युद्ध बड़े पैमाने पर लड़ा जा रहा है। यदि यह टकराव नहीं रुका, तो यह केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वैश्विक राजनीति, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी व्यापक असर डालेगा।
आइए सबसे पहले वर्तमान युद्ध की पृष्टिभूमि थोड़ी चर्चा करते हैं। अमेरिका और ईरान के संबंध 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति के बाद से ही तनावपूर्ण रहे हैं। इस क्रांति के बाद ईरान में नई राजनीतिक व्यवस्था स्थापित हुई, जिसने पश्चिमी प्रभाव का विरोध किया। इसके बाद से दोनों देशों के बीच राजनीतिक अविश्वास, आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य तनाव लगातार बने रहे।
दूसरी ओर, इज़राइल लंबे समय से ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए एक प्रमुख खतरा मानता रहा है। इज़राइल का आरोप है कि ईरान क्षेत्र में ऐसे संगठनों का समर्थन करता है जो उसके लिए खतरा बनते हैं। वहीं ईरान, इज़राइल की नीतियों की तीखी आलोचना करता रहा है और क्षेत्रीय राजनीति में अपनी भूमिका को अवैध ठहराता रहा है।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस तनाव का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। पश्चिमी देशों और इज़राइल को आशंका है कि यह कार्यक्रम भविष्य में परमाणु हथियारों के विकास की दिशा में बढ़ सकता है, जबकि ईरान का कहना है कि उसका कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण ऊर्जा उद्देश्यों के लिए है। इसी विवाद को हल करने के लिए 2015 में Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) नामक समझौता हुआ था, जिसमें ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कुछ सीमाएं स्वीकार की थीं। हालांकि बाद में अमेरिका के समझौते से बाहर निकलने और प्रतिबंधों के फिर से लागू होने के बाद तनाव एक बार फिर बढ़ गया।
यदि अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच प्रत्यक्ष युद्ध लंबा खिंचता है, तो उसका सबसे पहला प्रभाव पश्चिम एशिया की स्थिरता पर पड़ेगा। यह संघर्ष संभवतः केवल तीन देशों तक सीमित नहीं रहेगा, जिसकी संभावना बढ़ती जा रही है, बल्कि क्षेत्र के अन्य देशों और संगठनों को भी प्रभावित कर सकता है। इससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता और मानवीय संकट बढ़ने की आशंका है।
पश्चिम एशिया विश्व के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। किसी बड़े युद्ध की स्थिति में तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। इसका प्रभाव एशिया, यूरोप और अन्य क्षेत्रों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ेगा।
भारत के लिए यह संघर्ष कई कारणों से महत्वपूर्ण है। भारत के पश्चिम एशिया के साथ गहरे आर्थिक, ऊर्जा और प्रवासी संबंध हैं। बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक इस क्षेत्र में काम करते हैं और भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा होता है। इसलिए किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष का असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय कूटनीति पर पड़ सकता है। आंकड़े बताते हैं कि भारत के लगभग 90 लाख लोग मध्य पूरब में काम करते हैं। युद्ध यदि लंबा खिंचा तो भारत में बेरोजगारों की संख्या बढ़ेगी।
अंततोगत्वा ऐसा कहा जा सकता है कि अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव यह संकेत देता है कि पश्चिम एशिया की भू-राजनीति अभी भी अत्यंत जटिल और संवेदनशील है। कूटनीतिक संवाद, बहुपक्षीय सहयोग और क्षेत्रीय संतुलन ही ऐसे साधन हैं जो इस संभावित संघर्ष को बड़े युद्ध में बदलने से रोक सकते हैं। अंततः, वैश्विक समुदाय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह प्रतिस्पर्धा और अविश्वास के इस माहौल में शांति, स्थिरता और सहयोग के रास्ते को कैसे मजबूत करे।
