तो क्या बिहार व पश्चिम बंगाल का नक्शा भी बदलने की योजना में है केन्द्र सरकार?

तो क्या बिहार व पश्चिम बंगाल का नक्शा भी बदलने की योजना में है केन्द्र सरकार?

विगत दिनों समाचार माध्यमों में अचानक से एक खबर आयी कि केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह बिहार के सीमांचल यानी किसनगंज, पूर्णिया, अरड़िया आदि क्षेत्रों का दौरा करने बिहार आ रहे हैं। खबर के अनुसार शाह का इन क्षेत्रों में मुकम्मल दौरा हुआ भी। इसके तुरंत बाद बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने भारत के उच्च सदन राज्यसभा के लिए नामांकण किया। ये दोनों घटनाएं अप्रत्याशित है। बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी सहित राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के सभी दलों ने साफ तौर पर कहा था कि बिहार के अगले मुख्यमंत्री निर्विवाद रूप से नितीश कुमार ही रहेंगे, बावजूद इसके कुमार को बिहार से बेदखल करने की तैयारी हो गयी। इससे यह साफ हो गया है कि बिहार में अब नेतृत्व परिवर्तन तय है। इधर एक तीसरी घटना भी सामने अयी। राजनीति से दूर-दूर तक रहने वाले नितीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को अभी हाल ही में जनता दल यूनाइटेड की सदस्यता दिलायी गयी है। इन घटनाओं का बिहार की राजनीति पर क्या असर होगा, यह तो महत्व का है ही, अब दूसरी संभावनाओं पर भी लोग सोचने पर मजबूर हो रहे हैं। जो खबर छन कर सामने आ रही है, उसका कुल लब्बोलुआब यह है कि केवल बिहार का ही नहीं संभवतः पश्चिम बंगाल का भी भूगोल बदल जाएगा। इस विषय की पटकथा को और अधिक बल तब मिला जब दोनों राज्यों के राज्यपालों को एक साथ बदल दिया गया।

क्या सचमुच केन्द्र सरकार बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक नया राज्य बनाने की दिशा में काम कर रही है, या फिर यह एक सतही अफवाह है? आइए हम इस विषय पर थोड़ी तसल्ली से चर्चा करते हैं। हाल के दिनों में सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में एक नई चर्चा तेज़ी से फैल रही है। दावा किया जा रहा है कि भारत सरकार बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ सीमावर्ती जिलों को मिलाकर एक नया केंद्र शासित प्रदेश बना सकती है। इस प्रस्तावित क्षेत्र को सामरिक रूप से महत्वपूर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे आम बोलचाल में “चिकन नेक” कहा जाता है, की सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है।

हालाँकि अभी तक इस विषय पर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, फिर भी इस चर्चा ने कई ऐतिहासिक और रणनीतिक प्रश्नों को जन्म दिया है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर उत्तर-पूर्वी भारत को शेष भारत से जोड़ने वाली एक संकरी भूमि पट्टी है। इसकी चौड़ाई कई जगहों पर लगभग 20-22 किलोमीटर तक ही रह जाती है। यह क्षेत्र पश्चिम में नेपाल, पूर्व में बांग्लादेश, उत्तर में भूटान और उससे आगे चीन के तिब्बत क्षेत्र के बीच स्थित है।

इस कारण यह क्षेत्र भारत की सुरक्षा दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। किसी भी संकट की स्थिति में उत्तर-पूर्वी राज्यों के साथ भारत का स्थल संपर्क इसी कॉरिडोर पर निर्भर करता है। इसी वजह से सुरक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से इस क्षेत्र में बेहतर प्रशासनिक नियंत्रण और सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता पर बल देते रहे हैं।

कयासों और मीडिया रिपोर्टों में जिन क्षेत्रों का उल्लेख किया जा रहा है, उनमें बिहार से पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज को शामिल करने की बात कही जा रही है, जबकि पश्चिम बंगाल से दार्जिलिंग, कालिंगपांग, अलिपुरद्वार को शामिल किया जाएगा। कहा जा रहा है कि इन जिलों को मिलाकर एक अलग प्रशासनिक इकाई बनाने से सीमावर्ती क्षेत्र में प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था अधिक केंद्रीकृत हो सकती है।

भारत में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का गठन समय-समय पर प्रशासनिक, भाषाई और सामरिक कारणों से होता रहा है। 1956 का राज्य पुनर्गठन अधिनियम भारत के प्रशासनिक इतिहास की सबसे बड़ी घटना थी, जब भाषाई आधार पर राज्यों की सीमाएँ पुनर्निर्धारित की गईं। इसके बाद भी कई नए राज्य बने, जैसे-2000 में झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड एवं 2014 में तेलंगाना का गठन किया गया।

इसी प्रकार कुछ क्षेत्रों को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा भी दिया गया। उदाहरण के तौर पर 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद दो केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि भारत में प्रशासनिक पुनर्गठन असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए संसद की स्वीकृति और व्यापक राजनीतिक सहमति आवश्यक होती है।

बिहार का सीमांचल क्षेत्र (पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज आदि) लंबे समय से विकास, जनसंख्या संतुलन और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों के कारण चर्चा में रहा है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग क्षेत्र भी अलग प्रशासनिक व्यवस्था की मांग का इतिहास रखता है। यहाँ गोरखा समुदाय से जुड़े संगठनों ने कई बार अलग राज्य “गोरखालैंड” की मांग उठाई है। इन दोनों क्षेत्रों की अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियाँ भी इस तरह की चर्चाओं को हवा देती हैं।

हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सीमांचल दौरे के बाद इस तरह की चर्चाओं को और बल मिला है। कुछ जानकारों का मानना है कि केंद्र सरकार इस क्षेत्र में सुरक्षा, घुसपैठ नियंत्रण और जनसांख्यिकीय निगरानी को लेकर गंभीर है। हालाँकि यह कहना कि सरकार नया केंद्र शासित प्रदेश बनाने जा रही है, फिलहाल केवल अटकलों पर आधारित है।

इस पूरे मुद्दे पर उपलब्ध तथ्यों को देखें तो कुछ बातें स्पष्ट हैं। जैसे-कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। भारत सरकार या गृह मंत्रालय की ओर से ऐसा कोई प्रस्ताव सार्वजनिक नहीं किया गया है। सरकार का वर्तमान फोकस सुरक्षा पर है। सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ रोकना, सीमा प्रबंधन और सुरक्षा ढाँचे को मजबूत करना प्राथमिकता बताया जा रहा है। राजनीतिक और संवैधानिक प्रक्रिया लंबी होती है। यदि भविष्य में ऐसा कोई प्रस्ताव आता भी है तो उसे संसद से पारित होना पड़ेगा और संबंधित राज्यों की राय भी महत्वपूर्ण होगी।

कुल मिलाकर बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों को मिलाकर नया केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने की चर्चा फिलहाल राजनीतिक कयासों और सोशल मीडिया की बहस तक सीमित है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सामरिक महत्ता को देखते हुए केंद्र सरकार इस क्षेत्र की सुरक्षा और प्रशासनिक मजबूती पर ध्यान दे रही है, लेकिन अभी तक किसी नए प्रशासनिक ढाँचे की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में इस विषय को फिलहाल संभावनाओं और अटकलों के दायरे में ही रखना उचित होगा। भविष्य में यदि सरकार की ओर से कोई औपचारिक प्रस्ताव आता है, तभी इस पर ठोस चर्चा संभव होगी।

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