“मिर्ज़ापुर भइल गुलज़ार …. ” – एक कजरी में छिपी सांस्कृतिक विरासत, विरह, गिरमिटिया संघर्ष और सभ्यता की उदासी

“मिर्ज़ापुर भइल गुलज़ार …. ” – एक कजरी में छिपी सांस्कृतिक विरासत, विरह, गिरमिटिया संघर्ष और सभ्यता की उदासी

भारतीय लोकजीवन में कुछ गीत ऐसे होते हैं जो केवल गाए नहीं जाते, बल्कि पीढ़ियों तक एक समाज की स्मृति बनकर जीवित रहते हैं। भोजपुरी अंचल की प्रसिद्ध कजरी – “मिर्ज़ापुर भइल गुलज़ार हो, कचौड़ी गली सून भइल बलमू … ” – भी ऐसा ही गीत है। पहली दृष्टि में यह एक साधारण विरह-गीत प्रतीत होता है, किंतु इसके भीतर उतरते ही उत्तर भारत की एक पूरी सांस्कृतिक दुनिया धीरे-धीरे खुलने लगती है। यह दुनिया तवायफों की महफिलों, गंगा किनारे बसे व्यापारिक नगरों, औपनिवेशिक प्रवासन और टूटते हुए मानवीय संबंधों से निर्मित थी।

आज जब लोकगीतों को अक्सर केवल मनोरंजन या मंचीय प्रस्तुति के रूप में देखा जाता है, तब यह भूल जाना आसान है कि वे अपने समय के सामाजिक दस्तावेज भी होते हैं। “मिर्ज़ापुर भइल गुलज़ार ….. ” ऐसी ही सांस्कृतिक दस्तावेज़ी स्मृति है, जिसमें एक स्त्री का विरह दरअसल पूरे समाज के विस्थापन की कथा बन जाता है।

इस गीत में “मिर्ज़ापुर” और “कचौड़ी गली” का प्रयोग केवल भौगोलिक संकेत नहीं है। बनारस और मिर्ज़ापुर उन्नीसवीं-बीसवीं सदी के उत्तर भारतीय सांस्कृतिक जीवन के महत्त्वपूर्ण केंद्र थे। मिर्ज़ापुर व्यापार, जहाज़ी आवाजाही और मजदूर प्रवासन का बड़ा पड़ाव था, जबकि बनारस की गलियाँ संगीत, ठुमरी, दादरा और तवायफ संस्कृति की जीवित दुनिया थीं।

जब गीत कहता है कि “मिर्ज़ापुर भइल गुलज़ार”, तो उसमें आर्थिक चहल-पहल की ध्वनि है और जब वही गीत “कचौड़ी गली सून भइल” कहता है, तो उसमें सांस्कृतिक उजाड़ का दर्द सुनाई देता है। मानो धन और बाजार तो बढ़ रहे हों, पर मनुष्य और संवेदना पीछे छूटते जा रहे हों।

इस कजरी की सबसे मार्मिक पंक्तियाँ वे हैं जिनमें “रंगून” का उल्लेख आता है –
“ओही मिर्जापुर से उड़ेला जहजिया हो, सैयाँ चलि गइलें रंगून हो ….”

यहाँ रंगून केवल एक विदेशी नगर नहीं, बल्कि औपनिवेशिक युग के उस प्रवासी संसार का प्रतीक है जहाँ रोज़गार की तलाश में पूर्वांचल और बिहार के हजारों लोग जाते थे। बहुत-से लोग लौटकर नहीं आते थे। पीछे बच जाती थीं प्रतीक्षा करती स्त्रियाँ, सूने आँगन और विरह में डूबे लोकगीत।

यही कारण है कि इस गीत को केवल प्रेम-वियोग की अभिव्यक्ति मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह दरअसल औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था द्वारा तोड़े गए घरेलू और सांस्कृतिक जीवन का संगीतात्मक रूप है।

इसी संदर्भ में इस गीत का तवायफ संस्कृति से जुड़ना अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। बनारस और आसपास के नगरों में तवायफें केवल देह-व्यापार की प्रतीक नहीं थीं। वे संगीत, भाषा, शायरी और शहरी तहजीब की संवाहक थीं। कजरी, ठुमरी और दादरा जैसी विधाओं को जनप्रिय बनाने में उनका बड़ा योगदान था। Gauhar Jaan जैसी प्रसिद्ध गायिकाओं ने जिस सांगीतिक परंपरा को प्रतिष्ठा दी, उसी सांस्कृतिक संसार में इस कजरी की ध्वनि भी सुनाई देती है।

संभव है कि यह गीत किसी विशेष तवायफ की निजी कहानी न हो, किंतु इसकी संवेदना निश्चित रूप से उसी दुनिया से निकली प्रतीत होती है जहाँ प्रेम और विरह दोनों सार्वजनिक भी थे और कलात्मक भी। तवायफ की महफिलों में गाए जाने वाले ऐसे गीत व्यक्तिगत दुःख को सामूहिक अनुभव में बदल देते थे। शायद यही कारण है कि “कचौड़ी गली” यहाँ केवल एक गली नहीं रह जाती; वह एक बीतती हुई सभ्यता का रूपक बन जाती है।

दरअसल, लोकगीतों की सबसे बड़ी शक्ति यही होती है कि वे इतिहास को आँकड़ों में नहीं, भावनाओं में सुरक्षित रखते हैं। इतिहास की किताबें हमें बताएँगी कि कितने मजदूर रंगून गए, कितने व्यापारिक जहाज़ चले, किन शहरों का आर्थिक विस्तार हुआ; लेकिन एक स्त्री के मन में उस विस्थापन ने कैसी रिक्तता पैदा की – यह हमें लोकगीत बताते हैं।

“मिर्ज़ापुर भइल गुलज़ार …..” इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह आधुनिकता की उस विडंबना को उजागर करता है जिसमें बाजार समृद्ध होते जाते हैं, पर मनुष्य भीतर से उजड़ता जाता है। शहर गुलज़ार होता है, मगर गली सूनी हो जाती है।

आज जबकि बनारस की वही गलियाँ पर्यटन और उपभोक्तावादी संस्कृति के नए प्रतीक बन चुकी हैं, तब यह कजरी हमें उस पुराने सांस्कृतिक संसार की याद दिलाती है जहाँ संगीत केवल कला नहीं था, बल्कि जीवन का दस्तावेज था। उस संसार में विरह भी सामूहिक था, स्मृति भी सामूहिक थी और गीत भी।

शायद इसी कारण यह कजरी आज भी सुनते ही मन के भीतर कहीं गहरे उतर जाती है। क्योंकि उसमें केवल एक स्त्री की आवाज़ नहीं, बल्कि एक पूरे समय की थकी हुई आत्मा बोलती सुनाई देती है।

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