नई दिल्ली/ राजस्थान के सीकर में मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी की तैयारी कर रहे एक छात्र की कथित आत्महत्या ने एक बार फिर देश की परीक्षा व्यवस्था, कोचिंग संस्कृति और युवाओं पर बढ़ते मानसिक दबाव को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।
शनिवार को कांग्रेस नेता Rahul Gandhi ने मृतक छात्र प्रदीप मेघवाल के परिजनों से फोन पर बात कर संवेदना व्यक्त की और हर संभव मदद का भरोसा दिलाया। बातचीत कांग्रेस की छात्र इकाई National Students’ Union of India (एनएसयूआई) के अध्यक्ष विनोद जाखड़ की मौजूदगी में हुई, जो सीकर पहुँचकर परिवार से मिले।
सीकर के जिस घर में कुछ दिन पहले तक मेडिकल कॉलेज के सपने पर चर्चा होती थी, वहाँ अब चुप्पी, रोते परिजन और दीवार पर टंगे नोट्स बचे हैं। पड़ोसियों के अनुसार, छात्र पिछले कुछ समय से काफी तनाव में था। नीट परीक्षा को लेकर लगातार चल रही अनिश्चितता, पेपर लीक विवाद और भविष्य की चिंता ने परिवार को भी बेचैन कर रखा था।
परिवार के एक सदस्य ने स्थानीय लोगों से बातचीत में कहा,
“बच्चा दिन-रात पढ़ रहा था। बस यही कहता था कि मेहनत बेकार नहीं जानी चाहिए।”
राहुल गांधी ने फोन पर बातचीत के दौरान कथित तौर पर परिजनों से कहा कि वे इस दुख की घड़ी में परिवार के साथ हैं और छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दे को गंभीरता से उठाया जाएगा। कांग्रेस नेताओं ने इस घटना को “परीक्षा तंत्र की विफलता” बताया है।
उधर सोशल मीडिया पर भी यह मामला तेजी से चर्चा में है। कई छात्रों ने लिखा कि प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव अब सिर्फ पढ़ाई का विषय नहीं रह गया, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य का संकट बनता जा रहा है।
राजस्थान के कोटा और सीकर जैसे शहर वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का बड़ा केंद्र रहे हैं। हर साल लाखों छात्र यहाँ पहुँचते हैं। लेकिन सफलता की दौड़ के साथ तनाव, अकेलापन और असफलता का डर भी लगातार बढ़ता गया है।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि परीक्षा संबंधी विवाद केवल कानूनी या प्रशासनिक मसला नहीं होता; उसका सीधा असर उन छात्रों पर पड़ता है जो वर्षों की मेहनत और परिवार की उम्मीदों के साथ तैयारी करते हैं।
सीकर में घटना के बाद स्थानीय स्तर पर भी चर्चा तेज है। लोग पूछ रहे हैं कि यदि परीक्षा की निष्पक्षता पर बार-बार सवाल उठते रहेंगे, तो छात्रों का भरोसा कैसे बचेगा।
इस बीच राजनीतिक बयानबाज़ी भी शुरू हो गई है। विपक्ष परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की मांग कर रहा है, जबकि सरकार पहले ही परीक्षा सुरक्षा और पारदर्शिता को लेकर कई कदम उठाने की बात कह चुकी है।
लेकिन इन सबके बीच एक सवाल अब भी हवा में तैर रहा है —
“आख़िर सपनों का बोझ कितना भारी हो गया है कि बच्चे उससे बाहर निकलने का रास्ता ही नहीं देख पा रहे?”
