राकेश सैन
पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के बाद एक चुटुकला सुनने को मिला कि एक व्यक्ति ने अपने मित्र से कहा केरल में भी वामपंथ खत्म हो गया। मित्र ने जवाब दिया, ये तीन दिन पुरानी खबर है। इस पर पहले मित्र ने कहा, खबर तो पुरानी है पर सुनने में कितनी अच्छी लगती है। केरल में वामपंथी सरकार की विदाई ऐसा समाचार है जो बंगाल, त्रिपुरा और पंजाब के बाद पूरे देश में कम्युनिस्टों के पतन की कहानी का अंतिम अध्याय मानी जा रही है। 5 अप्रैल, 1957 का दिन भारतीय राजनीति के लिए एक ऐसा मोड़ था, जिसने दुनिया को चौंका दिया। इस दिन इलम कुलम मनक्कलम शंकरन नंबूदरीपाद ने केरल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 31 जुलाई, 1959 को कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने 28 महीने पुरानी एक चुनी हुई सरकार का गला घोंट दिया लेकिन केरल सरकार की बर्खास्तगी के बाद कम्युनिस्टों की कहानी खत्म नहीं हुई परंतु इस घटना के 69 साल बाद अब ये प्रश्न पूछा जाने लगा है कि क्या लाल झंडा अब केवल इतिहास और पुरानी तस्वीरों में सिमट गया?
केरल के 2026 के चुनावी नतीजों ने पूरे देश को चौंका दिया। इसी साल मार्च महीने में नक्सलवाद के खात्मे और अब दो माह बाद केरल में वाम सरकार का खात्मा हो गया। यानी कम्युनिस्टों का ‘गनतंत्र’ भी परास्त और ‘गणतंत्र’ भी। केरल ही नहीं, बात बंगाल की भी हो रही है जहां पर कभी इनका राज अटूट था। 34 सालों तक यह बंगाल में रहे लेकिन आज वहां पूरी तरह गायब हो गए। बंगाल और त्रिपुरा के बाद एक आखिरी लड़ाई केरल की बची थी। वहां भी कहानी खत्म हो गई है।
पांच राज्यों के इन चुनावी नतीजों के साथ भारत कम्युनिस्ट मुक्त हो गया। एक भी राज्य में अब लाल सलाम वाले सत्ता नहीं है। यह सिर्फ हार नहीं, एक विदेशी भूमि पर पनपी विचारधारा के पतन की कहानी है। पतन क्यों हुआ, क्या ये समय के साथ अपने को बदल नहीं पाए या ये कभी देश की मिट्टी से जुड़े ही नहीं थे। क्या छद्मधर्मनिरपेक्षता के नाम पर बहुसंख्यक विरोध, देश की सांस्कृतिक पहचान से शत्रुता इन्हें भारी पड़ी? यह कहानी सिर्फ केरल की नहीं है। यह भारत में सत्ता के नक्शे से एक विदेशी रंग के मिटने की कहानी है।
आज से करीब 100 साल पहले 1925 में देश में दो वैचारिक संगठन बने। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया। संघ ने राष्ट्रीय पहचान के साथ जुडऩे का मार्ग चुना तो वामपंथियों ने इसके विपरीत। आज संघ की देश में 85 हजार से अधिक शाखाएं, डेढ़ लाख से अधिक सेवा कार्य, अनुषंगिक संगठनों के लाखों कार्यकर्ता इसे दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक संगठन बनाते हैं। संघ के वैचारिक परिवार से जुड़ी भाजपा की आज देश के 17 राज्यों में सरकार में है। साथ ही लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र में भी सरकार में है। वहीं कम्युनिस्ट दलों की केवल एक राज्य केरल में सरकार बची थी जो धराशायी हो गई। एक समय था जब बंगाल वामपंथियों का राज पत्थर की लकीर माना जाने लगा था। कैडर का दबदबा (लोकतांत्रि हो या अलोकतांत्रिक) ऐसा था कि विपक्ष के लिए वहां पैर रखना मुश्किल। 1964 में सीपीआई दो हिस्सों में बंटी। 14 जून, 1977 के चुनाव में 294 में से 200 सीट से ज्यादा सीटें लेफ्ट को मिली। 1977 से 2000 तक अकेले ज्योति बसु ने पांच विधानसभा चुनाव जीते। उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य ने दो जीते। कुल मिलाकर लेफ्ट वाले 34 साल लगातार सत्ता में रहे। चुनावों से जीती हुई यह दुनिया की सबसे लंबे समय तक चलने वाली कम्युनिस्ट सरकार थी। इस दौरान वाम कैडर इतना ताकतवर हो गया कि प्रदेश में कोई भी काम बिना इनकी मंजूरी के नहीं होता था। लोग तंग आ गए और फिर आया सिंगूर और नंदीग्राम। नंदीग्राम में मार्च 2007 में पुलिस फायरिंग में 14 लोग मारे गए। इसी आंदोलन से एक नेता राष्ट्रीय स्तर पर उभरी ममता बनर्जी, जिसने 2011 के चुनाव में 34 साल पुराना लाल किला ढहा दिया।
बंगाल से वाम की विदाई के बाद भी उसका एक पड़ोसी राज्य बचा था त्रिपुरा। यहां सीपीआईएम ने पहली बार 1978 में सरकार बनाई। यहां 25 साल सीपीआईएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट का राज रहा। 3 मार्च, 2018 में त्रिपुरा में लेफ्ट को भाजपा ने निपटा दिया। त्रिपुरा के बेलोनिया में लेनिन की एक बड़ी मूर्ति बुलडोजर से गिरा दी गई। यह एक प्रतीक था एक वाम युग के अंत का। 2018 के बाद सीपीआईएम के पास सिर्फ केरल बचा था।
केरलम में सत्ता हर 5 साल में बदलती रही है। 1980 के बाद से लगभग हर बार एक बार एलडीएफ, एक बार यूडीएफ। 2016 में पिनरई विजयन ने इस क्रम को तोड़ा। 2021 में दोबारा जीते। ये पहली बार था कि केरल में किसी मुख्यमंत्री ने लगातार दो बार वापसी की लेकिन 2026 के चुनाव के पहले से ही एलडीएफ पर कई आरोप थे। सोने की तस्करी, बेरोजगारी, राजनीतिक हिंसा, हिन्दुओं के धार्मिक मामलों में दखलंद, भ्रष्टाचार आदि कई कारण थे वामपंथ की विदाई के। लेफ्ट का पतन सिर्फ चुनावी हार नहीं है, यह एक विचारधारा का उन्मूलन है। वामपंथियों की पराजय ने साबित किया कि केवल पुराने कार्यकर्ताओं व पुरानी राजनीतिक शब्दावली के दम पर आप निरंतर राज नहीं कर सकते। कितने आश्चर्य की बात है कि जेन-जेड के युग में भी वामपंथी नेता आज वर्ग संघर्ष, लाइसेंसी राज जैसी बातें करते हैं। अगर आपके पास युवा कार्यकर्ता नहीं है, नया सिद्धांत नहीं है तो फिर धीरे-धीरे आपसे लोग मुंह मोड़ लेंगे और यही इनके साथ हुआ। केरल में जो हार हुई वह सिर्फ चुनाव की हार नहीं, यह उस भरोसे का टूटना है जो वहां के लोगों में दशकों से बना हुआ था। वही भरोसा आज इनके अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर रहा है। पिनराई विजयन की छवि पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने सरकार की जड़ें हिला दीं।
केरल की सबसे बड़ी समस्या आज उसकी आर्थिक हालत में छिपी है क्योंकि राज्य का कर्ज जो है वह 4 लाख करोड़ के पार जा चुका है। वहां नौजवानों के लिए नई नौकरियां पैदा नहीं हो पाई और युवा आज भी खाड़ी देशों में नौकरी करने को मजबूर हैं। राज्य में नए काम और नए निवेश के मौके नहीं थे। केरल मुफ्त सुविधाएं देने और कल्याणकारी योजनाओं का मॉडल अब वहां की अर्थव्यवस्था पर भारी पडऩे लगा। महिलाओं और युवाओं में जो नाराजगी दिखी उसका बड़ा कारण सबरीमाला का विवाद और वहां के उच्च शिक्षा ढांचे में खामियां बना। रही सही कसर भ्रष्टाचार ने पूरी कर दी।
बंगाल, त्रिपुरा व केरल के बाद पंजाब भी किसी समय वामपंथियों का छोटा सा स्वर्ग रहा है। यहां कभी इनकी पूर्णरूपेण सरकार तो नहीं रही परंतु 1977 के विधानसभा चुनावों में राज्य में सीपीआई (एम) ने 8 तो सीपीआई ने 7 सीटों पर कब्जा जमाया। इसी तरह 1980 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई ने 9 और सीपीआई (एम) ने 5 सीटों पर जीत हासिल की। हरकिशन सिंह सुरजीत पंजाब से उपजे वामपंथ के राष्ट्रीय नेता रहे हैं। गणतंत्र की तरह गनतांत्रिक वामपंथ यानी नक्सलवादियों का भी पंजाब में अच्छा खासा प्रभाव रहा है लेकिन 2002 से लेकर 2024 तक के लोकसभा व विधानसभा चुनावों के परिणामों पर दृष्टिपात करें तो सामने आएगा कि वापंथियों का वोट शेयर 2002 में 2.15 प्रतिशत था जो अब सिमट कर 0.2 प्रतिशत तक सिमट कर लगभग लुप्तप्रायरू हो चुका है। साल 1967 के नक्सली आंदोलन के समय भी पंजाब में वामपंथियों की सक्रियता देखने को मिली, लेकिन सरकार द्वारा नक्सली आंदोलन को बलपूर्वक कुचल दिया गया। इस दौरान 85 वामपंथी आतंकियों को खत्म किया गया। इस आंदोलन के जो लोग बच गए थे, उन्होंने बाद में एक्टिविज्म, जर्नलिज्म और साहित्यिक क्षेत्रों में प्रमुखता से काम किया। साल 80 के दशक में आतंकवाद में उभार आया और बहुत से नक्सलियों ने खालिस्तानी चोला ओढ़ लिया। आज पंजाब में भी वामपंथ के अवशेषों के अतिरिक्त आंदोलन के नाम पर कुछ नहीं बचा है। कहने का भाव कि देश में गनतांत्रिक व गणतांत्रिक सर्वविधिक वामपंथ का पतन हो चुका है। केरल इसका अंतिम उद्घोष हो सकता है।
लेखक पंजाब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जागरण पत्रिका, पथिक संदेश के संपादकीय टोली के सदस्य हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे हमारे प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
