इस्लाम : दुनिया का पहला धर्म जहां महिलाओं के अधिकारों का मुकम्मल दस्तावेजीकरण हुआ

इस्लाम : दुनिया का पहला धर्म जहां महिलाओं के अधिकारों का मुकम्मल दस्तावेजीकरण हुआ

समकालीन विश्व में जब भी महिलाओं के अधिकारों, शिक्षा या राजनीतिक भागीदारी की चर्चा होती है, तो अक्सर यह धारणा सामने आती है कि ये विचार आधुनिक पश्चिमी लोकतंत्रों की देन हैं और पारंपरिक धार्मिक समाज विशेषकर इस्लामी समाज इनके प्रति स्वाभाविक रूप से प्रतिरोधी रहे हैं। किंतु इस्लामी इतिहास, कुरान और सुन्नत का गंभीर अध्ययन इस लोकप्रिय धारणा को चुनौती देता है। वास्तविकता यह है कि इस्लाम ने महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकार उस दौर में प्रदान किए थे, जब विश्व की अधिकांश सभ्यताओं में महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका अत्यंत सीमित थी।

समस्या यह नहीं कि इस्लाम ने महिलाओं को अधिकार नहीं दिए, समस्या यह है कि समय के साथ धार्मिक शिक्षाओं पर सांस्कृतिक रूढ़ियों, पितृसत्तात्मक व्याख्याओं और सामाजिक संकीर्णताओं की परतें चढ़ती चली गईं। परिणामस्वरूप इस्लाम का मूल न्यायवादी और सहभागितापूर्ण दृष्टिकोण धीरे-धीरे धूमिल होता गया।

कुरान की की सूरह अत-तौबा की आयत 71 इस्लामी सामाजिक दर्शन की बुनियादी दिशा स्पष्ट करती है-‘‘मोमिन मर्द औऱ मोमिन औरतें, वे सब परस्पर एक-दूसरे के मित्र है। भलाई का हुक्म देते है और बुराई से रोकते है। नमाज़ क़ायम करते हैं, ज़कात देते है और अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करते हैं। ये वे लोग है, जिनकर शीघ्र ही अल्लाह दया करेगा।’’ यह केवल आध्यात्मिक कथन नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक साझेदारी की घोषणा है। इस आयत में कहीं भी महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से अलग रखने की अवधारणा दिखाई नहीं देती। इस मामले में बरेलवी फिरके के मुफ्ती तुफैल खान साहब कहते हैं, ‘‘पवित्र कुरान एक ऐसा धार्मिक ग्रंथ है, जिसमें लिखित तौर पर महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिया गया है। यही नहीं कई ऐसे हदीश हैं, जिसमें महिलाओं की खुल कर अधिकार की वकालत की गयी है।’’

इसी प्रकार राजनीतिक भागीदारी का प्रश्न भी इस्लामी परंपरा में नया नहीं है। आधुनिक लोकतंत्र में जिसे “मताधिकार” कहा जाता है, उसका प्रारंभिक स्वरूप इस्लामी इतिहास में “बैअत” के रूप में मौजूद था। पैगंबर मुहम्मद (सल्ल॰) पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं से भी बैअत लेते थे। यह केवल धार्मिक निष्ठा नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक अनुबंध का स्वरूप था, जिसमें शासन व्यवस्था के प्रति समर्थन और सहभागिता दोनों शामिल थे।

इतिहास यह भी बताता है कि खुलाफा-ए-राशीदीन के दौर में महिलाओं की राय को सार्वजनिक निर्णयों में महत्व दिया जाता था। Umar ibn al-Khattab के शासनकाल की वह प्रसिद्ध घटना आज भी इस्लामी राजनीतिक नैतिकता का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है, जब एक महिला ने महर की सीमा तय करने के फैसले पर कुरान की आयत के आधार पर आपत्ति जताई थी। खलीफा ने न केवल उसकी बात स्वीकार की, बल्कि सार्वजनिक रूप से अपनी त्रुटि मानी। यह घटना केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, यह इस बात का प्रमाण है कि इस्लामी व्यवस्था में महिला को सत्ता से प्रश्न पूछने और सार्वजनिक असहमति व्यक्त करने का अधिकार प्राप्त था।

विडंबना यह है कि आधुनिक मुस्लिम समाज के कुछ हिस्सों में महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक भागीदारी को अब भी संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। जबकि इस्लाम का मूल संदेश इसके विपरीत है। पैगंबर का यह कथन कि “ज्ञान प्राप्त करना हर मुसलमान पर अनिवार्य है” स्त्री और पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू होता है। इसलिए लड़कियों को शिक्षा से वंचित करना केवल सामाजिक अन्याय नहीं, बल्कि इस्लामी शिक्षाओं की मूल भावना के भी विरुद्ध है।

इस्लामी इतिहास स्वयं इस बात का साक्षी है कि प्रारंभिक मुस्लिम महिलाएँ केवल घरेलू भूमिकाओं तक सीमित नहीं थीं। Khadija bint Khuwaylid एक सफल व्यवसायी थीं, जबकि Aisha bint Abi Bakr इस्लामी न्यायशास्त्र और हदीस ज्ञान की प्रमुख विद्वानों में गिनी जाती हैं। यह तथ्य स्पष्ट करते हैं कि महिलाओं की बौद्धिक और सार्वजनिक भूमिका इस्लामी सिद्धांतों के भीतर पूर्ण वैधता रखती है।

आज आवश्यकता केवल कानूनी सुधारों की नहीं, बल्कि मानसिकता के पुनर्निर्माण की है। क्योंकि समस्या केवल नीतियों में नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण में भी निहित है। यदि समाज की चेतना महिलाओं को द्वितीयक भूमिका में देखने की आदी बनी रहे, तो संवैधानिक अधिकार भी व्यवहारिक समानता सुनिश्चित नहीं कर सकते। इसलिए धार्मिक विद्वानों, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक नेतृत्व की जिम्मेदारी है कि वे इस्लाम की मूल न्यायवादी भावना को पुनः सामने लाएँ।

यह भी समझना आवश्यक है कि महिलाओं का सशक्तिकरण केवल “महिला मुद्दा” नहीं है। यह समाज की सामूहिक प्रगति, आर्थिक स्थिरता और नैतिक स्वास्थ्य से जुड़ा प्रश्न है। जिन समाजों में महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक निर्णयों में भागीदारी मिलती है, वहाँ स्वास्थ्य, सामाजिक स्थिरता और आर्थिक विकास के संकेतक बेहतर पाए जाते हैं। इसके विपरीत महिलाओं को सीमित करना पूरे समाज की संभावनाओं को सीमित कर देता है।

समकालीन मुस्लिम दुनिया के सामने वास्तविक चुनौती पश्चिम और इस्लाम के बीच चयन की नहीं, बल्कि इस्लाम की मूल शिक्षाओं और बाद की सांस्कृतिक रूढ़ियों के बीच अंतर पहचानने की है। जब धर्म की व्याख्या सत्ता, परंपरा और पितृसत्ता के दबाव में होती है, तब न्याय का मूल संदेश कमजोर पड़ जाता है।

इसलिए आज आवश्यकता किसी बाहरी वैचारिक संघर्ष की नहीं, बल्कि आंतरिक बौद्धिक ईमानदारी की है। मुस्लिम समाजों को यह स्वीकार करना होगा कि महिलाओं को शिक्षा, सम्मान और राजनीतिक भागीदारी देना आधुनिकता के दबाव में किया गया समझौता नहीं, बल्कि इस्लामी न्याय-दर्शन की स्वाभाविक मांग है।

यदि समाज वास्तव में कुरान और पैगंबर की शिक्षाओं की ओर लौटना चाहता है, तो उसे महिलाओं को सीमित करने वाली मानसिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा। क्योंकि किसी भी सभ्यता की नैतिक ऊँचाई का आकलन इस बात से होता है कि वह अपने आधे समाज, महिलाओं को कितना सम्मान, अवसर और विश्वास देती है।

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