रांची/पटना/वाराणसी/गोरखपुर से संयुक्त रिपोर्ट
पूर्वांचल और बिहार में गुरुवार की शाम अचानक मौसम बदला तो लोगों ने पहले आसमान को देखा, फिर मोबाइल निकाला और उसके बाद बिजली विभाग को कोसना शुरू कर दिया। कई हफ्तों से तपती धरती पर जब पहली तेज़ हवा चली और बादलों ने शहरों-कस्बों के ऊपर डेरा डाला, तब लोगों को लगा कि गर्मी आखिरकार हार रही है। हालांकि अनुभवी लोगों ने तुरंत चेताया – “इतना खुश मत होइए, अभी यह केवल ट्रेलर है, असली मानसून बाकी है।”
पटना के कंकड़बाग से लेकर बनारस के लंका और गोरखपुर के गोलघर तक, बारिश का दृश्य लगभग एक जैसा था। बच्चे सड़क पर नहा रहे थे, दुकानदार प्लास्टिक खींच रहे थे, किसान आसमान की ओर उम्मीद से देख रहे थे और बिजली विभाग अपनी पारंपरिक भूमिका निभाते हुए धीरे-धीरे दृश्य से गायब हो रहा था।
वाराणसी के एक चाय दुकानदार ने बारिश शुरू होते ही मुस्कुराकर कहा, “भइया, तीन महीना से जनता तंदूर में सिक रही थी। अब लग रहा है कि भगवान अभी पूरी तरह नाराज़ नहीं हुए हैं।” लेकिन पाँच मिनट बाद ही बिजली चली गई। उसी दुकानदार ने अँधेरे में मोमबत्ती जलाते हुए दूसरा बयान दिया : “ई विभाग बरसात से नहीं, बादल के फोटो देखकर भी डर जाता है।”
मौसम विभाग की भाषा और जनता का संवाद
मौसम विभाग ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया कि बंगाल की खाड़ी से नमी आ रही है, पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय है और वातावरण में अस्थिरता बनी हुई है। सरकारी भाषा में यह एक सामान्य मौसम सूचना थी। लेकिन गाँवों और कस्बों में इसका अनुवाद अलग-अलग हुआ।
गाजीपुर के एक किसान ने कहा, “मतलब कहीं भी कुछ भी हो सकता है।” पूर्वांचल में मौसम विज्ञान की अपनी लोकव्याख्या है। हवा तेज चले तो लोग कहते हैं – “नेपाल तरफ कुछ गड़बड़ है।” बादल गरजें तो समझा जाता है कि “आज कहीं बिजली जरूर गिरेगी।” और यदि मौसम विभाग ‘हल्की बारिश’ कह दे, तो लोग मोटरसाइकिल ऊँचे स्थान पर लगाने लगते हैं।
बारिश और बिजली विभाग का सनातन संघर्ष
इधर अपने यहां पूर्वांचल और बिहार-झारखंड में मौसम विभाग का बिजली विभाग से सनातन का झगड़ा अभी तक सुलझा नहीं है। बारिश शुरू होते ही सबसे पहले बिजली व्यवस्था ने आत्मसमर्पण किया। कई इलाकों में ट्रांसफॉर्मर फुँक गए, तार टूट गए और घंटों तक बिजली गायब रही। ग्रामीण इलाकों में लोग इनवर्टर चार्ज करने के लिए पड़ोसियों के यहाँ लाइन लगाते दिखे।
रांची के एक बिजली कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हमारी व्यवस्था बहुत संवेदनशील है। हवा, धूल, बारिश, पेड़ की डाल, बंदर, चिड़िया या जनता की उम्मीदकृ किसी भी चीज़ से प्रभावित हो सकती है।” गाँवों में यह बयान तेजी से वायरल हो गया। लोगों ने कहा कि विभाग तकनीकी नहीं, आध्यात्मिक आधार पर चल रहा है।
किसानों के चेहरे पर आधी मुस्कान
बारिश ने खेतों में हलचल बढ़ा दी है। धान की तैयारी कर रहे किसानों के लिए यह राहत लेकर आई है। सूखी मिट्टी नरम हुई है और कई इलाकों में बिचड़े डालने की तैयारी शुरू हो गई है। लेकिन दूसरी तरफ आम और लीची उत्पादक किसान परेशान हैं। तेज हवा और बारिश से बड़ी मात्रा में फल गिर गए। मुज़फ्फरपुर और मालदा से लेकर गोरखपुर तक बागानों में टूटे फलों की परत दिखाई देने लगी।
झारखंड स्थित लातेहार के किसान टूटे आम के पेड़ के नीचे खड़े होकर बोला, “धरती तर हो गई, लेकिन बाग उजड़ गया।” उधर गाँव के बच्चों ने गिरे हुए फलों को ‘प्राकृतिक वितरण प्रणाली’ घोषित कर दिया। कई जगह बच्चे बोरे लेकर बागानों की ओर दौड़ते दिखाई दिए।
ठनका : बिहार का अनौपचारिक मौसम मंत्री
बारिश के साथ ही बिहार में ‘ठनका’ यानी आकाशीय बिजली का डर भी लौट आया है। हर साल की तरह इस बार भी प्रशासन ने चेतावनी जारी की है कि लोग पेड़ के नीचे न जाएँ, खेतों में मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करें और खुले मैदान से दूर रहें। लेकिन ग्रामीण इलाकों में लोग पूछ रहे हैं कि खेती-किसानी आखिर करें तो कैसे करें। समस्तीपुर के एक किसान ने कहा, “सरकार कहती है खेत में मत जाइए। फिर हम खाएँ क्या?”
राज्य सरकार ने लोगों से अपील की है कि बिजली गिरने पर घबराएँ नहीं और सुरक्षित स्थान पर जाएँ। इस पर सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी खूब साझा की जा रही है: “गिरने के बाद बचा कौन रहता है जो घबराए?”
शहरों में बारिश और विकास मॉडल की परीक्षा
पटना, बनारस और गोरखपुर में पहली तेज बारिश में ही एममी के बने-बनाए सड़क पर पानी फिर गया। कहीं मोटरसाइकिलें बंद हो गईं, कहीं नालियाँ उफन पर है। पटना के राजेंद्र नगर में लोग घुटने भर पानी में ऑफिस जाने की कल्पना करने लगे हैं। बनारस में कुछ जगहों पर सड़क और नाले का अंतर मिट गया। गोरखपुर में कई मोहल्लों में बच्चे सड़क पर नाव चलाने की बात करते दिखाई दिए। रांची में थोड़ा ठीक है। वह भी सरकार के कारण नहीं, अपने टोपोग्राफी के कारण वैसे डेमोग्राफी रोज बदल रहा है। पता नहीं कब रांची पटना या फिर गोरखपुर बन जाए।
नगर निगम के अधिकारियों ने सफाई देते हुए कहा कि यह “अस्थायी जलभराव” है। लेकिन स्थानीय लोगों ने इसे “स्थायी परंपरा” बताया। एक युवक ने पानी से भरी सड़क की ओर इशारा करते हुए कहा, “यह सड़क नहीं, सरकार का मानसून विशेष संस्करण है।”
बारिश और लोकसंस्कृति की वापसी
जैसे ही मौसम बदला, पूर्वांचल की सांस्कृतिक स्मृतियाँ भी जाग उठीं। कहीं कजरी बजने लगी, कहीं पुराने भोजपुरी गीत मोबाइल स्पीकर पर सुनाई देने लगे। व्हाट्सऐप स्टेटस पर अचानक बादलों, भीगी सड़कों और चाय के कपों की बाढ़ आ गई।
मिर्ज़ापुर, जौनपुर और बनारस के कई इलाकों में लोगों ने शाम होते-होते लिखना शुरू कर दिया : “सावन आने वाला है”, हालाँकि उसी समय कई घरों में छत टपकने लगी थी और लोग बाल्टी ढूँढ रहे थे।
सिर्फ बारिश नहीं, सामाजिक घटना
पूर्वांचल और बिहार में बारिश केवल मौसम परिवर्तन नहीं होती। यह एक वार्षिक सामाजिक आयोजन की तरह है, जिसमें हर वर्ग की अपनी भूमिका होती है। किसान उम्मीद बोता है, बिजली विभाग गायब हो जाता है, प्रशासन अलर्ट जारी करता है और जनता आसमान देखकर अपनी किस्मत का अनुमान लगाने लगती है। फिलहाल मौसम सुहाना है। हवा चल रही है, मिट्टी से खुशबू उठ रही है और लोग गर्मी से राहत महसूस कर रहे हैं। लेकिन इस इलाके के अनुभवी नागरिक जानते हैं कि असली परीक्षा अभी बाकी है। क्योंकि यहाँ हर बारिश अपने साथ सिर्फ पानी नहीं लातीकृ वह व्यवस्था, विकास, उम्मीद और धैर्य – सबकी जाँच करके जाती है।
By Gautam Chaudhary
